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एर्लिंग हालंद: गोल्स के पीछे छिपे आंसू और संघर्ष की कहानी; एक बेटा जो पिता के अधूरे सपने को पूरा करने में जुटा

स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, न्यूयॉर्क Published by: स्वप्निल शशांक Updated Tue, 23 Jun 2026 08:50 AM IST
सार

कभी नॉर्वे के छोटे से कस्बे ब्रायने की गलियों में फुटबॉल खेलने वाला एक लड़का आज पूरे देश की उम्मीद बन चुका है। एर्लिंग हालंद ने फीफा विश्वकप 2026 में अपने पहले ही विश्वकप में धमाकेदार प्रदर्शन करते हुए नॉर्वे को राउंड ऑफ-32 में पहुंचा दिया है। लेकिन उनके गोलों और रिकॉर्ड्स के पीछे एक ऐसी कहानी छिपी है, जिसमें पिता का सपना, संघर्ष, आंसू, दबाव और देश के लिए कुछ बड़ा करने की जिद शामिल है। यही वजह है कि एर्लिंग हालंद सिर्फ एक फुटबॉलर नहीं, बल्कि लाखों लोगों की प्रेरणा बन चुके हैं।

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From World Cup Debut to National Hero: The Emotional Journey of Erling Haaland Story FIFA World Cup 2026
एर्लिंग हालंद - फोटो : FIFA.COM
आज दुनिया उन्हें गोल मशीन कहती है....डिफेंडर उनका नाम सुनकर घबरा जाते हैं...स्टेडियम उनके नाम के नारों से गूंज उठते हैं, लेकिन एर्लिंग हालंद की कहानी किसी बड़े शहर या आलीशान फुटबॉल अकादमी से शुरू नहीं हुई थी। उनका बचपन नॉर्वे के छोटे से कृषि प्रधान कस्बे ब्रायने में बीता। यह वह जगह थी जहां फुटबॉल सिर्फ एक खेल था, कोई कारोबार नहीं। वहां के कोच आज भी उन्हें एक साधारण, हंसमुख और शरारती लड़के के रूप में याद करते हैं।


दिलचस्प बात यह है कि बचपन में हालंद इतने लंबे और ताकतवर नहीं थे। किशोरावस्था के अंतिम वर्षों में उनकी लंबाई तेजी से बढ़ी। इससे पहले तक वह तकनीक, गेंद पर नियंत्रण और मूवमेंट पर काम करते रहे। बाद में जब ताकत और कद उनके साथ जुड़ गए तो वह दुनिया के सबसे खतरनाक स्ट्राइकरों में बदल गए।
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पिता एल्फ इंगे हालंद के साथ एर्लिंग हालंद - फोटो : FIFA.COM
पिता का सपना, बेटे की जिम्मेदारी
एर्लिंग हालंद के लिए फुटबॉल सिर्फ करियर नहीं है। यह एक विरासत है। उनके पिता अल्फी हालंद भी पेशेवर फुटबॉलर रहे और 1994 विश्वकप में नॉर्वे का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। बचपन से एर्लिंग अपने पिता की कहानियां सुनते हुए बड़े हुए। उन्होंने देखा कि विश्वकप किसी खिलाड़ी के लिए क्या मायने रखता है। शायद यही वजह है कि जब एर्लिंग पहली बार विश्वकप के मंच पर उतरे तो वह सिर्फ अपने लिए नहीं खेल रहे थे। वह अपने पिता के अधूरे सपनों, अपने परिवार की उम्मीदों और पूरे नॉर्वे के गर्व को साथ लेकर मैदान में उतरे थे।

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एर्लिंग हालंद - फोटो : FIFA.COM
विश्वकप डेब्यू और दुनिया को संदेश
वर्षों तक दुनिया यह सवाल पूछती रही कि क्या हालंद कभी विश्वकप खेल पाएंगे? नॉर्वे लंबे समय तक विश्व फुटबॉल के सबसे बड़े मंच से दूर रहा। कई महान खिलाड़ियों का सपना अधूरा रह गया। लेकिन 2026 में आखिरकार नॉर्वे ने वापसी की और उसके साथ एर्लिंग हालंद का विश्वकप सपना भी पूरा हुआ। विश्वकप के पहले दो मैचों में ही उन्होंने चार गोल दाग दिए। ऐसा लगा जैसे वह इस मंच का वर्षों से इंतजार कर रहे थे। सेनेगल के खिलाफ मुकाबले में उन्होंने दो और गोल दागकर नॉर्वे को 3-2 की रोमांचक जीत दिलाई। यह जीत सिर्फ तीन अंक नहीं थी। यह नॉर्वे के लिए नॉकआउट चरण का टिकट थी।
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एर्लिंग हालंद - फोटो : FIFA.COM
जब हालंद ने फिर संभाली जिम्मेदारी
सेनेगल के खिलाफ मुकाबला आसान नहीं था। पहले हाफ के अंत में मार्कस होल्मग्रेन पेडर्सन ने नॉर्वे को बढ़त दिलाई। लेकिन असली कहानी दूसरे हाफ में लिखी गई। मार्टिन ओडेगार्ड के शानदार पास पर हालंद ने 48वें मिनट में गोल कर बढ़त दोगुनी कर दी। सेनेगल ने तुरंत जवाब दिया, लेकिन पांच मिनट बाद ही हालंद फिर सामने आए और करीब से गेंद को जाल में पहुंचा दिया। आखिरी मिनटों में सेनेगल ने एक और गोल कर मैच को रोमांचक बना दिया, लेकिन नॉर्वे ने जीत बचा ली। मैच खत्म हुआ तो स्कोरबोर्ड पर नॉर्वे की जीत दर्ज थी, लेकिन असल में यह एर्लिंग हालंद की रात थी।
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एर्लिंग हालंद - फोटो : FIFA.COM
गोल मशीन के पीछे छिपा संवेदनशील इंसान
मैदान पर हालंद को देखकर लगता है जैसे भावनाएं उन्हें छूती ही नहीं होंगी। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। करीबी लोग बताते हैं कि वह अपनी भावनाओं को दबाने के बजाय उन्हें स्वीकार करते हैं। घबराहट हो, दबाव हो या डर, वह उनसे भागते नहीं हैं। चैंपियंस लीग जीतने के बाद उनकी आंखों में आए आंसू दुनिया ने देखे थे। वह सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं थी, बल्कि बचपन के सपने के सच होने का क्षण था।
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