केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार (1 फरवरी 2026) लगातार नौंवी बार देश के बजट पेश किया। इस बजट में देश के हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं। मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देने, अखिल भारतीय आयुर्वेदिक संस्थान स्थापित करने से लेकर कैंसर और कुछ जरूरी दवाओं के बेसिक कस्टम ड्यूटी में छूट की घोषणा की गई है। जिला अस्पतालों को अपडेट करके लोगों तक आसान चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने, आयुष फार्मेसी और औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं को अपग्रेड करने की भी घोषण की गई है।
Budget 2026: मेंटल हेल्थ में सुधार की तरफ ध्यान, स्थापित होगा 'निमहांस-2'; जानिए क्यों है इसकी जरूरत
वित्त मंत्री ने कहा कि देश में वर्तमान में मानसिक स्वास्थ्य के लिए समर्पित राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों की कमी है। इस कमी को दूर करने के लिए, रांची और दिसपुर में नए राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों की स्थापना का प्रस्ताव है
उत्तर भारत में खोला जाएगा निमहांस-2
वित्त मंत्री ने कहा कि उत्तर भारत में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए कोई राष्ट्रीय संस्थान नहीं है, इसीलिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो-साइंसेज (निमहांस)-2 को उत्तर भारत में स्थापित किया जाएगा, हालांकि यह घोषणा नहीं की गई कि यह संस्थान कहां बनेगा। निमहांस देश का सबसे प्रतिष्ठित मानसिक स्वास्थ्य और न्यूरोसाइंस संस्थान माना जाता है, जो बेंगलुरु में स्थित है।
- वित्त मंत्री ने रांची और तेजपुर में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों को क्षेत्रीय शीर्ष संस्थानों के रूप में अपग्रेड करने की भी घोषणा की।
- वर्तमान में, रांची और तेजपुर में मानसिक स्वास्थ्य संस्थान क्रमशः सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकियाट्री और लोकप्रिया गोपीनाथ बोरदोलोई रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ हैं।
- यहां गंभीर मानसिक रोगों के इलाज, ट्रॉमा मैनेजमेंट, मेडिकल शिक्षा और मनोचिकित्सा, मनोविज्ञान व न्यूरोसाइंस के क्षेत्र में अत्याधुनिक शोध किया जाएगा।
- यह विस्तार देश में बढ़ते मानसिक स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए बेहद जरूरी है।
देश में मेंटल हेल्थ की बढ़ती समस्याएं
मानसिक स्वास्थ्य में सुधार की दिशा में उठाए गए इस कदम को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। गौरतलब है कि इस हफ्ते की शुरुआत में पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे 2026 में, मेंटल हेल्थ को एक बड़ी समस्या बताया गया, जो भारत की पब्लिक हेल्थ के लिए एक सीधी चुनौती है।
- इकोनॉमिक सर्वे में 15-24 साल के आयु वाले लोगों में सोशल मीडिया की लत होने की बात भी कही गई है।
- अध्ययनों का हवाला देते हुए, सर्वे में एंग्जायटी, डिप्रेशन, लो सेल्फ-एस्टीम और साइबरबुलिंग से जुड़े स्ट्रेस में बढ़ोतरी देखी गई।
- इसमें कहा गया कि स्क्रीन टाइम बढ़ने से पढ़ाई-लिखाई, प्रोडक्टिविटी और नींद पर असर पड़ रहा है, और सोशल कनेक्शन भी कम हो रहे हैं।
देश में जिस तेजी से मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के शिकार रोगियों की संख्या बढ़ रही है, उसकी तुलना में साइकेट्रिस्ट और मेंटल हेल्थ के लिए हॉस्पिटल्स में जिस तरह की कमी है, इस खाई को भरने की दिशा में सरकार के इस फैसले को विशेषज्ञ काफी बेहतर मानते हैं।
