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पंजाब की राजनीति में नया मोड़: वारिस पंजाब दे से बढ़ी शिअद बादल की चुनौती, पंथक वोट बैंक में आएगा बिखराव
Fri, 31 Jul 2026 09:14 AM IST
Nivedita
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
Published by: Nivedita
Updated Fri, 31 Jul 2026 09:14 AM IST
सार
पंथक राजनीति हमेशा सिख धार्मिक पहचान, बंदी सिखों की रिहाई, बेअदबी के मामलों, श्री अकाल तख्त साहिब और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द रही है। लंबे समय तक शिअद बादल इसका सबसे बड़ा प्रतिनिधि रहा लेकिन पिछले एक दशक में उसकी पंथक विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठे हैं।
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सुखबीर बादल और अमृतपाल सिंह
- फोटो : फाइल
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विस्तार
पंजाब की राजनीति में पंथक मुद्दे एक बार फिर केंद्र में आ गए हैं। लंबे समय तक सिख राजनीति की सबसे प्रभावशाली ताकत रहे शिरोमणि अकाली दल (बादल) के सामने अब चुनौती केवल आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और भाजपा से नहीं बल्कि उभर रहे अकाली दल वारिस पंजाब दे से भी है। हाल के घटनाक्रम संकेत दे रहे हैं कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पंथक राजनीति का केंद्र तेजी से बदल रहा है।
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पंथक राजनीति हमेशा सिख धार्मिक पहचान, बंदी सिखों की रिहाई, बेअदबी के मामलों, श्री अकाल तख्त साहिब और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द रही है। लंबे समय तक शिअद बादल इसका सबसे बड़ा प्रतिनिधि रहा लेकिन पिछले एक दशक में उसकी पंथक विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठे हैं। बेअदबी की घटनाओं, शासनकाल के विवादित फैसलों और सुखबीर सिंह बादल को श्री अकाल तख्त की ओर से तनखैया घोषित किए जाने के घटनाक्रम ने पार्टी की साख को प्रभावित किया।
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इसी माहौल में सांसद अमृतपाल सिंह के नेतृत्व से जुड़ा अकाली दल वारिस पंजाब दे संगठन का तेजी से विस्तार कर रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों और सिख युवाओं में इसकी सक्रियता बढ़ी है। बंदी सिखों की रिहाई और धार्मिक मुद्दों पर आक्रामक रुख ने इसे नई पहचान दिलाई है।
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हाल ही में चंडीगढ़ में अमृतपाल सिंह समेत अन्य बंदी सिखों की रिहाई की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन ने पंथक राजनीति को फिर चर्चा में ला दिया। मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों में टकराव हुआ तथा पानी की बौछारें चलानी पड़ीं। वहीं प्रस्तावित बेअदबी विरोधी कानून को लेकर पंजाब सरकार और श्री अकाल तख्त साहिब के बीच मतभेद भी खुलकर सामने आए। अकाल तख्त ने मसौदा तैयार करने से पहले प्रमुख सिख संस्थाओं को विश्वास में नहीं लेने पर आपत्ति जताई। राजनीतिक हलकों में मनप्रीत सिंह इयाली, इकबाल सिंह झुंदा और संता सिंह उमेदपुरी जैसे नेताओं के नए पंथक विकल्पों की ओर बढ़ने की चर्चा भी है।
क्यों बढ़ी शिअद बादल की चिंता?
बेअदबी की घटनाएं, बंदी सिखों की रिहाई का मुद्दा, धार्मिक मामलों से जुड़े विवाद और सुखबीर सिंह बादल को तनखैया घोषित किए जाने के बाद शिअद बादल की पंथक साख को झटका लगा। इसी दौरान अकाली दल वारिस पंजाब दे ने ग्रामीण क्षेत्रों और सिख युवाओं के बीच सक्रियता बढ़ाई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पारंपरिक पंथक वोट बैंक में बिखराव की शुरुआत हो चुकी है जिसका सीधा असर 2027 के विधानसभा चुनाव में दिख सकता है।
पंथक राजनीति का चुनावी सफर
1967 में पंजाबी सूबा बनने के बाद अकाली दल पहली बार सत्ता में पहुंचा। 1969 और 1977 में भी पंथक राजनीति उसके पक्ष में रही। 1997 में अकाली दल-भाजपा गठबंधन ने प्रचंड बहुमत हासिल किया जबकि 2007 और 2012 में लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटा। वर्षों तक ग्रामीण सिख मतदाता और पंथक वोट बैंक शिअद की सबसे बड़ी ताकत रहे। अब यही आधार विभिन्न पंथक दलों और गुटों में बंटता नजर आ रहा है जिससे 2027 के चुनावी समीकरण बदल सकते हैं।