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Air Pollution: जहरीली होती दिल्ली की हवा, कहीं कमजोर न कर दे आपकी याददाश्त और सोचने की ताकत?

हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Mon, 19 Jan 2026 02:45 PM IST
सार

Delhi AQI Today: दिल्ली-एनसीआर में हवा की बिगड़ती गुणवत्ता को स्वास्थ्य विशेषज्ञ बेहद खतरनाक मान रहे हैं। इससे क्रॉनिक बीमारियों का खतरा तो बढ़ता ही है साथ ही ये आपके दिमाग की कार्यक्षमता को भी प्रभावित करने वाली हो सकती है। लोगों में याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता कम होने का जोखिम बढ़ सकता है।

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वायु प्रदूषण की सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

राजधानी दिल्ली और एनसीआर में वायु प्रदूषण का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। सोमवार सुबह दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) 'गंभीर श्रेणी' में औसतन 418 दर्ज किया गया। वहीं आनंद विहार में 462, बुराड़ी में 460, और चांदनी चौक इलाके में 454 एक्यूआई दर्ज किया गया है। इससे पहले रविवार सुबह एक्यूआई 437 था। 



कड़ाके की ठंड के बीच बढ़ता वायु प्रदूषण सेहत के लिए भी मुश्किलें बढ़ाता जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार बनी हुई गंभीर वायु गुणवत्ता का मुख्य कारण मौसम का मिजाज है।  तापमान में कमी के कारण प्रदूषण के स्तर में भारी वृद्धि हुई है। पश्चिमी विक्षोभ के चलते वायु गुणवत्ता जो नीचे फंसी हुई ठंडी हवा को ऊपर उठने नहीं देती है। इसी ठंडी हवा में गाड़ियों का धुआं और निर्माण की धूल जैसे प्रदूषक जमा हो जाते हैं। जब बारिश नहीं होती और हवा भी धीरे चलती है, तो यह फंसा हुआ प्रदूषण बाहर नहीं निकल पाता, जिससे स्थिति कई गुना खराब हो जाती है।

हवा की इस तरह की गुणवत्ता को स्वास्थ्य विशेषज्ञ बेहद खतरनाक मान रहे हैं। इससे क्रॉनिक बीमारियों का खतरा तो बढ़ता ही है साथ ही दिल के मरीजों, गर्भवती महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए इस तरह की हवा कई तरह की दिक्कतें बढ़ाने वाली हो सकती है।

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प्रदूषण का दिमागी क्षमता पर होने वाला असर - फोटो : Adobe Stock

वायु प्रदूषण का दिमाग पर भी होता है असर

अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने पहले ही बताया था कि प्रदूषित हवा, विशेषकर पीएम 2.5 का बढ़ता स्तर किस तरह से दिल की बीमारियों को बढ़ाने वाला हो सकता है। हालांकि इसके दुष्प्रभाव सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, खराब गुणवत्ता वाली हवा के संपर्क में लंबे समय तक रहने वाले लोगों की दिमागी क्षमता कम होने का खतरा भी बढ़ सकता है।

  • कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का कहना है कि वायु प्रदूषण के लंबे समय तक संपर्क के कारण डिमेंशिया रोग होने का का खतरा बढ़ सकता है।  
  • डिमेंशिया मस्तिष्क को प्रभावित करने वाली बीमारी है। जिससे सोचने, चीजों को याद रखने, तर्क करने और दैनिक जीवन की गतिविधियों को करने की क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित होती है।
  • इस रोग में मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचने लगती है। जिसके कारण व्यवहार में बदलाव और निर्णय लेने में कठिनाई जैसे दिक्कतें हो सकती हैं।
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डिमेंशिया रोग का खतरा - फोटो : Freepik.com

बढ़ जाता है डिमेंशिया रोग का खतरा

वायु प्रदूषण किस तरह से हमारे दिमाग पर असर डालता है। इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों की टीम ने 51 से अधिक अध्ययनों की समीक्षा की।

  • इसमें 2.9 करोड़ से ज्यादा लोगों के डेटा का इस्तेमाल किया गया। ये लोग कम से कम एक साल तक हवा में मौजूद प्रदूषकों के संपर्क में रहे थे।
  • टीम ने पाया कि लंबे समय तक प्रदूषकों के संपर्क में रहने के कारण लोगों के दिमाग में ऐसे बदलाव देखे गए जो डिमेंशिया के खतरे को बढ़ाने वाले हो सकते हैं।

अध्ययन में क्या पता चला?

अध्ययन में पाया गया कि पीएम 2.5 का संपर्क किसी व्यक्ति में डिमेंशिया के जोखिमों को 17% बढ़ा सकता है। गाड़ियों के धुएं, पावर प्लांट और लकड़ी जलाने या और चिमनियों से होने वाला प्रदूषण हवा को गंभीर रूप से दूषित करता है। जिन शहरों में वायु गुणवत्ता लगातार खराब बनी रहती है, वहां लोगों में अल्जाइमर रोग-डिमेंशिया होने का खतरा अधिक देखा जाता है।

वायु प्रदूषण न्यूरोइन्फ्लेमेशन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, खून की नसों और दिमाग की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाकर डिमेंशिया का कारण बनता है। पीएम 2.5 जैसे बारीक कण फेफड़ों या नाक के जरिए दिमाग में जा सकते है, जिससे मस्तिष्क की कोशिकाओं में क्षति होने का जोखिम बढ़ जाता है।

लंबे समय तक प्रदूषकों के संपर्क में रहने वाले बच्चों में भविष्य में अल्जाइमर रोग होने का जोखिम, अन्य बच्चों की तुलना में अधिक देखा जाता रहा है।
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मेंटल हेल्थ की समस्या और डिप्रेशन का खतरा - फोटो : Freepik.com

मानसिक स्वास्थ्य और डिप्रेशन का खतरा

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने अलर्ट किया है कि पीएम 2.5 के लंबे समय तक संपर्क में रहने से डिप्रेशन जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का भी जोखिम रहता है। जामा नेटवर्क में प्रकाशित एक हालिया रिपोर्ट में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने अलर्ट किया है कि पीएम 2.5 जैसे प्रदूषक जिनमें सल्फेट, अमोनियम, एलिमेंटल कार्बन और मिट्टी की धूल भी शामिल हैं, इनके लंबे समय तक संपर्क में रहने से डिप्रेशन जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। पूरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें


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स्रोत
Long-term air pollution exposure and incident dementia: a systematic review and meta-analysis


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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