Himachal: हाईकोर्ट ने कहा- 20 साल बाद नौतोड़ जमीन आवंटन को चुनौती तर्कसंगत नहीं, अपील खारिज
प्रदेश हाईकोर्ट ने नौतोड़ जमीन आवंटन से जुड़े एक मामले में कहा है कि दशकों पुराने प्रशासनिक निर्णयों को बिना किसी ठोस कारण के बहुत देरी के बाद चुनौती नहीं दी जा सकती।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने नौतोड़ जमीन आवंटन से जुड़े एक मामले में कहा है कि दशकों पुराने प्रशासनिक निर्णयों को बिना किसी ठोस कारण के बहुत देरी के बाद चुनौती नहीं दी जा सकती। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने कहा कि 20 साल के लंबे अंतराल के बाद नौतोड़ जमीन आवंटन को चुनौती देना तर्कसंगत नहीं है। यदि ऐसे मामलों को समय पर नहीं उठाया गया तो समय बीतने के साथ कानूनी अधिकार भी समाप्त हो जाते हैं। अदालत ने पाया कि 2004 में किए गए आवंटन को दिसंबर 2023 में चुनौती दी गई।
अदालत ने यह भी गौर किया कि जब 1999 में अपीलकर्ता को खसरा नंबर 80 आवंटित नहीं किया गया था, तब उन्होंने उस समय इस पर कोई आपत्ति या शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। पीठ ने इसी के साथ चंबा जिले के पांगी क्षेत्र से जुड़े नौतौड़ भूमि विवाद में दायर अपील को खारिज कर दिया है।अपीलकर्ता बिशंबर नाथ ने साल 1987 में खसरा नंबर 70, 80 और 86/2 पर नौतौड़ (खेती के लिए सरकारी बंजर भूमि का आवंटन) के लिए आवेदन किया था। 1999 में सरकार ने उन्हें खसरा नंबर 70 और 86/2 तो आवंटित कर दिए, लेकिन खसरा नंबर 80 उन्हें नहीं मिला। बाद में वर्ष 2004 में प्रशासन ने वही खसरा नंबर 80 और अन्य जमीनें प्रतिवादियों के नाम आवंटित कर दीं। अपीलकर्ता ने 20 साल बाद इस आवंटन को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अपीलकर्ता का दावा था कि उसे इस आवंटन का पता 2016 में चला। अदालत ने सवाल उठाया कि अगर 2016 में जानकारी मिल गई थी, तो भी 2024 तक याचिका दायर करने में इतनी देरी क्यों की गई। इसका कोई पर्याप्त कारण नहीं दिया गया।
शराब की बोतलों पर होलोग्राम टेंडर में हाईकोर्ट का हस्तक्षेप से इन्कार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में शराब की बोतलों पर लगाए जाने वाले ट्रैक एंड ट्रेस तकनीक वाले हाई-सिक्योरिटी होलोग्राम के टेंडर में हस्तक्षेप करने से साफ इन्कार कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने प्रोसेस कलर (पी) लिमिटेड की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि टेंडर की शर्तें तय करना विभाग का विशेषाधिकार है। अदालत इसमें विशेषज्ञ की भूमिका नहीं निभा सकती। न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा है कि शराब की बिक्री से राज्य को बड़ा राजस्व प्राप्त होता है। नकली शराब न केवल राजस्व का नुकसान करती है, बल्कि उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के लिए भी घातक है। इसलिए राज्य सरकार के पास यह अधिकार है कि वह अपनी राजस्व प्राप्ति और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सर्वश्रेष्ठ तकनीक का चयन करे। संभावित बोलीदाता विभाग को यह निर्देश नहीं दे सकता कि टेंडर की शर्तें क्या होनी चाहिए।
खंडपीठ ने कहा कि अदालत की न्यायिक समीक्षा की सीमाएं होती हैं। अनुबंध के मामलों में व्यापारिक विवेक सर्वोपरि है। जब तक कोई शर्त किसी विशेष कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए दुर्भावना से नहीं बनाई गई हो, अदालत उसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी। गौरतलब है कि राज्य के आबकारी एवं कराधान विभाग ने 2025 में शराब की बोतलों को सील करने के लिए उन्नत सुरक्षा विशेषताओं वाले होलोग्राम की आपूर्ति के लिए टेंडर आमंत्रित किए थे। इसका मुख्य उद्देश्य राज्य में नकली और अवैध शराब की बिक्री रोकना और राजस्व को बढ़ाना था। याचिकाकर्ता कंपनी ने टेंडर की शर्तों जैसे टर्नओवर की सीमा और तकनीकी प्रमाणपत्र को भेदभावपूर्ण बताते हुए चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता कंपनी का तर्क था कि 24 करोड़ रुपये का वार्षिक टर्नओवर बहुत अधिक है। इस पर कोर्ट ने कहा कि टेंडर की अनुमानित मात्रा (सालाना 10 करोड़ होलोग्राम) को देखते हुए क्षमता सुनिश्चित करने के लिए ऐसी शर्तें लगाना तर्कसंगत है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि होलोग्राम के लिए किस तरह की तकनीक (पॉलिएस्टर आधारित या बायोडिग्रेडेबल) और कौन से सुरक्षा फीचर होने चाहिए, यह तय करने का काम संबंधित विभाग का है। टर्नओवर की शर्त जायज है।
प्री-स्कूलों के लिए नया कानून लागू: अर्ली चाइल्डहुड केयर एक्ट 2017 हुआ प्रकाशित
प्रदेश हाईकोर्ट ने प्री-स्कूलों के पंजीकरण और विनियमन से जुड़े एक मामले में सुनवाई के दौरान अदालती कार्यवाही को बंद करने का आदेश दिया है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की पीठ ने राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदमों पर संतोष जताते हुए यह निर्णय लिया। सरकार ने अदालत को 17 मार्च 2026 की अधिसूचना सौंपी। इसके माध्यम से सूचित किया गया कि हिमाचल प्रदेश अर्ली चाइल्डहुड केयर एंड एजुकेशन सेंटर (पंजीकरण और विनियमन) अधिनियम, 2017 को अब आधिकारिक रूप से प्रकाशित कर दिया गया है। अदालत ने पाया कि पिछले निर्णय का पालन किया गया है, जिसके चलते निष्पादन कार्यवाही और सभी लंबित आवेदनों को समाप्त कर दिया गया। महिला एवं बाल विकास निदेशक की ओर से प्राप्त निर्देशों के आधार पर अदालत को बताया गया कि प्री-स्कूलों के संचालन से संबंधित नियमों को मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी है। पिछली सुनवाई के दौरान सरकार ने आश्वासन दिया है कि नियमों की औपचारिक अधिसूचना एक सप्ताह के भीतर जारी कर दी जाएगी।

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