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छत्रपति शिवाजी महाराज के काल में 11 को मनाते थे मकर संक्रांति तो अब 14 को क्यों? जानें रहस्य

शैली प्रकाश Published by: श्वेता सिंह Updated Tue, 13 Jan 2026 12:17 PM IST
सार

  • प्राचीन समय में मकर संक्रांति 15 दिसंबर को थी
  • वर्तमान में इसे 14 जनवरी को मनाया जाता है
  • भविष्य में यह फरवरी और मार्च तक खिसक सकती है
  • बदलाव सूर्य के वास्तविक मार्ग और खगोल विज्ञान से जुड़ा है
  • मकर संक्रांति की तारीख अन्य त्योहारों की तरह हर साल समान नहीं रहती

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Makar Sankranti 2026 Date Change Explained From Chhatrapati Shivaji’s Era to Today
makar sankranti 2026 - फोटो : amar ujala

Makar Sankranti Ki Tithiyon Ka Rahasya: अक्सर हमारे मन में यह सवाल आता है कि दिवाली या होली की तरह मकर संक्रांति की तारीख हर साल क्यों नहीं बदलती? और अगर यह स्थिर है, तो इतिहास के पन्नों में इसकी तारीखें अलग क्यों दर्ज हैं? इसका जवाब छिपा है 'अयन चलन' (Precession of the Equinoxes) के वैज्ञानिक सिद्धांत में। इतिहास में मकर संक्रांति 15 दिसंबर से आगे खिसककर 14 जनवरी तक आई है, न कि पीछे। यानी बहुत प्राचीन समय में यह दिसंबर में थी और भविष्य में यह फरवरी और मार्च में चली जाएगी।


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72 से 80 वर्षों में मकर संक्रांति 1 दिन आगे खिसक जाती है। - फोटो : adobe

सूर्य की गति और 20 सेकंड का खेल
सूर्य की गति: ज्योतिषीय और खगोलीय गणनाओं के अनुसार, पृथ्वी की धुरी (Axis) स्थिर नहीं है; यह बहुत धीमी गति से घूमती है। इस कारण सूर्य की गति प्रतिवर्ष लगभग 20 सेकंड बढ़ जाती है (खगोलीय दृष्टि से सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 20 सेकंड देरी से होता है)।
घंटों में बदल जाता है सेकंड: भले ही 20 सेकंड का समय बहुत कम लगे, लेकिन सदियों के कालखंड में यह समय घंटों और दिनों में बदल जाता है:
72 से 80 वर्षों में मकर संक्रांति 1 दिन आगे खिसक जाती है।
1000 वर्षों में सूर्य की स्थिति में लगभग 2 हफ्ते (14-15 दिन) का अंतर आ जाता है।
नोट: दरअसल, सूर्य की गति "बढ़" नहीं रही है, बल्कि पृथ्वी की धुरी के "डगमगाने" (Wobbling) के कारण सूर्य का मकर राशि में प्रवेश हमें देरी से अनुभव होता है।

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Makar Sankranti 2026 Date Change Explained From Chhatrapati Shivaji’s Era to Today
लगभग 1600-1700 साल पहले मकर संक्रांति 21-22 दिसंबर के आसपास होती थी - फोटो : अमर उजाला

इतिहास के आईने में मकर संक्रांति
कालखंड: इतिहास इस बात का गवाह है कि यह पर्व हमेशा 14 जनवरी को नहीं मनाया जाता था। अलग-अलग कालखंडों में इसकी तारीखें इस प्रकार थीं:
सम्राट हर्षवर्धन काल (7वीं सदी): उस समय सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 24 दिसंबर के आसपास होता था।
गुप्त काल: सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के समय के आसपास (लगभग 1600-1700 साल पहले) मकर संक्रांति 21-22 दिसंबर के आसपास होती थी (जो कि वास्तविक उत्तरायण का समय है)।
कुषाण काल या उससे पहले: ईसा पश्चात की शुरुआती सदियों (1st-2nd Century AD) में यह खिसककर 15 से 20 दिसंबर के बीच रही होगी।
मुगल बादशाह अकबर काल (16वीं सदी): इस दौरान संक्रांति 10 जनवरी को मनाई जाती थी।
छत्रपति शिवाजी महाराज काल (17वीं सदी): मराठा साम्राज्य के गौरवशाली काल में यह पर्व 10-11 जनवरी को पड़ता था।
वर्तमान काल (21वीं सदी): अब हम इसे 14 या 15 जनवरी को मनाते हैं।

Makar Sankranti 2026 Date Change Explained From Chhatrapati Shivaji’s Era to Today
5000 वर्ष बाद यह पर्व जनवरी छोड़ कर फरवरी के महीने में प्रवेश कर जाएगा। - फोटो : Adobe stock

भविष्य की गणना (जब फरवरी और मार्च में आएगी संक्रांति)
सूर्य की गति: चूंकि सूर्य की गति का यह बदलाव निरंतर जारी है, इसलिए भविष्य में मकर संक्रांति की तारीखें और आगे बढ़ती जाएंगी।
वर्ष 2600: मकर संक्रांति 23 जनवरी को मनाई जाएगी।
5000 वर्ष बाद: यह पर्व जनवरी छोड़ कर फरवरी के महीने में प्रवेश कर जाएगा।
वर्ष 7015: खगोलीय गणना के अनुसार, उस समय मकर संक्रांति 23 मार्च को मनाई जाने लगेगी।

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प्राचीन काल में उत्तरायण और मकर संक्रांति एक ही दिन होते थे 21-22 दिसंबर। - फोटो : amar ujala

मकर संक्रांति और उत्तरायण में है अंतर 
मकर संक्रांति का सीधा संबंध 'उत्तरायण' से है। प्राचीन काल में उत्तरायण और मकर संक्रांति एक ही दिन होते थे (21-22 दिसंबर)। लेकिन पृथ्वी की गति में आए इस बदलाव के कारण अब उत्तरायण 21 दिसंबर को होता है, जबकि सूर्य का मकर राशि में प्रवेश (मकर संक्रांति) 14-15 जनवरी को। वैज्ञानिक आधार पर यह पर्व हमारे सौर मंडल की अद्भुत गतिशीलता का प्रतीक है। उत्तरायण और मकर संक्रांति के बीच के अंतर को समझना बहुत दिलचस्प है, क्योंकि आज के समय में हम इन दोनों को एक ही मान लेते हैं, जबकि विज्ञान की दृष्टि से इनमें लगभग 24-25 दिनों का अंतर आ चुका है।

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