ड्रग तस्करों, बॉलीवुड और चंदन तस्करों की कथित साठगांठ को लेकर हाल के सालों में जो सबसे गंभीर चर्चा छिड़ी है उसका असर मनोरंजन और मीडिया जगत समेत कई और क्षेत्रों पर पड़ा है। बॉलीवुड इंडस्ट्री से जुड़े बड़े नामों से लेकर ड्रग तस्करों के जाल में फंस कर गांजा उगाने वाले छोटे किसानों के जीवन पर इसका कितना असर होगा, ये समझने के लिए अभी और वक्त लगेगा। लेकिन ऐसा लगता है कि इस विवाद का बड़ा असर गांजे के पौधे के औषधीय गुणों और इसके गैर-नशीले और लत न लगने से जुड़े गुणों को लेकर जारी वैज्ञानिक शोध पर पड़ रहा है।
गांजा स्वास्थ्य के लिए कितना खतरनाक है, वैज्ञानिकों को क्यों लुभाती हैं इसकी खूबियां?
बंगलूरू में मौजूद नम्रता हेम्प कंपनी के प्रबंध निदेशक हर्षवर्धन रेड्डी सिरुपा ने बीबीसी को बताया, "इसका असर ये होगा कि गांजे की खेती और इससे इंडस्ट्रीयल और मेडिसिनल प्रोडक्ट बनाने के लिए रिसर्च की अनुमति देने के लिए नियमन प्रक्रिया बनाने का फैसला लेने में अब तीन से चार साल की देरी हो सकती है।"
सिरुपा का डर उन व्यवसायियों के डर से मिलता-जुलता है जिन्होंने ये सोच कर इस क्षेत्र में कदम रखा है कि कानून में उचित बदलाव के साथ इस पौधे का इस्तेमाल कृषि और बागवानी, कपड़ा उद्योग, दवा और स्वास्थ्य सेवा जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है। इन उद्यमियों का आकलन है कि साल 2025 तक ये इंडस्ट्री 100 से 150 अरब अमेरिकी डॉलर की हो सकती है।
भारत में गांजा कितना बड़ा खतरा है?
दिल्ली के एम्स में नेशनल ड्रग डिपेन्डेन्स ट्रीटमेन्ट सेंटर (एनडीडीटीसी) और मनोचिकित्सा विभाग में प्रोफेसर डॉक्टर अतुल अम्बेकर ने बीबीसी हिंदी को बताया, "मूल रूप से इस पूरे विषय में कई ग्रे एरिया है। इस मामले में अगर ये तय हो कि क्या मान्य होगा और क्या नहीं तो इससे काफी मदद मिल सकती है। लेकिन आम तौर पर हमारे मौजूदा कानून ये संदेश देते हैं कि इससे दूर रहो। इसके नजदीक जाने की कोई जरूरत नहीं है।"
विडंबना ये है कि ये कानून उस दौर में मौजूद हैं जब एम्स और एनडीडीटीसी ने देश में की अपनी ताजा स्टडी में पाया है कि हमारे समाज को सबसे अधिक खतरा कहां से है। इस स्टडी के लिए बीते साल सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय ने आर्थिक मदद दी थी।
डॉक्टर अम्बेकर कहते हैं, "130 अरब की आबादी में करीब दो करोड़ लोग भांग (भारत में भांग कानूनी तौर पर उपलब्ध होता है), चरस और गांजा जैसे गांजे के पौधे से बने उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं। ये देखना भी दिलचस्प है कि वैश्विक औसत के मुकाबले भारत में गांजे का इस्तेमाल कम है (3.9 फीसदी बनाम 1.9 फीसदी)। इसके मुकाबले भारत के लिए चिंता का विषय है अफीम से बनने वाला हेरोइन। जहां दुनिया में औसतन 0.7 फीसदी लोग अफीम से बने नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करते हैं वहीं भारत में 2.1 फीसदी लोग इस तरह के पदार्थों का इस्तेमाल करते हैं।"
यही वो कारण है जिस कारण मौजूदा स्थिति को देखते हुए गांजे के पौधे को लेकर काम करने वाले कुछ उद्यमी असमंजस में हैं। मौजूदा कानून के मुताबिक नार्कोटिक ड्रग एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1985 (एनडीपीएस एक्ट या स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985) राज्यों को इस मामले में अपने कानून बनाने की इजाजत देता है। लेकिन उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश ऐसे दो ही राज्य हैं जिन्होंने इससे जुड़े कानून बनाए हैं। और इन कानूनों में मौजूद कमियों के कारण उद्यमियों का इस क्षेत्र में काम करना असंभव हो गया है।
सिरुपा कहते हैं, "उदाहरण के तौर पर उत्तराखंड का कानून कहता है कि "गांजे के पौधे में 0.3 फीसदी से कम टेट्राहाइड्रोकैनाबिनॉल (टीएसी) होना चाहिए। इस मामले में कोई स्पष्टता ही नहीं है। क्योंकि नमी वाले इलाकों में मौसम की मार से बचने के लिए गांजे का पौधा अधिक मात्रा में टीएचसी पैदा करता है।"
भुवनेश्वर में मौजूद डेल्टा बायोलॉजिकल्स एंड रीसर्च प्राइवेट लिमिडेट के विक्रम मित्रा का कहना है, "उत्तराखंड ने गांजे की खेती के लिए 14 उद्यमियों को लाइसेंस दिए गए हैं लेकिन किसी ने कुछ नहीं किया क्योंकि इसके लिए विदेश से बीज आयात करने होते हैं। हमारी कोशिशों के बाद उत्तराखंड सरकार ने केंद्र सरकार को टीएचसी मात्रा में बदलाव करने के लिए लिखा लेकिन इस मामले में मार्च से अब तक कोई फैसला नहीं लिया गया है।"
