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Autism: डर की मार्केटिंग और उम्मीदों की ब्रांडिंग, ऑटिज्म ट्रीटमेंट मार्केट को लेकर मनोचिकित्सक का बड़ा खुलासा

हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Abhilash Srivastava Updated Tue, 31 Mar 2026 06:44 PM IST
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सार

ऑटिज्म के क्षेत्र में सबसे बड़ा भ्रम “क्योर” यानी पूरी तरह ठीक होने के वादे को लेकर है। कई जगहों पर माता पिता को यह कहा जाता है कि कुछ महीनों की थेरेपी से बच्चा पूरी तरह सामान्य हो जाएगा।

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ऑटिज्म और इसे लेकर बड़े खुलासे - फोटो : Amarujala.com
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विस्तार

कल्पना कीजिए, एक छोटा सा बच्चा जो अपनी ही दुनिया में खोया रहता है। वह खिलौनों से खेलता तो है, लेकिन लोगों से जुड़ने में झिझकता है। कोई उसे नाम से पुकारे तो वह जवाब नहीं देता, लोगों से आई कॉन्टैक्ट नहीं बना पाता और अक्सर एक ही हरकत बार-बार दोहराता रहता है। माता-पिता सोचते हैं कि शायद वह धीरे सीखने वालों में से है या दूसरे बच्चों से उसका स्वभाव थोड़ा अलग है। हालांकि ये संकेत न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति के हो सकते हैं, जिसपर समय रहते गंभीरता से ध्यान देते रहने की जरूरत होती है। 

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बीते एक-दो दशकों में दुनियाभर में ऑटिज्म के मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार हर 60-65 में से एक बच्चा इस समस्या का शिकार देखा जा रहा है। सभी माता-पिता के लिए शुरुआती दिनों में बच्चों के व्यवहार और उनकी गतिविधियों पर ध्यान देते रहना जरूरी है।
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ऑटिज्म के बारे में वैश्विक रूप से जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर साल 2 अप्रैल को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस मानाया जाता है। दुनियाभर में तेजी से बढ़ती इस समस्या को लेकर वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी ने कई बड़े खुलासे किए हैं, जो ऑटिज्म के काले सच से पर्दा उठाती है।

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ऑटिज्म की समस्या के बारे में जानिए - फोटो : Amarujala.com

ऑटिज्म, कोरोना जैसा कोई संक्रमण नहीं है, न ही पालन-पोषण की गलती का परिणाम है। यह मस्तिष्क के विकास से जुड़ी एक जटिल स्थिति है, जिसे सही समय पर पहचानना बेहद जरूरी है। जितनी जल्दी इसे समझा जाए, उतनी जल्दी बच्चे को सही थेरेपी और सहयोग मिल सकता है। यही उसकी जिंदगी की दिशा बदल सकता है।

इलाज के नाम पर भ्रम और व्यवसाय

डॉक्टर सत्यकांत कहते हैं, आज के समय में ऑटिज्म शब्द जितनी तेजी से लोगों के बीच पहुंचा है, उतनी ही तेजी से इसके इलाज के नाम पर भ्रम और व्यवसाय भी बढ़ा है। हर माता पिता अपने बच्चे को सामान्य देखना चाहता है। यह स्वाभाविक भी है, लेकिन इसी भावना का फायदा उठाकर एक ऐसा तंत्र खड़ा हो गया है जहां उम्मीदों का व्यापार होने लगा है। यही इस पूरे विषय का सबसे बड़ा काला सच है।
 

  • डॉक्टर सत्यकांत बताते हैं, सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि ऑटिज्म कोई ऐसी बीमारी नहीं है जिसे दवा देकर पूरी तरह समाप्त किया जा सके। यह एक न्यूरोडेवलपमेंटल कंडीशन है, यानी मस्तिष्क के विकास का एक अलग तरीका।
  • इसका अर्थ यह है कि ऑटिज्म का शिकार बच्चा दुनिया को अलग ढंग से देखता और समझता है। लेकिन समाज और कई तथाकथित विशेषज्ञ इसे एक बीमारी के रूप में प्रस्तुत करते हैं, ताकि इलाज के नाम पर लंबे समय तक निर्भरता बनाई जा सके।


ऑटिज्म के क्षेत्र में सबसे बड़ा भ्रम “क्योर” यानी पूरी तरह ठीक होने के वादे को लेकर है। कई जगहों पर माता पिता को यह कहा जाता है कि कुछ महीनों की थेरेपी से बच्चा पूरी तरह सामान्य हो जाएगा। इस तरह के दावे न केवल वैज्ञानिक रूप से गलत हैं बल्कि भावनात्मक शोषण का भी उदाहरण हैं।

वास्तविकता यह है कि सही इलाज से सुधार संभव है, लेकिन ऑटिज्म को पूरी तरह समाप्त करना संभव नहीं है।

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ऑटिज्म और इसका उपचार - फोटो : Adobe stock

थेरेपी के नाम पर खड़ा उद्योग

थेरेपी के नाम पर भी एक बड़ा उद्योग खड़ा हो चुका है। एप्लाइड बिहेवियर एनालिसिस (एबीए थेरेपी) स्पीच थेरेपी और ऑक्यूपेशनल थेरेपी जैसे तरीके निश्चित रूप से उपयोगी हैं, लेकिन इनका उपयोग अक्सर एक पैकेज की तरह किया जाता है। 
 

  • हर बच्चे की जरूरत अलग होती है, फिर भी एक ही तरह का प्रोटोकॉल सब पर लागू किया जाता है। 
  • कई बार बच्चों को दिन में कई घंटे थेरेपी में रखा जाता है, बिना यह देखे कि उसकी वास्तविक आवश्यकता क्या है?
  • इससे बच्चे पर अनावश्यक दबाव पड़ता है और माता पिता आर्थिक और मानसिक रूप से थक जाते हैं।


एक और चिंताजनक पहलू अवैज्ञानिक और फर्जी उपचारों का है। स्टेम सेल थेरेपी, चमत्कारी दवाइयां, विशेष डाइट, डिटॉक्स और तरह तरह के गैर प्रमाणित उपायों का प्रचार किया जाता है। इनका कोई ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं है, फिर भी इन्हें बड़े-बड़े दावों के साथ प्रस्तुत किया जाता है। कई बार ये उपचार न केवल बेकार होते हैं बल्कि बच्चे के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक भी साबित हो सकते हैं।

माता पिता को अपराधबोध में डालना भी इस तंत्र का हिस्सा बन चुका है। उन्हें यह महसूस कराया जाता है कि यदि उन्होंने समय पर इलाज नहीं कराया या पर्याप्त पैसा खर्च नहीं किया तो उनके बच्चे का भविष्य खराब हो जाएगा। यह पूरी तरह से गलत और अनैतिक है।

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ऑटिज्म की दुनिया के काले सच - फोटो : Adobe stock

इलाज नहीं है, फिर भी जगाई जाती है उम्मीद

डॉक्टर सत्यकांत कहते हैं,  सबसे दुखद स्थिति तब होती है जब बच्चे की असली पहचान खोने लगती है। नॉर्मल बनाने के प्रयास में कई बार बच्चे की प्राकृतिक रुचियों, भावनाओं और व्यक्तित्व को दबा दिया जाता है। जबकि सही दृष्टिकोण यह होना चाहिए कि बच्चे को उसकी क्षमता के अनुसार विकसित किया जाए, न कि उसे किसी और जैसा बनाने की कोशिश की जाए।
 

  • ऑटिज्म का इलाज नहीं बल्कि प्रबंधन और सहयोग ही इसका सही रास्ता है। समय पर पहचान, सही मार्गदर्शन, सीमित लेकिन लक्षित थेरेपी और परिवार का सहयोग बच्चे के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • हर बच्चा अलग होता है और उसकी प्रगति का अपना एक अलग मार्ग होता है। इसलिए किसी एक फॉर्मूले को सभी पर लागू करना उचित नहीं है।
  • यदि स्कूल, परिवार और समुदाय मिलकर एक सहयोगी वातावरण बनाते हैं तो ऑटिज्म के शिकाक बच्चे बेहतर तरीके से अपनी क्षमता को विकसित कर सकते हैं।


ऑटिज्म का सबसे बड़ा काला सच यह नहीं है कि इसका इलाज नहीं है, बल्कि यह है कि इसके नाम पर डर, उम्मीद और जानकारी की कमी का इस्तेमाल करके एक बाजार खड़ा कर दिया गया है। इस स्थिति में सबसे जरूरी है जागरूकता, सही जानकारी और संवेदनशील दृष्टिकोण।

जब हम यह स्वीकार कर लेंगे कि हर बच्चा अलग है और उसी रूप में मूल्यवान है, तभी हम वास्तव में उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकेंगे।



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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। इस लेख के लिए मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी के इनपुट का इस्तेमाल किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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