सपने क्यों आते हैं, किन सपनों के क्या मतलब हो सकते हैं? इस बारे में आपने लोगों से अलग-अलग तरह की बातें सुनी होंगी। हालांकि विज्ञान का, सपनों को लेकर तर्क अलग है। वैज्ञानिकों का मानना है कि सपने असल में रैंडम ख्याल होते हैं। एक्टिवेशन सिंथेसिस मॉडल के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि सपने, हमारे दिमाग की गतिविधि को समझने का तरीका हो सकते हैं। हमारा दिमाग एमिग्डाला और हिप्पोकैम्पस जैसे मस्तिष्क के हिस्सों से सिग्नल लेता है और उनकी व्याख्या करने की कोशिश करता है, जिसके परिणामस्वरूप सपने आते हैं।
ध्यान दें: अक्सर रात में आते हैं डरावने सपने? यह डेमेंशिया का संकेत तो नहीं, जानिए अध्ययन में क्या पता चला
डरावने सपने और डेमेंशिया का लिंक
बर्मिंघम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने तीन अध्ययनों के विश्लेषण के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि बार-बार बुरे सपने आते रहना, इसके कारण रात में अक्सर नींद से जग जाना और परेशान रहना, डेमेंशिया विकसित होने का खतरा बढ़ा सकता है। डेमेंशिया, चीजों को याद रखने, सोचने या निर्णय लेने की क्षमता में गड़बड़ी की समस्या है, जिसके कारण व्यक्ति के लिए रोजमर्रा की गतिविधियों को करने में भी कई तरह की कठिनाई हो सकती है।
अल्जाइमर रोग डेमेंशिया का सबसे आम प्रकार है। डेमेंशिया ज्यादातर, उम्र बढ़ने के साथ होने वाली समस्या है। अगर आप भी अक्सर डरावने सपने से परेशान रहते हैं तो आपके भी भविष्य में डेमेंशिया से पीड़ित होने का खतरा बढ़ जाता है।
अध्ययन में क्या पता चला?
इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने मध्यम आयु वर्ग के 600 (35 से 64 वर्ष की आयु) और 79 और उससे अधिक आयु के 2,600 प्रतिभागियों के डेटा का अध्ययन किया। इसमें नींद की गुणवत्ता और मस्तिष्क स्वास्थ्य का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि मध्यम आयु वर्ग के जिन लोगों ने सप्ताह में कम से कम एक बार बुरे-डरावने सपने आने की सूचना दी, उनमें अगले 10 साल में संज्ञानात्मक गिरावट की समस्याओं का जोखिम अन्य की तुलना में चार गुना अधिक पाया गया।
टीम ने पाया कि नींद की गुणवत्ता में कमी के कारण बुरे सपने अधिक आते हैं और समय के साथ ये दिमाग में उन प्रोटीन्स को बढ़ाने लगते हैं जिसके कारण डेमेंशिया होने का जोखिम बढ़ जाता है।
क्या कहते हैं शोधकर्ता?
जर्नल में शोधकर्ताओं ने बताया कि नाइटमेयर्स की समस्या लोगों के बीच काफी सामान्य है। हालांकि इनका नैदानिक महत्व अब तक काफी हद तक अनजान रहा है। अध्ययन के प्रमुख लेखक आबिदेमी आई. ओटाइकू ने बताया कि मस्तिष्क के दाहिने हिस्से के भीतर न्यूरोडीजेनेरेशन के परिणामस्वरूप इस तरह की दिक्कतों का अनुभव अधिक हो सकता है। यह लोगों के लिए सपने देखते समय अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना कठिन कर देती है। इसके लिए लोगों को नींद की गुणवत्ता में सुधार करने पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है।
पुरुषों में नाइटमेयर्स और डेमेंशिया का खतरा अधिक
शोधकर्ताओं ने अध्ययन में पाया कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में नाइटमेयर्स और डेमेंशिया का खतरा अधिक पाया गया है। उदाहरण के लिए, साप्ताहिक आधार पर बुरे सपने का अनुभव करने वाले उम्रदराज लोगों में अन्य लोगों की तुलना में डेमेंशिया विकसित होने की आशंका पांच गुना अधिक पाई गई। महिलाओं में हालांकि इसके जोखिम में वृद्धि की दर केवल 41 प्रतिशत थी। विशेषज्ञों का कहना है कि नींद की गुणवत्ता को ठीक रखकर इस तरह की समस्याओं से बचाव किया जा सकता है।
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स्रोत और संदर्भ
Nightmares in middle age linked to dementia risk
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