Impact Of Online Gaming On Teen Mental Health: गाजियाबाद के टीलामोड़ इलाके में 3 फरवरी की देर रात एक ऐसी झकझोर देने वाली घटना घटी, जिसने आज के डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पिता के मोबाइल छीनने पर भारत सिटी सोसायटी की नौवीं मंजिल से तीन सगी बहनों (16, 14 और 12 वर्ष) ने कूदकर अपनी जान दे दी। पुलिस जांच में एक सुसाइड नोट बरामद हुआ है, जिसमें बच्चियों के कोरियन कल्चर और ऑनलाइन गतिविधियों से प्रभावित होने का संकेत मिला है।
Korean Game Addiction: कैसे पहचानें बच्चे को गेम की लत है या नहीं? विशेषज्ञ से जानें किशोरों का मनोविज्ञान
Online Game Addiction Symptoms: ऑनलाइन गेमिंग की वजह से तीन मासूम बहनों से जब उनके पिता ने फोन छीना तो उन्होंने नौंवी मंजिल से छलांग लगाकर जान दे दी। इस हृदयविदारक घटना के बाद देशभर के लोगों में ये सवाल है कि क्या ऑनलाइन गेमिंग की लत इतनी खराब हो सकती है? इसी विषय पर विशेषज्ञ जो बताया वो आपको भी जानना चाहिए।
किशोरों में कब आती है सुसाइडल टेंडेंसी?
डॉक्टर मित्तल के अनुसार, किशोरावस्था के बच्चों का मस्तिष्क पूरी तरह विकसित नहीं होता, ऐसे में जब उन्हें गेम की लत लगती है तो उनके लिए गेम ही असल दुनिया बन जाती है। इस उम्र में बच्चे किसी वर्चुअल रोल मॉडल से अपनी पहचान जोड़ लेते हैं। ऐसे में जब उन्हें गेम खेलने से रोका जाता है तो वे अपनी पहचान खोने का गहरा खालीपन महसूस करते हैं।
इस स्थिति में बच्चे 'डिल्यूजन्स' यानी वास्तविकता से परे भ्रम और 'ओवर वैल्यूड आइडियाज' का शिकार हो जाते हैं, जहां उन्हें अपना विचार या गेम का टास्क जीवन से भी बड़ा लगने लगता है। तर्क शक्ति की कमी होने के कारण वे इस मानसिक दबाव को सहन नहीं कर पाते, जो उन्हें सुसाइड जैसे आत्मघाती कदम की ओर धकेलता है।
गाजियाबाद के तीनों लड़कियों के सुसाइड वाले केस में देखें तो एक न्यूज एजेंसी से बातचीत के दौरान लड़कियों के पिता ने बताया कि उनकी बेटियां इस गेम और कोरियाई संस्कृति के प्रति इस कदर जुनूनी थीं कि वे इसे अपनी जान से ऊपर मानने लगी थीं। यह बच्चों में डिल्यूजन और ओवरवैल्यूड आइडियाज का एक सबसे अच्छा उदाहरण है।
माता-पिता कैसे पहचानें लत के खतरनाक लक्षण?
माता-पिता को बच्चे की डिजिटल गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए। डॉ. मित्तल के अनुसार, अगर फोन छीनने पर बच्चा हिंसक हो जाए, आप पर हाथ उठाए या अत्यधिक गुस्सा करे, तो यह खतरे की घंटी हो सकती है।
- हिंसक व्यवहार और गुस्सा: फोन छीनने या गेम बंद करने पर बच्चे का अत्यधिक गुस्सा करना, चिड़चिड़ा हो जाना और यहां तक कि माता-पिता पर हाथ उठाना या मारपीट करना।
- गहरा अवसाद और अकेलापन: मोबाइल पास न होने पर बच्चे का बुरी तरह उदास हो जाना और उसे आसपास की किसी भी गतिविधि या खेल में रुचि न रहना।
- दैनिक दिनचर्या और खान-पान में लापरवाही: गेम में इस कदर खो जाना कि बच्चा समय पर नहाना, अपनी पसंद का खाना खाना और व्यक्तिगत स्वच्छता जैसी जरूरी चीजों को भी नजरअंदाज करने लगे।
क्या बच्चों को फोन नहीं देना ही सही तरीका है?
आज के दौर में बच्चों से मोबाइल पूरी तरह छीनना संभव नहीं है, क्यों उसी फोन से बच्चे कई अच्छी चीजें भी सीखते हैं, दुनिया से देखते हैं और समझते हैं। मगर 'डिजिटल सेफ्टी' रखना बहुत जरूरी है। ऐसे में डॉक्टर की सलाह है कि बच्चों का स्क्रीन टाइम 'टाइम बाउंड' होना चाहिए।
बच्चों को ऑनलाइन गेमिंग के बदले आउटडोर एक्टिविटीज के लिए प्रोत्साहित करें। बच्चों को तकनीक के फायदों के साथ उसके डार्क साइड के बारे में भी बताएं, ताकि उसमें सही और गलत की समझ डेवेलप हो।
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अगर बच्चे को ऑनलाइन गेमिंग की लत है तो क्या करें?
अगर आपको पता चले कि बच्चा किसी खतरनाक गेम का शिकार हो चुका है, तो अचानक मोबाइल छीनकर उसे पैनिक न करें। धीरे-धीरे उसका रूटीन ठीक करने पर काम करें और बातचीत के जरिए उसका विश्वास जीतें। धीरे-धीरे उसका स्क्रीन टाइम कम करें।
डॉ. मित्तल सुझाव देते हैं कि अगर बच्चा बहुत अधिक चिड़चिड़ा या आक्रामक हो रहा है, तो बिना देरी किए किसी प्रोफेशनल साइकोलॉजिस्ट या मनोचिकित्सक से मिलना चाहिए। चिकित्सीय परामर्श उसे इस मानसिक दलदल से बाहर निकाल सकता है।
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