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नवरात्र स्पेशल: कछवाहा राजवंश की कुलदेवी आमेर की शिलामाता; यहां चढ़ावे में अर्पित की जाती है शराब- कीजिए दर्शन

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: Sourabh Bhatt Updated Thu, 19 Mar 2026 07:17 AM IST
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सार

नवरात्र स्पेशल: जयपुर के प्रसिद्ध आमेर शिला माता मंदिर में आज से चैत्र नवरात्र पूजन शुरू हो गया है। यहां शिला माता मंदिर में हर रोज हजारों श्रद्धालू पूजा अर्चन के लिए आएंगे। प्रसाद के रूप में यहां शराब भी चढ़ाई जाती है।

Navratri Special: Shila Mata Temple - Alcohol Offered to the Goddess, Know the Unique Rituals and Beliefs
आमेर शिला माता - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

राजधानी जयपुर के सबसे प्राचीन और ऐतिहासिक किले आमेर स्थित शिला माता मंदिर में आज से चैत्र नवरात्र की विशेष पूजा शुरू हो गई है। कछवाहा शासक राजा मानसिंह द्वारा स्थापित यह प्राचीन मंदिर न केवल ऐतिहासिक धरोहर है, बल्कि देवी शिला देवी के प्रति अटूट श्रद्धा का प्रमुख केंद्र भी है। नवरात्र के दौरान यहां विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं और हजारों श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मान्यता है कि इस पावन समय में की गई पूजा हर मनोकामना पूर्ण करती है, जिससे मंदिर का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है। जानिए इस मंदिर का इतिहास और इसकी मान्यताओं के बारे में इस रिपोर्ट में

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जयपुर के आमेर किले परिसर में स्थित शिला माता मंदिर आस्था और इतिहास का अद्भुत संगम है। करीब 400-500 वर्ष पुराने इस मंदिर का निर्माण कछवाहा शासक राजा मानसिंह ने 16वीं-17वीं शताब्दी में करवाया था। यह मंदिर कछवाहा राजवंश की कुलदेवी शिला देवी, जो मां दुर्गा के महिषासुर मर्दिनी स्वरूप में पूजी जाती हैं, को समर्पित है।

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इतिहास के अनुसार, राजा मानसिंह बंगाल के राजा केदार पर विजय के बाद देवी की प्रतिमा को जेस्सोर से आमेर लेकर आए थे और यहीं इसकी स्थापना की। मंदिर की प्रतिमा संगमरमर की शिला पर उत्कीर्ण है और दक्षिणमुखी है, जो इसे विशेष बनाती है।


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नवरात्र पर दर्शन का विशेष महत्व
नवरात्रि के दौरान यहां भव्य लक्खी मेला आयोजित होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ऐसी मान्यता है कि शिला माता अपने भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण करती हैं, खासकर नवरात्रि में की गई पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।

आमेर किले के भीतर स्थित यह मंदिर अपनी अद्भुत स्थापत्य कला, ऐतिहासिक विरासत और धार्मिक महत्व के कारण श्रद्धालुओं व पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण बना हुआ है। इतिहास के अनुसार, मंदिर में 1972 तक पशु बलि की परंपरा जारी रही, लेकिन जैन धर्म के अनुयायियों के विरोध के बाद इस प्रथा को भी पूरी तरह बंद कर दिया गया। आज यह मंदिर श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहां बिना किसी बलि के पूजा-अर्चना की जाती है।

मंदिर के द्वार पर नवदुर्गा रूप
आमेर स्थित शिला देवी मंदिर में प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं का ध्यान सबसे पहले इसके भव्य मुख्य द्वार पर जाता है, जो शुद्ध चांदी से निर्मित है। इस द्वार पर मां दुर्गा के नौ रूप-शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि और सिद्धिदात्री-की सुंदर नक्काशी की गई है, जो इसे विशेष धार्मिक महत्व प्रदान करती है।

इसके साथ ही द्वार पर दस महाविद्याओं-काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर, भैरवी, धूमावती, बगुलामुखी, मातंगी और कमला- के स्वरूप भी आकर्षक ढंग से उकेरे गए हैं। यह शिल्पकला मंदिर की समृद्ध परंपरा और उत्कृष्ट कारीगरी को दर्शाती है। मुख्य द्वार के ऊपर लाल पत्थर से निर्मित भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित है, जो मंदिर में प्रवेश करने वाले भक्तों के लिए मंगल और शुभता का प्रतीक मानी जाती है।

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