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Ujjain's Bhukhi Mata is offered animal sacrifices and alcohol, with a history also linked to human sacrifice.
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Chaitra Navratri: उज्जैन की भूखी माता को चढ़ती है पशु बलि और लगता है शराब का भोग, नरबलि से भी जुड़ा है इतिहास
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
Published by: उज्जैन ब्यूरो
Updated Wed, 25 Mar 2026 06:01 AM IST
सार
उज्जैन में शिप्रा नदी किनारे स्थित भुवनेश्वरी भूखी माता मंदिर में दो बहन देवियां विराजमान हैं। कथा अनुसार राजा विक्रमादित्य ने नरबलि प्रथा समाप्त करवाई। आज यहां पशु बलि की परंपरा जारी है, साथ ही मंदिर के स्थानांतरण से जुड़ी मान्यताएं भी प्रचलित हैं।
धार्मिक नगरी उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे भूखी माता का बहुत प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर में दो देवियां विराजमान हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि यह दोनों बहनें हैं। इनमें से एक को भूखी माता और दूसरी को भुवनेश्वरी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर को भुवनेश्वरी भूखी माता मंदिर भी कहा जाता है। कहा जाता है कि आज भी इस मंदिर में पशु बलि देने और शराब का भोग लगाने की प्रथा सदियों से चली आ रही है।
मंदिर की यह है पौराणिक कथा
मंदिर के पुजारी विजय चौहान ने बताया कि भूखी माता को प्रतिदिन एक युवक की बलि दी जाती थी। एक बार एक दुखी मां राजा विक्रमादित्य के पास गई। उसके बेटे की बलि चढ़ाई जानी थी। तब विक्रमादित्य ने माता से नरबलि नहीं लेने का आग्रह किया। यह भी कहा कि यदि देवी ने उनकी बात नहीं मानी तो वे खुद उनका आहार बनेंगे। वृद्धा के जाने के बाद विक्रमादित्य ने कई तरह के पकवान बनवाने का आदेश दिया। इन पकवानों से पूरे शहर को सजा दिया गया। एक तख्त पर मिठाइयों के साथ मिठाइयों से बना एक मानव पुतला लिटा दिया। विक्रमादित्य खुद उसके नीचे छिप गए। रात को सभी देवियों ने पकवानों का स्वाद लिया। जब जा रही थीं, तब एक देवी ने जानना चाहा कि आखिर तख्त पर क्या रखा है। देवी ने वहां रखे पुतले को खा लिया और देवी खुश हो गई। इतने में विक्रमादित्य आए और हाथ जोड़कर बताया कि उन्होंने ही इसे रखवाया है। देवी ने वरदान मांगने को कहा, तब विक्रमादित्य ने कहा कि कृपा कर आप नदी के उस पार विराजमान रहें। देवी ने कहा कि तुम्हारे वचन का पालन होगा। उस देवी का नाम भूखी माता रख दिया गया। इसके बाद विक्रमादित्य ने नदी के उस पार मंदिर बनवाया। इसके बाद देवी ने कभी नरबलि नहीं ली।
अब पशुओं की दी जाती है बलि
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, मंदिर में अब इंसान की बलि नहीं दी जाती है। पशुओं की बलि दी जाती है। ऐसे में ग्रामीण इलाकों के लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर यहां आकर बलि प्रथा का निर्वहन करते हैं। कई लोग पशु क्रूरता अधिनियम के तहत बलि नहीं देते और पशुओं का अंग-भंग कर मंदिर में ही छोड़ देते हैं।
पुजारी को दिया था माता ने स्वप्न
दरअसल, उज्जैन शहर में शिप्रा नदी किनारे कर्कराज मंदिर के समीप अति प्राचीन भूखी माता का मंदिर है। यहां के पुजारी विजय चौहान बताते हैं कि उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने शिप्रा नदी किनारे इस मंदिर में देवी भूखी से विराजमान होने का और लोगों का कल्याण करने का आग्रह किया था। तभी से देवी यहां विराजमान हैं। वर्तमान में माता के दो मंदिर हैं, जो आसपास बने हुए हैं। इन मंदिरों की अपनी कहानी है। बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि पुराना मंदिर एकदम से शिप्रा नदी के किनारे स्थित था। जब नदी उफान पर होती थी लोग देवी के दर्शन नहीं कर पाते थे। ऐसे में देवी मां ने तत्कालीन पुजारी के स्वप्न में आकर दर्शन दिए। कहा कि मुझे ऊंची चट्टान पर स्थान दो, जिससे नदी में बाढ़ आने पर भी भक्तों को मंदिर में आने के लिए कष्ट ना हो। तब जाकर ये विशाल मंदिर का निर्माण हुआ जो आज भी है। दोनों मंदिरों में भक्त मां की पूजा-अर्चना करते हैं। एक नदी में और दूसरा ऊंची चट्टान पर बना है।
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