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Highcourt: रेल हादसा पीड़ितों को तय मुआवजे के अलावा मिलेगा इलाज का खर्च, चंडीगढ़ निवासी की अपील पर फैसला

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: Nivedita Updated Thu, 25 Jun 2026 11:13 AM IST
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सार

जस्टिस पंकज जैन की पीठ ने यह फैसला चंडीगढ़ निवासी सतनाम सिंह की अपील स्वीकार करते हुए सुनाया। दुर्घटना के समय सतनाम सिंह स्नातक का छात्र था और ट्रेन में एक बोनाफाइड यात्री के रूप में यात्रा कर रहा था। हादसे में उसके दोनों पैर कट गए थे।

High Court Train accident victims to receive medical expenses in addition to fixed compensation
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने रेल दुर्घटनाओं के पीड़ितों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि रेलवे दुर्घटना मुआवजा नियमों के तहत मिलने वाली निर्धारित राशि में इलाज पर हुआ वास्तविक खर्च और भविष्य के उपचार की जरूरतें स्वत: शामिल नहीं मानी जा सकतीं। 



अदालत ने स्पष्ट किया कि गंभीर रूप से घायल यात्रियों को केवल तय मुआवजा देकर उनके चिकित्सा खर्चों से वंचित नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने इस सिद्धांत को लागू करते हुए दोनों पैर गंवा चुके एक युवक को पहले से मिले चार लाख रुपये के मुआवजे के अतिरिक्त 1.20 लाख रुपये चिकित्सा खर्च और दो लाख रुपये कृत्रिम पैर लगवाने के लिए देने का आदेश दिया। 
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जस्टिस पंकज जैन की पीठ ने यह फैसला चंडीगढ़ निवासी सतनाम सिंह की अपील स्वीकार करते हुए सुनाया। दुर्घटना के समय सतनाम सिंह स्नातक का छात्र था और ट्रेन में एक बोनाफाइड यात्री के रूप में यात्रा कर रहा था। हादसे में उसके दोनों पैर कट गए थे।
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रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने रेलवे दुर्घटना (मुआवजा) नियम, 1990 के तहत उसे चार लाख रुपये का मुआवजा दिया था। हालांकि सतनाम सिंह ने हाई कोर्ट में अपील दायर कर कहा कि इलाज पर 1.19 लाख रुपये से अधिक खर्च हो चुका है और भविष्य में कृत्रिम अंगों तथा अन्य उपचार के लिए भी बड़ी राशि की आवश्यकता होगी।

रेलवे की ओर से दलील दी गई कि दुर्घटना और ट्रिब्यूनल का फैसला 1 जनवरी 2017 से पहले का है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट के रीना देवी मामले के अनुसार निर्धारित अनुसूची के तहत ही मुआवजा दिया जा सकता है।

हाई कोर्ट ने कहा कि विवाद का मूल प्रश्न यह नहीं है कि निर्धारित मुआवजा कितना है, बल्कि यह है कि क्या उस राशि में चिकित्सा खर्च और भविष्य के उपचार की लागत भी शामिल मानी जाए। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि मुआवजे की सीमा के कारण पीड़ित वास्तविक चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति से वंचित रह जाए।

पीठ ने कहा कि रेलवे की जिम्मेदारी ‘स्ट्रिक्ट लाइबिलिटी’ के सिद्धांत पर आधारित है। कई मामलों में दुर्घटना पीड़ितों का पूरा जीवन बदल जाता है और निर्धारित मुआवजा उनके इलाज का खर्च तक पूरा नहीं कर पाता। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि 1990 में बनाए गए नियमों में संशोधन होने के बावजूद वर्तमान समय में चिकित्सा सेवाओं की लागत काफी बढ़ चुकी है।

कोर्ट ने कहा कि कल्याणकारी कानूनों की व्याख्या हमेशा उद्देश्यपरक और उदार तरीके से की जानी चाहिए। नियम-4 केवल निर्धारित मुआवजे की अधिकतम सीमा तय करता है, लेकिन इससे अदालतों की यह शक्ति समाप्त नहीं होती कि वे वास्तविक चिकित्सा खर्च और भविष्य के उपचार के लिए अतिरिक्त सहायता प्रदान करें।

अदालत ने माना कि चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति और कृत्रिम अंगों के लिए आर्थिक सहायता देना कानून के उद्देश्य को आगे बढ़ाता है। इसी आधार पर ट्रिब्यूनल के आदेश में संशोधन करते हुए हाई कोर्ट ने सतनाम सिंह को 1.20 लाख रुपये चिकित्सा खर्च तथा दो लाख रुपये कृत्रिम पैर लगवाने के लिए अतिरिक्त भुगतान करने का निर्देश दिया।

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