Bihar: राजगीर में आस्था का महासैलाब, परमा एकादशी पर संपन्न हुआ शाही स्नान, उमड़े 6 लाख श्रद्धालु, देखें फोटो
नालंदा की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक नगरी राजगीर में पुरुषोत्तम मास (मलमास) मेले का मुख्य आकर्षण 'तीसरा और अंतिम शाही स्नान' परमा एकादशी के पावन संयोग पर पूरी भव्यता के साथ संपन्न हो गया। इस ऐतिहासिक मौके पर देश के कोने-कोने से आए 14 अखाड़ों के साधु-संतों, नागा संन्यासियों और महामंडलेश्वरों सहित करीब 6 लाख श्रद्धालुओं ने ब्रह्मकुंड और सप्तधारा में आस्था की डुबकी लगाई।
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धार्मिक, ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और पौराणिक विरासत को अपने आंचल में समेटे नालंदा की पावन नगरी राजगीर इन दिनों देश-दुनिया के श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का मुख्य केंद्र बनी हुई है। अवसर है पवित्र पुरुषोत्तम मास (मलमास) मेले का, जहां सनातन परंपरा और लोक मान्यताओं के अनुसार, स्वर्ग से आकर स्वयं 33 कोटि देवी-देवता और ऋषि-मुनि इस धरा पर विराजमान होते हैं। देवताओं की इसी साक्षात उपस्थिति के कारण मलमास में राजगीर का महात्म्य अनंत गुना बढ़ जाता है। इसी पावन श्रृंखला में, पुरुषोत्तम मास मेले का सबसे बड़ा, दिव्य और अंतिम आकर्षण यानी 'तीसरा शाही स्नान' पुरुषोत्तमी एकादशी (परमा एकादशी) के महामुहूर्त पर पूरी भव्यता के साथ संपन्न हुआ।
देशभर के कोने-कोने से जुटे 14 अखाड़ों के साधु-संतों, नागा संन्यासी, महामंडलेश्वरों, कबीरपंथियों और लाखों आम श्रद्धालुओं के इस महासमागम से पूरी धर्मनगरी 'लक्ष्मी नारायण भगवान की जय' और 'जय श्री राम' के गगनभेदी उद्घोष से गुंजायमान हो उठी। हालांकि, इस भारी भीड़ के बीच प्रशासन को कुछ चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। यह विशेष पुरुषोत्तम मास मेला आगामी 15 जून तक चलेगा, जिसके कारण राजगीर के पवित्र 22 कुंडों, 52 धाराओं और पांचों पहाड़ियों पर लगातार भक्तों का तांता लगा हुआ है।
'खाट अखाड़ा' से शुरू हुआ शाही स्नान का राजसी वैभव
तृतीय और अंतिम शाही स्नान की शुरुआत पारंपरिक रीति-रिवाजों और राजसी ठाठ-बाठ के साथ सुबह साढ़े 6 बजे से हुई। स्थापित परंपरा के अनुसार, सबसे पहला शाही स्नान 'खाट अखाड़ा' के साधु-संतों द्वारा किया गया। इसके बाद एक-एक कर कुल 14 अखाड़ों के संतों ने ब्रह्मकुंड और सप्तधारा में सामूहिक रूप से आस्था की डुबकी लगाई।
अंतिम शाही स्नान के इस खास मौके पर उदासीन बिहार मंडल के तत्वावधान में संतों और महंतों का एक विशाल जत्था राजगीर धाम पहुंचा। उदासीन संप्रदाय के इस भव्य समागम में सनातन धर्म के कई शीर्ष संतों की गरिमापूर्ण उपस्थिति रही, जिनमें मुख्य रूप से जगतगुरु उमा शंकराचार्य दिलीप ज्योति जी महाराज, महामंडलेश्वर स्वामी विवेक जी महाराज, महंत स्वामी दयानंद जी महाराज और महंत संजय दास जी महाराज शामिल हुए। संतों के इस वैभवशाली जुलूस और उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा को निहारने के लिए मेला क्षेत्र की सड़कों के दोनों ओर लाखों श्रद्धालु हाथ जोड़े खड़े नजर आए।
हर कदम पर अश्वमेध यज्ञ का फल: परमा एकादशी का महासंयोग
इस तीसरे शाही स्नान का संयोग इस बार 'परमा एकादशी' (पुरुषोत्तमी एकादशी) की पावन तिथि पर बना, जिसने इसके आध्यात्मिक महत्व को अद्वितीय बना दिया। राजगीर कुण्ड के तीर्थ पुरोहित रणधीर उपाध्याय और अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा के कार्यकारिणी सदस्य पं. प्रमेन्द्र उपाध्याय ने इस तिथि की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि सनातन परंपरा में वर्ष भर में कुल 24 एकादशियां होती हैं। लेकिन, हर तीन साल पर आने वाले पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) के कारण दो अतिरिक्त एकादशियां जुड़ जाती हैं, जिनमें से एक यह 'परमा एकादशी' है, जो केवल तीन साल में एक ही बार आती है।
पुरोहितों ने बताया कि आज के दिन ब्रह्मकुंड में स्नान करने के पश्चात पवित्र 'धर्म ध्वज' का दर्शन और स्पर्श करने का महान पुण्य है। ऐसी मान्यता है कि आज के दिन पवित्र स्नान और दर्शन के लिए श्रद्धालु जितने कदम आगे बढ़ाते हैं, उन्हें हर कदम पर एक अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है। पुरोहितों ने स्पष्ट किया कि शाही स्नान केवल शरीर को जल में डुबोना नहीं है, बल्कि यह मन, वचन और कर्म की शुद्धि का एक पवित्र संकल्प है। इसी मोक्ष, सुख-शांति और आध्यात्मिक उन्नति की कामना लेकर देश-विदेश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु राजगीर की पवित्र धरा पर खिंचे चले आ रहे हैं।
हर कदम पर अश्वमेध यज्ञ का फल: परमा एकादशी का महासंयोग
राजगीर पंडा समिति के प्रवक्ता सुधीर कुमार उपाध्याय ने दोपहर को आधिकारिक आंकड़े जारी करते हुए बताया कि पुरुषोत्तम एकादशी के इस पावन पर्व पर राजगीर में आस्था का ऐतिहासिक सैलाब उमड़ पड़ा है। उन्होंने बताया कि दोपहर तक ही लगभग 3 लाख से अधिक श्रद्धालु श्रद्धा और आस्था की डुबकी लगा चुके थे और साधु-संतों का मुख्य शाही स्नान भी लगभग संपन्न हो चुका है। जिस तरह की भीड़ कतारों में खड़ी है, उससे यह साफ अनुमान है कि देर शाम तक कुल 6 लाख से अधिक श्रद्धालु इन पवित्र कुंडों में स्नान कर पुण्य के भागी बनेंगे।
भीड़ का आलम यह था कि ब्रह्मकुंड से शुरू हुई श्रद्धालुओं की कतारें मील लंबी होकर ऐतिहासिक 'सोन भंडार गुफा' तक पहुंच चुकी थीं। कड़ाके की उमस और भीषण गर्मी के बावजूद श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी। पिछले रिकॉर्ड की तुलना में, पहले शाही स्नान की अपेक्षा दूसरे में और दूसरे की अपेक्षा आज तीसरे शाही स्नान में भीड़ के सारे पुराने रिकॉर्ड टूट गए। न सिर्फ राजगीर, बल्कि पटना और आसपास के प्रमुख रेलवे स्टेशनों तथा बस स्टैंडों पर भी केवल राजगीर आने वाले श्रद्धालुओं का ही रेला देखा जा रहा था।
अत्यधिक भीड़ के बीच अचानक आया 'तेज तूफान और बारिश का अलर्ट'
एक तरफ जहां लाखों की भीड़ सड़कों पर थी, वहीं दूसरी तरफ मौसम विभाग द्वारा जारी किए गए एक तात्कालिक अलर्ट ने जिला प्रशासन और पुलिस महकमे के हाथ-पांव फुला दिए। मेले की सुरक्षा और व्यवस्था की कमान संभाल रहे नालंदा के पुलिस अधीक्षक (SP) भारत सोनी ने मौके पर स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि आज राजगीर में भीड़ अत्यधिक ज्यादा है, उम्मीद से कहीं ज्यादा लोग यहां पहुंचे हैं। साधु-संतों का शाही स्नान तो हमने सकुशल संपन्न करा लिया है, लेकिन इसी बीच मौसम विभाग की ओर से एक विशेष अलर्ट जारी किया गया है, जो मोबाइल नेटवर्क के माध्यम से आम लोगों तक भी पहुंचा है। इसमें क्षेत्र में अचानक तेज तूफान और मूसलाधार बारिश की चेतावनी दी गई है।
एसपी भारत सोनी ने आगे कहा कि अत्यधिक भीड़ और खराब मौसम के इस दोहरे संकट को देखते हुए पुलिस प्रशासन पूरी तरह 'अलर्ट मोड' पर आ गया है। सोन भंडार तक लगी लंबी कतारों को सुरक्षित रखने और क्राउड मैनेजमेंट (भीड़ नियंत्रण) के लिए नई आकस्मिक रणनीति के तहत कार्य किया जा रहा है। प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता यह है कि खराब मौसम की स्थिति में भी देश-विदेश से आए तमाम श्रद्धालु और यात्री पूरी तरह सुरक्षित रहें और सेफली अपनी यात्रा पूरी कर यहां से निकल सकें। इसके लिए पूरे मेला क्षेत्र में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।
व्यवस्थाओं को लेकर दिखे दो सुर: संतों ने लगाया लापरवाही का आरोप
मेला प्रशासन जहां एक तरफ व्यवस्थाओं को चाक-चौबंद बताने में जुटा रहा, वहीं दूसरी तरफ कुछ प्रमुख अखाड़ों के संतों ने व्यवस्थाओं को लेकर गहरी नाराजगी जाहिर की। उदासीन संप्रदाय के एक प्रमुख महंत ने प्रशासनिक दावों की पोल खोलते हुए मीडिया के सामने कड़ा रोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि हम उदासीन संप्रदाय से हैं। हमारे साथ संत-महंत और भारी संख्या में सेवक-भक्त आए हैं, लेकिन हमें यहां तक आने में बहुत कष्ट हुआ है। मेला क्षेत्र में व्यवस्थाएं तो की गई हैं, लेकिन अधिकारियों के बीच सही ढंग से तालमेल की भारी कमी है। हमें नाना पुल के पास भारी परेशानी का सामना करना पड़ा और जब हम मुख्य गेट पर पहुंचे, तो सुरक्षाकर्मियों ने हमें करीब आधे घंटे तक बेवजह रोक कर रखा।
महंत ने आगे कहा कि जब प्रशासन को हमारे आने के समय की जानकारी थी, तो उन्हें पहले से व्यवस्था बनानी चाहिए थी। अधिकारियों को खुद आकर हमसे जानकारी लेनी चाहिए थी कि बाबा जी आप कैसे आगे बढ़ेंगे, लेकिन जब हम उनके पास पहुंचे तो उन्हें कुछ पता ही नहीं था। कुछ अधिकारी तो होश खोकर संतों के साथ अभद्र व्यवहार भी कर रहे थे, हालांकि हम संन्यासी हैं इसलिए मौन व्रत धारण कर आगे बढ़ गए।
इसके विपरीत, कुछ अन्य संतों ने प्रशासन के प्रयासों की सराहना भी की। उदासीन संप्रदाय के ही एक अन्य साधु अलबेला बाबा ने कहा कि थोड़ी-बहुत परेशानियों और कष्ट के बावजूद प्रशासन की ओर से अच्छे प्रयास किए जा रहे हैं और उनका स्नान बेहद शांतिपूर्ण व अच्छे ढंग से संपन्न हुआ है। वहीं पंडा समिति के प्रवक्ता सुधीर कुमार उपाध्याय ने भी कहा कि भीड़ भले ही 'आउट ऑफ कंट्रोल' थी, लेकिन प्रशासन और पंडा समिति के आपसी सहयोग से संतों का स्नान गरिमा के साथ संपन्न करा लिया गया।
संतों की बड़ी मांग: 'भव्य कृष्ण मंदिर निर्माण' और 'नारद कुंड' का नाम बहाल करने पर अड़े
अंतिम शाही स्नान के इस ऐतिहासिक अवसर पर संतों ने न केवल स्नान किया, बल्कि राजगीर की पौराणिक अस्मिता को लेकर दो बेहद महत्वपूर्ण मांगें भी सरकार के सामने उठा दीं। बाल जल गोवर्धन के महंत गजेंद्र दास ने कहा कि हम सभी संत आज इस अंतिम शाही स्नान के अवसर पर एक-दूसरे का वंदन-अभिनंदन कर रहे हैं और माथे पर चंदन लगा रहे हैं। मीडिया के माध्यम से मेरी सरकार और हिंदू समुदाय से एक गुजारिश है कि पौराणिक इतिहास के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण ने राजगीर की इस पावन धरती पर लगभग 90 दिनों तक का समय बिताया था, इसलिए हमारी यह मंगल कामना है कि इस पावन भूमि पर भगवान श्री कृष्ण का एक दिव्य और भव्य मंदिर निर्माण कराया जाना चाहिए।
इसके साथ ही महंत गजेंद्र दास और महामंडलेश्वर अंतर्यामी शरण जी महाराज ने मेला प्रशासन की एक बड़ी त्रुटि की ओर इशारा करते हुए 'नारद कुंड' के नाम का मुद्दा उठाया। संतों ने बताया कि अखाड़ों को प्रशासन की तरफ से स्नान के लिए जो आधिकारिक कागजात और रूट चार्ट मिले हैं, उसमें स्पष्ट रूप से 'नारद कुंड' अंकित है। परंतु, जब संत जमीनी स्तर पर वहां पहुंचे, तो उस ऐतिहासिक कुंड पर 'नानक कुंड' का बोर्ड लगा हुआ पाया गया। महामंडलेश्वर अंतर्यामी शरण जी महाराज ने सरकार से पुरजोर मांग करते हुए कहा कि वर्तमान में इसे ऋषिकुंड या अन्य नाम से प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन इसका वास्तविक पौराणिक नाम 'नारद कुंड' ही है। इसलिए, पुरुषोत्तम मास के दौरान इस विसंगति को दूर करते हुए वहां से अन्य बोर्ड हटाकर 'नारद कुंड' का ही आधिकारिक बोर्ड लगाया जाना चाहिए ताकि सनातन इतिहास की शुद्धता बनी रहे।
नारी शक्ति की गूंज और नशा मुक्ति का संकल्प
राजगीर का यह मलमास मेला इस बार केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक सुधार का भी गवाह बना। ब्रह्मकुंड परिसर में श्रद्धालुओं के बीच सामाजिक संदेशों की गूंज भी सुनाई दी। श्रद्धालु रोशन प्रसाद सहित कई सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं ने 'जाग गई भाई जाग गई, नारी शक्ति जाग गई' और 'समाज की शक्ति नारी है' के नारों के साथ मेला क्षेत्र में अलख जगाई। रोशन प्रसाद ने कहा कि वे इस अंतिम शाही स्नान के पावन मौके पर भगवान पुरुषोत्तम से यह विशेष कामना और प्रार्थना करते हैं कि हमारा देश बीड़ी, सिगरेट, गुटका और हर तरह के नशे से पूरी तरह मुक्त हो। उन्होंने कहा कि समाज को सुधारने में नारी शक्ति की भूमिका सबसे अहम है।
इसके साथ ही, अखिल विश्व गायत्री परिवार, नालंदा जिला की ओर से भी बड़ी संख्या में कार्यकर्ता ब्रह्मकुंड में सेवा कार्य और साधना के लिए पहुंचे। गायत्री परिवार के सदस्य अजय कुमार सिंह ने इस धार्मिक समागम के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह मेला 'मानव में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण' जैसा है। उन्होंने बताया कि युग निर्माण योजना के तहत पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने और शांतिपूर्ण ढंग से इस महापर्व को सफल बनाने के लिए सभी कार्यकर्ता दिन-रात मुस्तैद हैं। श्रद्धालुओं ने भी मेला क्षेत्र की सात्विकता की सराहना की और कहा कि वे इस आध्यात्मिक माहौल से बहुत खुश हैं।
सनातन की नई पीढ़ी को सौंपी गई कमान
इसी पावन समागम के बीच अखाड़ों और संतों के बीच एक बेहद प्रेरक और भावुक दृश्य भी देखने को मिला, जब सनातन परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए नई पीढ़ी को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई। महामंडलेश्वर अंतर्यामी शरण जी महाराज ने एक युवा श्रद्धालु गोपाल सरोज को उनके सेवा भाव और निष्ठा को देखते हुए एक बड़ा आध्यात्मिक दायित्व सौंपा।
युवा गोपाल सरोज को अपना आशीर्वाद देते हुए महामंडलेश्वर ने कहा कि उम्र कम होने के बावजूद गोपाल में गुरु सेवा और सनातन संस्कृति के प्रति अद्भुत समर्पण व अटूट भक्ति है। इस बड़े और महत्वपूर्ण दायित्व को प्राप्त करने के बाद युवा गोपाल सरोज ने बेहद शालीनता से कहा कि वे अपने गुरु जी की असीम कृपा और मार्गदर्शन के सहारे इस बड़े दायित्व का पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ निर्वहन करेंगे। शाही स्नान के इस भव्य समापन के साथ ही संतों ने अब अगले अधिक मास की प्रतीक्षा करने की बात कही। महामंडलेश्वर ने बताया कि अब अगला अधिक मास कार्तिक के महीने में होगा, जिसका संतों और भक्तों को अभी से बेसब्री से इंतजार रहेगा।