सलूंबर के लसाड़िया और झल्लारा क्षेत्र में फैली रहस्यमयी बीमारी का प्रकोप थमने का नाम नहीं ले रहा है। पांच दिन में पांच मासूमों की मौत के बाद अब दो और मासूम मौत की बलि चढ़ गए, जिसके बाद से पूरे क्षेत्र में दहशत का माहौल है। बीते सात दिनों में अब तक कुल 7 बच्चों की जान जा चुकी है।
Rajasthan: मौत की बलि चढ़े दो और मासूम, रहस्यमयी बीमारी से सात दिन में सात मौत, अंधविश्वास से बिगड़ रहे हालात
सलूंबर में फैली रहस्यमयी बीमारी से अब 7 दिनों में 7 मासूमों की मौत हो चुकी है। मासूमों की लगातार मौतों के बाद भी अंधविश्वास के चलते कई ग्रामीण इलाज छोड़ मंदिरों का सहारा ले रहे हैं, जिससे हालात और गंभीर होते जा रहे हैं।
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एक दिन में बिगड़ती हालत, 24 घंटे में मौत
चौंकाने वाली बात यह है कि इस बीमारी में बच्चों की हालत अचानक बिगड़ रही है। परिजनों के अनुसार बच्चों को पहले हल्की उल्टी या बुखार होता है लेकिन कुछ ही घंटों में स्थिति गंभीर हो जाती है और 24 घंटे के भीतर मौत हो जाती है। पांच मासूमों की मौत के बाद अब झल्लारा के आमलोदा गांव के 4-5 वर्षीय रौनक और लसाड़िया के कालीभीत गांव के 2 माह के मासूम बंशी की मौत ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया है।
छोटे बच्चों पर सबसे ज्यादा असर
इससे पहले 2 से 6 अप्रैल के बीच पांच बच्चों की मौत हो चुकी है, जिनमें दो सगे भाई भी शामिल थे। सभी बच्चों में बीमारी के समान लक्षण पाए गए उल्टी, दस्त और तेज बुखार।
मरने वाले बच्चों की उम्र भी लगभग 2 से 4 वर्ष के बीच ही रही है, जिससे यह स्पष्ट है कि यह बीमारी छोटे बच्चों के लिए बेहद घातक साबित हो रही है।
लगातार हो रही मौतों के बाद जिला प्रशासन और चिकित्सा विभाग हाई अलर्ट पर है। जयपुर और उदयपुर से विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीमों को मौके पर भेजा गया है। ये टीमें गांव-गांव जाकर बच्चों की जांच, सैंपलिंग और स्वास्थ्य सर्वे कर रही हैं। अब तक 500 से अधिक परिवारों का सर्वे किया जा चुका है, जिसमें करीब 20 बच्चों में हल्के बुखार के लक्षण पाए गए हैं। उन्हें तुरंत दवाइयां देकर उपचार शुरू किया गया है।
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इस गंभीर स्थिति के बीच अंधविश्वास सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। कई ग्रामीण बीमारी को मानने से इंकार कर रहे हैं। जांच के लिए पहुंची चिकित्सा टीमों का विरोध करते हुए परिजन बच्चों की जांच कराने से मना कर रहे हैं और कहते हैं कि माताजी के मंदिर ले जाने से बच्चे ठीक हो जाएंगे। इसी कारण कई गांवों में चिकित्सा टीमों को बिना जांच किए लौटना पड़ रहा है, जिससे बीमारी की सही पहचान और इलाज में देरी हो रही है।