पितरों को पूजने का पर्व पितृपक्ष 14 सितंबर से शुरू हो रहा है। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक, शुक्रवार को भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा का मान मिलने से पूर्णिमा को मृत्यु पाए पितरों का तर्पण-श्राद्ध कर्म करना इसी दिन श्रेयस्कर रहेगा। 14 सितंबर से आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा लगने से पितृपक्ष में पितरों का पूजन-तर्पण शुरू होगा। जिन तिथियों में पितरों-पूर्वजों की मृत्यु हुई हो, जजमानों को उन्हीं तिथियों में अपने पितर का तर्पण करना चाहिए।
पितृपक्ष 14 से, पूरे मन से करें पितरों के कार्य, नहीं तो भोगने पड़ेंगे ये कष्ट
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सुहागिनों का तर्पण 23 को
23 सितंबर को मातृनवमी का सुहागिन औरतों का तर्पण करना उत्तम रहेगा। सन्यासी, गृहस्थों का श्राद्ध द्वादशी के दिन करना चाहिए। अकाल मृत्यु पाए, शस्त्रों से मृत्यु पाए या जिनका मृत्यु काल स्पष्ट न हो उन्हें चतुर्दशी के दिन श्राद्ध करना चाहिए। अमावस्या का श्राद्ध 28 सितंबर को होगा। इस दौरान मंगल कार्यो से बचना चाहिए।
सामूहिक पिंड तर्पण आज से
उधर, इंदिरा नगर सेक्टर-9 के 9/191 स्थित गायत्री ज्ञान मंदिर में पितृपक्ष के मौकेपर 13 सितंबर से सामूहिक पिंड तर्पण की शुरुआत होगी। मुख्य संयोजक उमानंद शर्मा ने बताया कि पूर्णिमा का तर्पण 13 सितंबर को शुरू होगा। उसके बाद 28 सितंबर तक चलने वाला तर्पण सुबह 5:30 बजे से नियमित चलेगा।
सुबह स्नान-पूजन के बाद जजमान को पितरों को तर्पण के साथ पिंडदान करना चाहिए। हथेली भर अनाज का पिंड (जौं के आटे या खीर या गौ दुग्ध के खोये) बनाकर उसे पितरों को अर्पण करना चाहिये। गंगाजल, कुश, काले तिल, फूल-फल और दुग्ध व उनसे बने खाद्यान्न अर्पण करने चाहिये। मध्यान्ह से पूर्व ब्राह्मण को भोज कराने के साथ उन्हें यथायोग्य वस्त्रादि दान देना चाहिये। सुबह 11 बजकर 33 मिनट से 12 बजकर 21 मिनट के मध्य पितृपक्ष के श्राद्ध का बेहतर समय रहता है।