लाइफस्टाइल और खान-पान की गड़बड़ी ने वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य से संबंधित समस्याओं को काफी बढ़ा दिया है। लिवर की बीमारियों का बोझ भी अब काफी बढ़ गया है। लिवर रोगों को कुछ दशकों पहले तक बढ़ती उम्र के साथ जुड़ी समस्या के तौर पर जाना जाता था, हालांकि अब कम उम्र वाले यहां तक कि बच्चे भी इसका शिकार हो रहे हैं।
Study Alert: 180 करोड़ लोगों पर मंडरा रहा लिवर की बीमारी का खतरा, कहीं आप भी तो नहीं इस लिस्ट में?
World Liver Day 2026: मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (एमएएफएलडी) को नॉन अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (एनएएफएलडी) के नाम से भी जाना जाता है। इसका खतरा अब तेजी से बढ़ता जा रहा है। विशेषज्ञों की चिंता है कि साल 2050 तक दुनिया भर में 180 करोड़ से अधिक लोग इसका शिकार हो सकते हैं।
दुनियाभर में बढ़ रही है एमएएफएलडी की समस्या
मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (एमएएफएलडी) को पहले नॉन अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (एनएएफएलडी) के नाम से भी जाना जाता है।
- ये बीमारियां मेटाबोलिक सिंड्रोम जैसे मोटापा, डायबिटीज औ हाई कोलेस्ट्रॉल के कारण होती हैं, इससे लिवर में फैट जमा होने लगता है।
- ये दुनिया भर की 30% से ज्यादा आबादी को प्रभावित करती है।
- अध्ययन की रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने अलर्ट किया है कि जिस गति से ये बीमारी बढ़ती जा रही है, ऐसे में आशंका है कि 2050 तक दुनिया भर में 180 करोड़ से अधिक लोग मेटाबॉलिक लिवर की बीमारियों का शिकार हो सकता हैं।
- इसकी मुख्य वजह मोटापा और ब्लड शुगर लेवल का बढ़ना है।
30 साल में 143% तक बढ़ गए मामले
'ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज, इंजरीज एंड रिस्क फैक्टर्स' स्टडी से मिले ये नतीजे 'द लैंसेट गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एंड हेपेटोलॉजी' जर्नल में प्रकाशित हुए हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, एमएएफएलडी के मामले तीन दशकों में 143% तक बढ़ गए हैं। हर छह में से लगभग एक व्यक्ति (यानी 16% लोग) इससे प्रभावित है। अनुमान है कि इस बीमारी का प्रसार और भी ज्यादा हो सकता है।
विशेषज्ञों ने कहा, दुनिया की आबादी में बढ़ोतरी के साथ-साथ जीवनशैली में आए बदलाव जैसे कि बढ़ता मोटापा, हाई ब्लड शुगर और हाई ब्लड प्रेशर की समस्या का लिवर की सेहत पर भी गहरा असर पड़ रहा है।
पुरुषों में खतरा अधिक
विशेषज्ञों ने बताया कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में एमएएफएलडी की समस्या का खतरा ज्यादा देखा गया है। 80 साल से अधिक आयु वाले बुजुर्गों में इसका प्रसार दर ज्यादा था।
- प्रभावित लोगों की सबसे बड़ी संख्या कम उम्र के लोगों की थी।
- पुरुषों में लगभग 35-40 वर्ष और महिलाओं में 55-59 वर्ष की आयु वाले इसका सबसे ज्यादा शिकार देखे गए हैं।
दुनियाभर में एमएएफएलडी से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का मुख्य कारण हाई ब्लड शुगर पाया गया था। इसके बाद हाई बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) और धूम्रपान ने लिवर की इस बीमारी को सबसे ज्यादा गति दी है।
लाइफस्टाइल में सुधार से कम हो सकता है जोखिम
अध्ययन में पाया गया कि भले ही अब ज्यादा लोगों को यह बीमारी हो रही है, लेकिन सेहत पर इसका असर कम हो रहा है। इससे यह पता चलता है कि इलाज और देखभाल में सुधार हुआ है।
मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज का संबंध अक्सर वजन बढ़ने से होता है, ऐसे में जीवनशैली में बदलाव करके इसके खतरे को कम किया जा सकता है।
- आमतौर पर इसका पता तभी चलता है, जब कोई मरीज किसी और वजह से अपनी जांच करवाता है।
- इसके लक्षणों में बहुत ज्यादा थकान महसूस होने, आम तौर पर अस्वस्थ महसूस करने और पेट में अक्सर दर्द होता रहता है।
लेखकों ने बताया कि इस अध्ययन के नतीजों से यह बात सामने आई है कि बिगड़ती जीवनशैली और खानपान की गड़बड़ी के चलते, लिवर की बीमारियां अब युवा वयस्कों को अपनी चपेट में ले रही हैं। इसमें कम उम्र से ही सुधार पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
--------------
स्रोत:
Global burden of metabolic dysfunction-associated steatotic liver disease, 1990–2023, and projections to 2050: a systematic analysis for the Global Burden of Disease Study 2023
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
