राजधानी दिल्ली और एनसीआर में वायु प्रदूषण का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। सोमवार सुबह दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) 'गंभीर श्रेणी' में औसतन 418 दर्ज किया गया। वहीं आनंद विहार में 462, बुराड़ी में 460, और चांदनी चौक इलाके में 454 एक्यूआई दर्ज किया गया है। इससे पहले रविवार सुबह एक्यूआई 437 था।
Air Pollution: जहरीली होती दिल्ली की हवा, कहीं कमजोर न कर दे आपकी याददाश्त और सोचने की ताकत?
Delhi AQI Today: दिल्ली-एनसीआर में हवा की बिगड़ती गुणवत्ता को स्वास्थ्य विशेषज्ञ बेहद खतरनाक मान रहे हैं। इससे क्रॉनिक बीमारियों का खतरा तो बढ़ता ही है साथ ही ये आपके दिमाग की कार्यक्षमता को भी प्रभावित करने वाली हो सकती है। लोगों में याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता कम होने का जोखिम बढ़ सकता है।
वायु प्रदूषण का दिमाग पर भी होता है असर
अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने पहले ही बताया था कि प्रदूषित हवा, विशेषकर पीएम 2.5 का बढ़ता स्तर किस तरह से दिल की बीमारियों को बढ़ाने वाला हो सकता है। हालांकि इसके दुष्प्रभाव सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, खराब गुणवत्ता वाली हवा के संपर्क में लंबे समय तक रहने वाले लोगों की दिमागी क्षमता कम होने का खतरा भी बढ़ सकता है।
- कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का कहना है कि वायु प्रदूषण के लंबे समय तक संपर्क के कारण डिमेंशिया रोग होने का का खतरा बढ़ सकता है।
- डिमेंशिया मस्तिष्क को प्रभावित करने वाली बीमारी है। जिससे सोचने, चीजों को याद रखने, तर्क करने और दैनिक जीवन की गतिविधियों को करने की क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित होती है।
- इस रोग में मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचने लगती है। जिसके कारण व्यवहार में बदलाव और निर्णय लेने में कठिनाई जैसे दिक्कतें हो सकती हैं।
बढ़ जाता है डिमेंशिया रोग का खतरा
वायु प्रदूषण किस तरह से हमारे दिमाग पर असर डालता है। इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों की टीम ने 51 से अधिक अध्ययनों की समीक्षा की।
- इसमें 2.9 करोड़ से ज्यादा लोगों के डेटा का इस्तेमाल किया गया। ये लोग कम से कम एक साल तक हवा में मौजूद प्रदूषकों के संपर्क में रहे थे।
- टीम ने पाया कि लंबे समय तक प्रदूषकों के संपर्क में रहने के कारण लोगों के दिमाग में ऐसे बदलाव देखे गए जो डिमेंशिया के खतरे को बढ़ाने वाले हो सकते हैं।
अध्ययन में क्या पता चला?
अध्ययन में पाया गया कि पीएम 2.5 का संपर्क किसी व्यक्ति में डिमेंशिया के जोखिमों को 17% बढ़ा सकता है। गाड़ियों के धुएं, पावर प्लांट और लकड़ी जलाने या और चिमनियों से होने वाला प्रदूषण हवा को गंभीर रूप से दूषित करता है। जिन शहरों में वायु गुणवत्ता लगातार खराब बनी रहती है, वहां लोगों में अल्जाइमर रोग-डिमेंशिया होने का खतरा अधिक देखा जाता है।
वायु प्रदूषण न्यूरोइन्फ्लेमेशन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, खून की नसों और दिमाग की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाकर डिमेंशिया का कारण बनता है। पीएम 2.5 जैसे बारीक कण फेफड़ों या नाक के जरिए दिमाग में जा सकते है, जिससे मस्तिष्क की कोशिकाओं में क्षति होने का जोखिम बढ़ जाता है।
लंबे समय तक प्रदूषकों के संपर्क में रहने वाले बच्चों में भविष्य में अल्जाइमर रोग होने का जोखिम, अन्य बच्चों की तुलना में अधिक देखा जाता रहा है।
मानसिक स्वास्थ्य और डिप्रेशन का खतरा
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने अलर्ट किया है कि पीएम 2.5 के लंबे समय तक संपर्क में रहने से डिप्रेशन जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का भी जोखिम रहता है। जामा नेटवर्क में प्रकाशित एक हालिया रिपोर्ट में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने अलर्ट किया है कि पीएम 2.5 जैसे प्रदूषक जिनमें सल्फेट, अमोनियम, एलिमेंटल कार्बन और मिट्टी की धूल भी शामिल हैं, इनके लंबे समय तक संपर्क में रहने से डिप्रेशन जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। पूरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
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स्रोत
Long-term air pollution exposure and incident dementia: a systematic review and meta-analysis
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