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एटीएम के बारे में ये बातें आप शायद नहीं जानते

बीबीसी Updated Tue, 15 Nov 2016 05:23 PM IST
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बैंकिंग की परिभाषा बदल देने वाले ऑटोमेटेड टेलर मशीन या एटीएम आजकल बड़े पैमाने पर खाली हैं जिसकी वजह से हमारी जेबें भी खाली हो गईं हैं। लेकिन जरा पल भर थमकर कल्पना कीजिए कि अगर एटीएम ही ना होते, तो क्या होता? और जब दहशत कम हो, तो शुक्रिया अदा करिए एटीएम देने वाले जॉन शेफर्ड-बैरन का। बैरन का जन्म उसी भारत में हुआ, जहां इन दिनों एटीएम से कामयाब होकर लौटना ओलंपिक मेडल जीतने सरीखा है।
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इंसानी जिंदगी और पैसे का खेल पूरी तरह बदल दिया

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बैरन का जन्म 23 जून, 1925 को शिलॉन्ग में हुआ, जो आज मेघालय में है, लेकिन तब असम का हिस्सा हुआ करता था। स्कॉटलैंड से ताल्लुक रखने वाले उनके पिता उत्तरी बंगाल में चटगांव पोर्ट कमिश्नर्स के चीफ इंजीनियर थे। वो साल 2010 में दुनिया छोड़ गए, लेकिन नहाते हुए उनके दिमाग में आए एक विचार ने इंसानी जिंदगी और पैसे का खेल पूरी तरह बदल दिया।
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1967 में दुनिया की पहली एटीएम मशीन लंदन के एक बैंक में लगी

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साल 1967 में दुनिया की पहली एटीएम मशीन लंदन के एक बैंक में लगी। टीवी सिरीज 'ऑन द बसेज' के रेग वार्ने एनफील्ड में बारक्लेज बैंक से पैसा निकालने वाले पहले शख्स बने। उस वक्त इसे 'होल इन द वॉल' कहा गया। रिजर्व बैंक के मुताबिक देश भर में 56 सरकारी और निजी बैंकों के दो लाख से अधिक एटीएम हैं। इनमें एक लाख से अधिक ऑनसाइट और एक लाख से कुछ कम ऑफसाइट एटीएम हैं।

ऑनसाइट एटीएम के मायने उन मशीनों से हैं, जो बैंक शाखा में या उसके साथ लगी हैं, जबकि ऑफसाइट एटीएम बैंक शाखा से अलग या स्टैंडअलोन मशीनें हैं। लेकिन सभी कम पड़ने लगीं।

साल 2007 में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में शेफर्ड बैरन ने कहा था, "दिमाग में विचार आया कि मेरे पास ब्रिटेन या दुनिया में कहीं भी पैसा निकालने का कोई तरीका होना चाहिए। चॉकलेट बार देने वाली मशीन की तरह, जिसमें से चॉकलेट के बजाय पैसा निकले।"

चॉकलेट बार देने वाली मशीन की तर्ज पर बनाई एटीएम मशीन

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बारक्लेज के चीफ एग्जिक्यूटिव ने शैफर्ड के साथ करार किया और काम शुरू हो गया। तब तक प्लास्टिक कार्ड इजाद नहीं हुआ था, सो इस मशीन में चेक इस्तेमाल होते थे। इन चेक में कार्बन 14 लगा होता था, जो मशीन पहचानती थी और पर्सनल आइडेंटिफिकेशन नंबर यानी पिन की मदद से चेक जांचती थी। मशीन उस वक्त अधिकतम 10 पाउंड निकालती थी।

पिन चार अंकों का क्यों बना, इसका राज भी शैफर्ड ने बताया। उन्हें छह अंक वाला अपना आर्मी नंबर याद था, लेकिन पत्नी कैरोलीन ने उनकी एक नहीं चलने दी। शैफर्ड ने बीबीसी को बताया था, "पत्नी ने कहा कि उसे सिर्फ चार अंक ही याद रहते हैं, इसलिए उसकी वजह से पिन में चार अंक ही विश्व मानक बन गए।"
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