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Highcourt: परिवार के संपत्ति विवाद निपटाने का मंच नहीं वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, वरिष्ठ नागरिक की याचिका खारिज
Sat, 18 Jul 2026 09:41 AM IST
Nivedita
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Sat, 18 Jul 2026 09:41 AM IST
सार
हाईकोर्ट ने बताया कि वर्ष 2007 का यह अधिनियम वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के लिए बना है। इसका मुख्य उद्देश्य परिवार के भीतर संपत्ति संबंधी अधिकारों का निपटारा करना नहीं है।
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पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के दायरे को स्पष्ट किया है।
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अदालत ने कहा कि इस अधिनियम का उपयोग पारिवारिक संपत्ति विवादों को निपटाने के लिए नहीं किया जा सकता। यदि किसी वरिष्ठ नागरिक का समुचित भरण-पोषण हो रहा है, तो संपत्ति वापस लेने के लिए इसका सहारा नहीं लिया जा सकता।
हाईकोर्ट ने इसी आधार पर एक वरिष्ठ नागरिक की याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ता ने अपनी संपत्ति बेटों के नाम हस्तांतरित किए जाने को निरस्त करने की मांग की थी। उन्होंने बेटों से मासिक भरण-पोषण दिलाने की भी अपील की थी।
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याचिकाकर्ता का कहना था कि संपत्ति हस्तांतरण के बाद बेटों ने उनकी देखभाल नहीं की। हालांकि, सुनवाई के दौरान रिकॉर्ड से सामने आया कि वरिष्ठ नागरिक की देखभाल पहले से हो रही थी। उनकी आवश्यक जरूरतों की व्यवस्था भी की जा रही थी। सक्षम और अपीलीय प्राधिकारियों ने पहले ही राहत देने से इन्कार कर दिया था। इसके बाद वरिष्ठ नागरिक ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
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हाईकोर्ट ने बताया कि वर्ष 2007 का यह अधिनियम वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के लिए बना है। इसका मुख्य उद्देश्य परिवार के भीतर संपत्ति संबंधी अधिकारों का निपटारा करना नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब वरिष्ठ नागरिक का भरण-पोषण हो रहा हो, तब केवल संपत्ति वापस लेने के लिए इस कानून के तहत राहत नहीं दी जा सकती। ऐसे विवादों के समाधान के लिए संबंधित पक्षों को दीवानी अदालत का रुख करना होगा।
याचिका खारिज होने का कारण
अदालत ने माना कि निचली प्राधिकारियों के आदेशों में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है। हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए उनके फैसलों को बरकरार रखा। यह फैसला इस बात पर जोर देता है कि कानून का दायरा सीमित है। इसका लक्ष्य माता-पिता के भरण-पोषण और संरक्षण तक ही है।