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सदियों पुरानी परंपरा आज भी कायम, कुंडली न मिलने पर यहां ऐसे होती है शादी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मंडी
Published by: अरविन्द ठाकुर
Updated Thu, 25 Jul 2019 05:26 PM IST
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हिमाचल को देवभूमि यूं ही नहीं कहा जाता है। सदियों पुरानी परंपराएं आज भी कायम हैं। ऐसी ही एक परंपरा मंडी जिले की सराज घाटी में सदियों से चली आ रही है। बरसात के मौसम में यहां कई स्थानों पर मेले होते हैं। इन मेलों में गंधर्व विवाह की परंपरा भी है। एक-दूसरे को पसंद करने वाले युवा इन मेलों का बेसब्री से इंतजार करते हैं।
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मान्यता है कि जिन जोड़ों की कुंडली का मिलान नहीं होता है। ऐसे जोड़े इन मेलों में आकर देवता के सामने शादी करते हैं। देवताओं का आशीर्वाद मिलने के बाद कुंडली न मिलने की चिंता दूर हो जाती है। इन दिनों पंडोह से छतरी और बाखलीनाल से डाहर बालीचौकी तक देव समागम चले हुए हैं।
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यह सिलसिला सितंबर माह के अंत तक चलता रहेगा। बरसात के इन मेलों में लोग पारंपरिक नाटियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, खेलकूद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हैं। इसके अलावा इन मेलों में कई जोड़े बनते हैं और गंधर्व विवाह भी होते हैं।
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ऐसा ही मेला रांगचा गांव में हुआ। इस दौरान कई जोड़ों एक दूसरे के साथ परिणय सूत्र में बंधे। मेले में इसमें सराज के आराध्य देवता शैटीनाग, देवता विष्णु नारायण, देवता घलयालू, देवता भूजा ऋषि, देवता कमरुनाग और देवता पांचवीर के साथ सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लिया और देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त किया।
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फाइल फोटो
इस दौरान श्रद्धालुओं ने देवताओं के समक्ष अपनी समस्याएं भी रखीं। देवता के कारदार हिम्मत राम ने बताया है कि इस मेले को देवता के आदेशानुसार हर वर्ष मनाया जाता है। इसमें दूरदराज क्षेत्रों के सैकड़ों भक्त आते हैं।
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