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पंजाब कांग्रेस में हलचल:50 साल में चार बार सत्ता, गुटबाजी से हर बार फिसली जमीन, राहुल की चेतावनी का कितना असर?
मोहित धुपड़, चंडीगढ़
Published by: Ankesh Kumar
Updated Tue, 03 Mar 2026 06:12 AM IST
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सार
Punjab Politics: पंजाब कांग्रेस में सबकुछ ठीक नहीं है। पार्टी में गुटबाजी हर बार हावी रही है। पिछले 50 वर्षों में हुए 10 विधानसभा चुनावों में कांग्रेस चार बार सत्ता में आई, लेकिन लगातार दूसरी बार सरकार नहीं बना सकी।
पंजाब कांग्रेस
- फोटो : संवाद
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विस्तार
पंजाब में जब-जब कांग्रेस एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतरी, सत्ता तक पहुंची। लेकिन आंतरिक खींचतान और गुटबाजी ने उसे लगातार वापसी का मौका नहीं दिया। अब 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी हाईकमान ने ‘मिशन एकजुटता’ शुरू किया है। इसकी जिम्मेदारी पंजाब कांग्रेस के प्रभारी और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को सौंपी गई है।
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बताया जा रहा है कि उनकी रिपोर्ट के आधार पर बरनाला रैली में राहुल गांधी ने वरिष्ठ नेताओं को साफ संदेश दिया कि जो टीम प्लेयर नहीं होगा, उसे ‘रिजर्व’ में बैठा दिया जाएगा। इस सख्त रुख के बाद प्रदेश कांग्रेस में हलचल तेज है। पार्टी ने संकेत दिया है कि चुनाव बिना किसी घोषित मुख्यमंत्री चेहरे के लड़ा जाएगा और फैसला परिणाम के बाद होगा।
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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मानते हैं कि यदि बिखरे धड़े एकजुट हो जाएं तो मुकाबला कड़ा हो सकता है। इसी रणनीति के तहत बघेल लगातार नेताओं से संवाद कर रहे हैं। हाल ही में दिल्ली में राहुल गांधी ने सभी गुटों के नेताओं की बैठक लेकर स्पष्ट किया कि सभी को मिलकर पूरी ताकत से चुनाव लड़ना होगा।
सत्ता मिली, पर दोबारा भरोसा नहीं जीत पाई
पिछले 50 वर्षों में हुए 10 विधानसभा चुनावों में कांग्रेस चार बार सत्ता में आई, लेकिन लगातार दूसरी बार सरकार नहीं बना सकी। 2017 में पार्टी ने 77 सीटें और 38.8 प्रतिशत वोट हासिल किए। उस समय कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री बने, लेकिन साढ़े चार साल बाद उन्हें हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को छह माह के लिए कमान सौंपी गई। एससी वोट बैंक साधने की कोशिश के बावजूद 2022 में पार्टी 18 सीटों पर सिमट गई।
2002 में 62 सीटों और 35.8 प्रतिशत वोट के साथ कांग्रेस सत्ता में आई, मगर 2007 में यह 44 सीटों पर रह गई। 1992 में 87 सीटें और 43.8 प्रतिशत वोट मिले थे। उस कार्यकाल में बेअंत सिंह, हरचरण सिंह बराड़ और हरजिंदर कौर भट्ठल ने मुख्यमंत्री पद संभाला। 1997 में पार्टी 14 सीटों पर सिमट गई।
1980 में 63 सीटों और 45.2 प्रतिशत वोट के साथ सरकार बनी थी। दरबारा सिंह साढ़े तीन साल मुख्यमंत्री रहे, जबकि डेढ़ साल राष्ट्रपति शासन लागू रहा। 1985 में कांग्रेस 32 सीटों पर आ गई। स्पष्ट है कि पंजाब में कांग्रेस की चुनौती केवल विपक्ष नहीं, बल्कि आंतरिक एकता भी है। यदि मिशन एकजुटता सफल रहा तो 2027 का चुनावी मुकाबला रोचक हो सकता है।