BBMB Dispute: हिमाचल को बड़ी राहत, बिजली के रूप में मिलेगा बकाया, सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब से मांगा जवाब
बीबीएमबी परियोजनाओं में हिमाचल प्रदेश के हिस्से को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद में केंद्र सरकार ने कैशलेस सेटलमेंट का प्रस्ताव दिया है। इसके तहत नकद भुगतान की बजाय बिजली के रूप में बकाया दिया जाएगा। हिमाचल और हरियाणा इस प्रस्ताव से सहमत हैं, जबकि पंजाब ने आपत्ति जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब से दो सप्ताह में जवाब मांगा है।
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भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) परियोजनाओं में हिमाचल प्रदेश के हिस्से को लेकर करीब छह दशक से चल रहे विवाद के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने एक नए कैशलेस सेटलमेंट का प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत हिमाचल प्रदेश को उसके लंबित बिजली बकाये का भुगतान नकद के बजाय ऊर्जा (बिजली) के रूप में किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान बताया कि हिमाचल प्रदेश और हरियाणा सरकारें केंद्र के प्रस्ताव से सिद्धांततः सहमत हैं, जबकि पंजाब सरकार ने इस पर आपत्ति जताई है।
इस पर अदालत ने पंजाब को कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि उसे न्यायालय के आदेशों का पालन करना चाहिए और अपना स्पष्ट रुख दो सप्ताह के भीतर बताना होगा। मामले की अगली सुनवाई 12 अगस्त को होगी। जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के 2011 के फैसले के बाद बीबीएमबी परियोजनाओं से हिमाचल को 7.19 प्रतिशत बिजली हिस्सा मिलना शुरू हो गया था, लेकिन 1966 से लेकर 2011 तक की अवधि का बकाया अभी तक नहीं मिला है। यह बकाया करीब 13,066 मिलियन यूनिट बिजली के बराबर है। केंद्र सरकार ने सुझाव दिया है कि पंजाब और हरियाणा यह बकाया राशि नकद देने के बजाय बिजली के रूप में चुकाएं।
प्रस्ताव के तहत 13,066 मिलियन यूनिट में से 12,000 मिलियन यूनिट से अधिक बिजली हिमाचल को देने की व्यवस्था की जा सकती है। पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के बाद बीबीएमबी परियोजनाओं में हिस्सेदारी को लेकर राज्यों के बीच विवाद बना रहा। समाधान नहीं निकलने पर हिमाचल प्रदेश ने 1996 में सुप्रीम कोर्ट में मूल वाद दायर किया था। इसके बाद 27 सितंबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए हिमाचल का हिस्सा 7.19 प्रतिशत तय किया था। फैसले के अनुसार पंजाब का हिस्सा 51.80 प्रतिशत, हरियाणा का 37.51 प्रतिशत, चंडीगढ़ का 3.50 प्रतिशत और राजस्थान की हिस्सेदारी यथावत रखी गई थी।
प्रस्ताव का एक अहम हिस्सा यह भी है कि हिमाचल प्रदेश को बीबीएमबी परियोजनाओं की पूंजीगत लागत के रूप में पंजाब और हरियाणा को करीब 420 करोड़ रुपये नहीं चुकाने होंगे। इस राशि को भी बिजली बकाये में समायोजित किया जाएगा। इससे हिमाचल को दोहरा लाभ मिलने की संभावना है।
पंजाब ने दरों पर जताई आपत्ति
- पंजाब सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता निधेश गुप्ता ने अदालत में कहा कि बकाये की गणना के लिए प्रस्तावित 2.50 रुपये प्रति यूनिट की दर बहुत अधिक है। यदि इसी दर को लागू किया गया तो पंजाब को लगभग 2,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसी कारण राज्य सरकार ने प्रस्ताव पर आपत्ति दर्ज कराई है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिमाचल प्रदेश के पास पंजाब और हरियाणा जैसी राजस्व संभावनाएं नहीं हैं। नदियां और बांध हिमाचल की भूमि पर स्थित हैं, इसलिए उसके अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि आपसी सहमति नहीं बनती है तो वह मामले का गुण-दोष के आधार पर फैसला सुनाएगी।