हिमाचल: सेवा विस्तार मामले में आदेश की अनुपालना नहीं होने पर पूर्व सीएस तलब, जानें कोर्ट के बड़े फैसले
प्रदेश हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी कर्मचारियों को सेवा विस्तार देने के मामले में आदेश की अनुपालना न होने पर राज्य सरकार के रवैये पर कड़ा रुख अपनाया है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी कर्मचारियों को सेवा विस्तार देने के मामले में आदेश की अनुपालना न होने पर राज्य सरकार के रवैये पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने पूर्व मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना को चेतावनी दी है कि यदि 6 जुलाई तक मामले में पूर्ण अनुपालन रिपोर्ट दाखिल नहीं की गई तो उन्हें व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष उपस्थित होना पड़ेगा। न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की अदालत ने इससे पूर्व 18 मई को राज्य सरकार को आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। अदालत ने स्पष्ट किया था कि निर्धारित समय में जानकारी प्रस्तुत न करने पर जिम्मेदार अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से पेश होना होगा। इसके जवाब में सरकार की ओर से वर्तमान में कार्यवाहक मुख्य सचिव केके पंत की ओर से एक हलफनामा दायर किया गया, लेकिन अदालत ने इसे आदेश की भावना और शर्तों के अनुरूप नहीं माना और गहरी नाराजगी जताई।
यह है मामला
अदालत ने 24 फरवरी को राज्य सरकार को आदेश दिया था कि वह साल 2017 से लेकर अब तक सेवानिवृत्त हुए उन सभी कर्मचारियों की पूरी सूची पेश करे, जिन्हें सेवा विस्तार दिया गया है। अदालत ने यह आदेश हाईकोर्ट की ओर से वर्ष 2017 में जनहित याचिका मामले में दिए गए निर्देशों के उल्लंघन के आरोप वाली एक अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया है। साल 2017 के फैसले में कोर्ट ने साफ कहा था कि किसी भी कर्मचारी को उसकी सेवानिवृत्ति की आयु के बाद तब तक सेवा विस्तार नहीं दिया जाएगा, जब तक कि वह हैंडबुक ऑन पर्सनेल मैटर्स के अध्याय-22 और फंडामेंटल रूल्स 56(डी) के कड़े नियमों के तहत न आता हो। याचिकाकर्ता का आरोप है कि सरकार ने इन नियमों और अदालती आदेशों की धज्जियां उड़ाकर कई रिटायर्ड कर्मचारियों को सेवा विस्तार दिया है।
विधायक डॉ. जनक ने लाडा फंड की अधिसूचना को हाईकोर्ट में दी चुनौती
प्रदेश हाईकोर्ट में चंबा जिले के पांगी-भरमौर विधानसभा क्षेत्र के विधायक डॉ. जनक राज ने प्रदेश सरकार की ओर से स्थानीय क्षेत्र विकास एजेंसी (लाडा) फंड के संबंध में जारी की गई हालिया अधिसूचनाओं को चुनौती दी है। अदालत को बताया कि सरकार की इन अधिसूचनाओं से वे और उनके क्षेत्र की जनता प्रभावित हुई है। अदालत ने इस मामले में सुनवाई करते हुए राज्य सरकार और प्रधान महालेखाकार को नोटिस जारी कर दिया है और अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी कि याचिका में उठाए गए मुद्दों और मांगी गई राहतों की प्रकृति को देखते हुए, यह मामला व्यक्तिगत न होकर व्यापक जनहित से जुड़ा है। इसलिए इसे जनहित याचिका के रूप में माना जाना चाहिए।जिस पर याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता ने अपनी सहमति जताते हुए कहा कि यदि इस याचिका को जनहित याचिका के रूप में माना जाता है, तो उन्हें इस पर कोई आपत्ति नहीं है। दोनों पक्षों की सहमति के बाद न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की पीठ ने मामले को जनहित याचिका में परिवर्तित करने के निर्देश दिए। अब इस याचिका पर मुख्य खंडपीठ सुनवाई करेगी।
ऑनलाइन भवन अनुमति में गड़बड़ी पर आर्किटेक्ट का लाइसेंस निलंबित
प्रदेश हाईकोर्ट ने शिमला शहर में ऑनलाइन बिल्डिंग परमिशन सिस्टम (ओबीपीएएस) के जरिए दी जा रही निर्माण अनुमतियों में बरती जा रही गंभीर अनियमितताओं पर कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मामले से जुड़े निजी आर्किटेक्ट का लाइसेंस तुरंत प्रभाव से प्रोविजनल तौर पर निलंबित करने के निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग को आदेश दिए हैं कि आर्किटेक्ट का लाइसेंस तुरंत प्रभाव से निलंबित किया जाए।इसके साथ ही अदालत ने आर्किटेक्ट को मामले में प्रतिवादी के रूप में पक्षकार बनाया है। नगर निगम शिमला की ओर से अदालत में दायर अनुपालन हलफनामे से खुलासा हुआ कि संबंधित आर्किटेक्ट, अनुज शारदिया ने मई 2026 में अपना जवाब दाखिल किया था। इसमें उन्होंने माना कि साइट की जीपीएस लोकेशन तो अपलोड की गई थी, लेकिन जियो-रेफरेन्स्ड तस्वीरें और साइट निरीक्षण रिपोर्ट तकनीकी खराबी के कारण अपलोड नहीं हो सकी।
आर्किटेक्ट का दावा था कि स्वीकृत नक्शे के अनुसार ही 3.0 से 3.5 मीटर प्रति स्तर की कटिंग (खुदाई) की जा रही थी।अदालत ने इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि मार्च 2025 में निर्माण की अनुमति मिलने के बाद, एक साल से अधिक का समय बीत जाने पर भी आर्किटेक्ट ने ढलान को दर्शाने वाली तस्वीरों की हार्ड कॉपी जमा करने का कोई प्रयास नहीं किया। निगम की ओर से अदालत को बताया कि जब उन्होंने ओबीपीएएस वेब पोर्टल के कस्टोडियन से संपर्क किया, तो पता चला कि आर्किटेक्ट द्वारा अपलोड किए गए दस्तावेजों के लिंक काम ही नहीं कर रहे हैं। दस्तावेज सुलभ न होने के कारण नगर निगम और टीसीपी विभाग के लिए यह जांचना असंभव हो गया है कि निर्माण स्थल पर जमीन का ढलान फॉर्म-12 के नियमों के मुताबिक 30 डिग्री के भीतर था या उससे ज्यादा। वहीं जमीन के मालिक की ओर से खुदाई वाले हिस्से को सुरक्षित करने या दोबारा निर्माण करने की अंतरिम राहत की मांग को अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया।अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि साल 2025 में अनुमति के वक्त ढलान तय सीमा के भीतर थी या नहीं। नियमों की अनदेखी पर कोई अंतरिम राहत नहीं दी जा सकती। मामले में अगली सुनवाई 1 जुलाई को होगी, जिसमें नए प्रतिवादी को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।