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Shimla News: पांच साल बाद भी धरातल पर नहीं उतरी नई एंटी हेलगन योजना
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जिले में लगाई जानी थी 20 नई एंटी हेल गन, राज्य सरकार ने वर्ष 2021 में केंद्र सरकार को भेजा था प्रस्ताव
मंजूरी न मिलने से हर वर्ष बागवानों को हो रहा नुकसान
भारती शर्मा
शिमला। जिले के बागवानों को इस बार भी ओलों से फसलों को बचाने के लिए नई एंटी हेलगन की सुविधा नहीं मिलेगी। मार्च से मई के बीच ओलावृष्टि से पहाड़ी क्षेत्रों में फलों और सब्जियों को ओलों से हर साल भारी नुकसान होता है। सेब, प्लम, नाशपाती और चेरी को ओलावृष्टि से करोड़ों का नुकसान होता है।
आईआईटी बांबे नई तकनीक से एंटी हेल गन तैयार कर रहा है। इसके लिए राज्य सरकार और उद्यान विभाग के सचिव की ओर से वर्ष 2021 में केंद्र सरकार को 18.40 करोड़ का प्रस्ताव भेजा था। इसे मंजूरी मिलने के बाद जिले में 20 नई एंटी हेल गन लगाई जानी थीं लेकिन पांच साल बाद भी केंद्र से मंजूरी नहीं मिली। कुछ बागवान ओलों से बचाव के लिए बगीचों में एंटी हेलनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं लेकिन इसकी कीमतें बहुत अधिक हैं। कुछेक बागवानों ने निजी तौर पर कोटखाई के बाधी और चौपाल के मडावग सहित अन्य क्षेत्रों में यह गन लगाई है। एक एंटी हेलगन की कीमत करीब डेढ़ करोड़ है। यह गन विदेश से मंगवानी पड़ती है।
उद्यान विभाग की ओर से जिले में तीन एंटी हेलगन 2010 से 2011 के बीच में लगाई थी। इसमें एक कोटखाई के रेयो घाटी और एक रोहड़ू के देवरीघाट में लगाई थी। तीसरी गन जुब्बल में लगाई जानी थी जो 14 सालों से वहीं पर जंग खा रही है। यह अभी तक स्थापित नहीं की है। इन्हीं के साथ ही इन तीनों को संचालित करने के लिए जिले के खड़ापत्थर क्षेत्र में एक रडार स्थापित किया था जो एंटी हेलगन को किस समय फायर करना है का संकेत देता था लेकिन कुछ साल पहले बिजली गिरने से यह क्षतिग्रस्त हो गया था।
ऐसे काम करती है मशीन
वैज्ञानिकों ने स्वदेशी एंटी हेलगन में मिसाइल और लड़ाकू विमान चलाने वाली तकनीक का प्रयोग किया है। हवाई जहाज के गैस टरबाइन इंजन और मिसाइल के इंजन की तर्ज पर इस तकनीक में प्लस डेटोनेशन इंजन का इस्तेमाल किया है। इसमें एलपीजी और हवा के मिश्रण को हल्के विस्फोट के साथ दागा जाता है। विस्फोट से शॉक वेव (आघात तरंग) तैयार होकर वायुमंडल में जाती है और बादलों के अंदर का तापमान बढ़ने से ओला बनने की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है।
दोबारा भेज सकते हैं प्रस्ताव : डॉ. सतीश
विभाग और राज्य सरकार की ओर से वर्ष 2021 में केंद्र सरकार को एंटी हेल गन लगाने के लिए प्रस्ताव भेजा था। इसे अभी मंजूरी नहीं मिली है। हालांकि जिला में दो जगह एंटी हेल गन बिल्कुल सही रूप से काम कर रही हैं। आने वाले समय में बागवानों की मांग को देखते हुए दोबारा प्रस्ताव भेजा जा सकता है। मंजूरी मिली तो नई एंटी हेलगन लगा दी जाएगी।
.डॉ. सतीश कुमार शर्मा, निदेशक, उद्यान विभाग हिमाचल प्रदेश
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मंजूरी न मिलने से हर वर्ष बागवानों को हो रहा नुकसान
भारती शर्मा
शिमला। जिले के बागवानों को इस बार भी ओलों से फसलों को बचाने के लिए नई एंटी हेलगन की सुविधा नहीं मिलेगी। मार्च से मई के बीच ओलावृष्टि से पहाड़ी क्षेत्रों में फलों और सब्जियों को ओलों से हर साल भारी नुकसान होता है। सेब, प्लम, नाशपाती और चेरी को ओलावृष्टि से करोड़ों का नुकसान होता है।
आईआईटी बांबे नई तकनीक से एंटी हेल गन तैयार कर रहा है। इसके लिए राज्य सरकार और उद्यान विभाग के सचिव की ओर से वर्ष 2021 में केंद्र सरकार को 18.40 करोड़ का प्रस्ताव भेजा था। इसे मंजूरी मिलने के बाद जिले में 20 नई एंटी हेल गन लगाई जानी थीं लेकिन पांच साल बाद भी केंद्र से मंजूरी नहीं मिली। कुछ बागवान ओलों से बचाव के लिए बगीचों में एंटी हेलनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं लेकिन इसकी कीमतें बहुत अधिक हैं। कुछेक बागवानों ने निजी तौर पर कोटखाई के बाधी और चौपाल के मडावग सहित अन्य क्षेत्रों में यह गन लगाई है। एक एंटी हेलगन की कीमत करीब डेढ़ करोड़ है। यह गन विदेश से मंगवानी पड़ती है।
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उद्यान विभाग की ओर से जिले में तीन एंटी हेलगन 2010 से 2011 के बीच में लगाई थी। इसमें एक कोटखाई के रेयो घाटी और एक रोहड़ू के देवरीघाट में लगाई थी। तीसरी गन जुब्बल में लगाई जानी थी जो 14 सालों से वहीं पर जंग खा रही है। यह अभी तक स्थापित नहीं की है। इन्हीं के साथ ही इन तीनों को संचालित करने के लिए जिले के खड़ापत्थर क्षेत्र में एक रडार स्थापित किया था जो एंटी हेलगन को किस समय फायर करना है का संकेत देता था लेकिन कुछ साल पहले बिजली गिरने से यह क्षतिग्रस्त हो गया था।
ऐसे काम करती है मशीन
वैज्ञानिकों ने स्वदेशी एंटी हेलगन में मिसाइल और लड़ाकू विमान चलाने वाली तकनीक का प्रयोग किया है। हवाई जहाज के गैस टरबाइन इंजन और मिसाइल के इंजन की तर्ज पर इस तकनीक में प्लस डेटोनेशन इंजन का इस्तेमाल किया है। इसमें एलपीजी और हवा के मिश्रण को हल्के विस्फोट के साथ दागा जाता है। विस्फोट से शॉक वेव (आघात तरंग) तैयार होकर वायुमंडल में जाती है और बादलों के अंदर का तापमान बढ़ने से ओला बनने की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है।
दोबारा भेज सकते हैं प्रस्ताव : डॉ. सतीश
विभाग और राज्य सरकार की ओर से वर्ष 2021 में केंद्र सरकार को एंटी हेल गन लगाने के लिए प्रस्ताव भेजा था। इसे अभी मंजूरी नहीं मिली है। हालांकि जिला में दो जगह एंटी हेल गन बिल्कुल सही रूप से काम कर रही हैं। आने वाले समय में बागवानों की मांग को देखते हुए दोबारा प्रस्ताव भेजा जा सकता है। मंजूरी मिली तो नई एंटी हेलगन लगा दी जाएगी।
.डॉ. सतीश कुमार शर्मा, निदेशक, उद्यान विभाग हिमाचल प्रदेश