रायसेन जिले में भक्त नौ दिनों तक भक्ति में लीन थे और भक्त माता के जवारे विसर्जन करने भक्ति भाव से निकले पर। वो क्षण मन को दहलाने वाला था, जब भक्त लोहे का बाना (त्रिशूल) अपने गाल और जिह्वा में छेदकर पहनते हैं। वाना/यह माता की शक्ति ही तो है कि गाल में न खून आता है और न ही कोई दर्द होता है। न ही किसी प्रकार की दवा की अवश्यकता पड़ती है। मात्र भावूत यानी धूली लगाने से घाव भर जाता है और निशान मिट जाता है।
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नाचते-गाते भक्त
- फोटो : अमर उजाला
रायसेन के उदयपुरा में प्रति वर्ष भक्त अलग अंदाज में भक्ति में डूब कर माता का विसर्जन करते हैं। पंडा और भक्तों की माने तो यह मां शकित की भक्ति का प्रताप है और यह कई पीढ़ियों से चला आ रहा है। भक्त वान पहने हुए नाचते भी हैं पर कोई दर्द नहीं होता है। नौ दिन तक माता को भक्त अलग- अलग भक्ति भाव से मनाते हैं और कुछ भक्त लोहे का दस फीट लंबा और दस से पंद्रह किलो का त्रिशूल (वाना) पहनकर माता को मनाते हैं। यह आस्था हैं या अंधविश्वास?
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माता की यात्रा निकालते हुए
- फोटो : अमर उजाला
मां की भक्ति में एक नहीं, बल्कि दर्जनों लोग गाल में त्रिशूल फंसाये मस्ती में झूमते हुए चलते हैं। इस प्राचीन अनोखी परंपरा को स्थानीय भाषा में 'बाना पहनना' कहा जाता है। दअरसल, नौ दिन तक माता की भक्ति के बाद आज जब माता की ज्वारे विसर्जन के लिए रायसेन जिले के उदयपुरा में सिर और ज्वारे ले कर लोग निकले तो उनके अलग-अलग भक्ति भाव देखते ही बन रहे थे। इन्हीं में कुछ भक्त लोहे का दस फीट लंबा और 10-15 किलो का लोहे का त्रिशूल (वाना) पहनकर माता के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते नजर आए। अब इसे आस्था कहे या अंधविश्वास यह सवाल लोगों के सामने है।
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गाल छेदते हुए
- फोटो : अमर उजाला
रायसेन में भक्त नौ दिनों तक भक्ति में लीन थे और भक्त माता के ज्वारे विसर्जन करने भक्ति भाव से निकले। इस दौरान वो क्षण मन को दहलाने वाला था, जब भक्त लोहे का बाना (त्रिशूल) अपने गाल और जीभ में छेदकर धारण करते नजर आए। इसे यह माता की शक्ति मानते हैं, जिस कारण इनके गाल में न खून आता हैं और न ही कोई दर्द होता है। न ही किसी प्रकार की दवा की आवश्यकता पड़ती है।
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नाचते-गाते जाते हुए लोग
- फोटो : अमर उजाला
मात्र भावूत यानी धूनी लगाने से घाव भर जाता है और निशान मिट जाता है। रायसेन में हर साल भक्त अलग अंदाज में भक्ति में डूबकर माता का विसर्जन करते हैं। पंडा और भक्तों की माने तो यह मां की शक्ति की भक्ति का प्रताप है और यह कई पीढ़ियों से चला आ रहा है। भक्त वान पहने हुए नाचते भी हैं, पर कोई दर्द नहीं होता।
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