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Chaitra Navratri: दसवीं सदी से विराजित मां बिरासिनी देवी, रहस्यमयी स्वप्न से प्रकट हुईं; जानें रोचक इतिहास

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उमरिया Published by: उमरिया ब्यूरो Updated Tue, 24 Mar 2026 06:01 AM IST
सार

उमरिया के बिरसिंहपुर पाली स्थित मां बिरासिनी मंदिर की स्थापना धौकल को मिले दिव्य स्वप्न से हुई। कल्चुरी कालीन प्रतिमा और राजा बीरसिंह द्वारा निर्मित मंदिर आस्था का केंद्र बना। 1989 में जीर्णोद्धार हुआ। नवरात्रि में यहां विशाल श्रद्धालु समागम होता है।

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Mother Birasini Devi, who has been enshrined since the tenth century, appeared from a mysterious dream
मां बिरासिनी देवी मंदिर - फोटो : अमर उजाला
उमरिया जिले के बिरसिंहपुर पाली में मां बिरासिनी देवी मंदिर का इतिहास किसी लोककथा से कम नहीं लगता। मान्यता है कि सैकड़ों वर्ष पहले माता ने धौकल नामक एक व्यक्ति को स्वप्न में दर्शन दिए और बताया कि उनकी प्रतिमा एक खेत में दबी हुई है। यह कोई सामान्य सपना नहीं था, बल्कि एक दिव्य संकेत था। धौकल ने जब उस स्थान पर खुदाई करवाई तो सचमुच वहां से माता की प्रतिमा प्राप्त हुई। इसके बाद श्रद्धा भाव से एक छोटी मढ़िया बनाकर माता की स्थापना की गई। यही वह क्षण था, जहां से इस शक्तिपीठ की नींव पड़ी और धीरे-धीरे यह स्थान लोगों की आस्था का केंद्र बनता चला गया।


राजा बीरसिंह और मंदिर निर्माण की विरासत
समय के साथ मां बिरासिनी की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। नगर के राजा बीरसिंह ने इस स्थल के महत्व को समझते हुए यहां भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि उस दौर की आस्था और संस्कृति का प्रतीक बन गया। बाद के वर्षों में मंदिर का महत्व लगातार बढ़ता गया और श्रद्धालुओं की संख्या में भी वृद्धि होती रही।

ये भी पढ़ें- Chaitra Navratri: उज्जैन में हरसिद्धि ही नहीं अवंतिका देवी का भी है शक्तिपीठ, जानिए अधिष्ठात्री देवी का महत्व

 
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मां बिरासिनी देवी मंदिर - फोटो : अमर उजाला
कल्चुरी कालीन प्रतिमा की अनोखी पहचान
मंदिर में स्थापित मां बिरासिनी की प्रतिमा को कल्चुरी कालीन माना जाता है, जिसका निर्माण लगभग 10वीं सदी में हुआ था। काले पत्थर से निर्मित यह प्रतिमा अत्यंत आकर्षक और दिव्य प्रतीत होती है। खास बात यह है कि महाकाली स्वरूप की इस प्रतिमा में माता की जिह्वा बाहर नहीं है, जो इसे देश की अन्य प्रतिमाओं से अलग बनाती है। गर्भगृह में माता के साथ भगवान हरिहर भी विराजमान हैं, जो शिव और विष्णु का संयुक्त स्वरूप हैं। चारों ओर अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं इस स्थान को और भी पवित्र बनाती हैं।

 
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Mother Birasini Devi, who has been enshrined since the tenth century, appeared from a mysterious dream
मां बिरासिनी देवी मंदिर में उमड़े भक्त - फोटो : अमर उजाला
जीर्णोद्धार से भव्यता तक का सफर
आधुनिक समय में मंदिर को नया स्वरूप देने का कार्य वर्ष 1989 में शुरू हुआ, जब जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के मार्गदर्शन में जीर्णोंद्धार की नींव रखी गई। स्थानीय नागरिकों, कोयला कंपनियों के प्रबंधन और दानदाताओं के सहयोग से करीब 27 लाख रुपये की लागत से भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। वास्तुकार विनायक हरिदास द्वारा तैयार डिजाइन ने इस मंदिर को एक विशेष पहचान दी। वर्ष 1999 में शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के सान्निध्य में मंदिर का लोकार्पण हुआ।


 
Mother Birasini Devi, who has been enshrined since the tenth century, appeared from a mysterious dream
मां बिरासिनी देवी मंदिर में की गई दीपों की सजावट - फोटो : अमर उजाला
नवरात्रि में जीवंत होती सदियों पुरानी आस्था
चैत्र नवरात्रि के अवसर पर यह प्राचीन धाम एक बार फिर जीवंत हो उठता है। पहले ही दिन घटस्थापना के साथ भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है। दूर-दराज से आए श्रद्धालु माता के दर्शन कर अपने जीवन में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। ज्वारा कलश, भजन-कीर्तन, भंडारे और जुलूस इस पूरे वातावरण को पूरी तरह भक्तिमय बना देते हैं। आज मां बिरासिनी धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि इतिहास, रहस्य और अटूट आस्था का ऐसा संगम है, जहां हर श्रद्धालु को दिव्यता का अनुभव होता है।
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