Himachal: हाईकोर्ट ने कहा- शिक्षक को वर्षों तक उचित वेतन दिए बिना काम पर रखना बेगार के समान
कोर्ट ने यह माना है कि राज्य सरकार सरकारी स्कूलों में वर्षों से कार्यरत शिक्षकों की सेवाओं का शोषण उन्हें मिलने वाले लाभों का भुगतान किए बिना नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि सरकार का ऐसा आचरण संविधान की ओर से निषिद्ध बेगार के समान है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में एसएमसी, पीटीए शिक्षकों के शोषण पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने यह माना है कि राज्य सरकार सरकारी स्कूलों में वर्षों से कार्यरत शिक्षकों की सेवाओं का शोषण उन्हें मिलने वाले लाभों का भुगतान किए बिना नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि सरकार का ऐसा आचरण संविधान की ओर से निषिद्ध बेगार के समान है। 2011 से कार्यरत एक ड्राइंग मास्टर को अनुदान जारी करने का निर्देश देते हुए न्यायालय ने टिप्पणी की कि सरकार शिक्षित बेरोजगार युवाओं का फायदा उठा रही है और उन्हें उन वित्तीय लाभों से वंचित रखते हुए उनकी सेवाएं ले रही है, जिनके वे हकदार हैं। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने टिप्पणी की कि उपरोक्त सभी तथ्य यह दर्शाते हैं कि विभाग वास्तव में बेगार का सहारा ले रहा है, जो भारत के संविधान की ओर से निषिद्ध है।
विभाग पिछले 15 वर्षों से याचिकाकर्ता की सेवाओं का लाभ ले रहा: कोर्ट
शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी का फायदा उठाकर उनका शोषण न केवल दूसरों की ओर ही नहीं, बल्कि सरकार की ओर से भी किया जा रहा है और वर्तमान मामला भी इसका एक सटीक उदाहरण है। विभाग पिछले 15 वर्षों से याचिकाकर्ता की सेवाओं का लाभ ले रहा है, लेकिन एक नियमित शिक्षक का वेतन नहीं दे रहा। यह संविधान की ओर से प्रतिबंधित बेगार (श्रम का शोषण) का ही एक रूप है। यदि नियुक्ति में अनियमितता थी, तो राज्य ने 15 साल तक उसे हटाने का कदम क्यों नहीं उठाया। अदालत ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता की ओर से दी जा रही शिक्षा की गुणवत्ता पर विभाग ने कोई सवाल नहीं उठाया है। हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता को उसकी नियुक्ति तिथि (वर्ष 2011) से ग्रांट-इन-एड का लाभ दिए जाने का आदेश दिया।
विभाग को ये निर्देश दिए
इसके साथ ही विभाग को निर्देश दिया गया है कि वह याचिकाकर्ता को पीटीए जीआईए नियमों के तहत देय राशि और एसएमसी की ओर से पहले से दिए गए मानदेय के अंतर एरियर का पूरा भुगतान करे। अदालत ने कहा जब तक याचिकाकर्ता स्कूल में अपनी सेवाएं देती रहेंगी, उन्हें यह वित्तीय लाभ मिलता रहेगा। यह मामला मंडी जिले के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला गोलवां का है। याचिकाकर्ता बबीता जमवाल को वर्ष 2011 में स्कूल प्रबंधन समिति की ओर से ड्राइंग मास्टर के पद पर नियुक्त किया गया। वह पिछले 15 वर्षों से लगातार छठी से दसवीं कक्षा के छात्रों को पढ़ा रही हैं। बावजूद शिक्षा विभाग की ओर से उन्हें पीटीए जीआईए नियम 2006 के तहत ग्रांट-इन-एड जारी नहीं की जा रही थी। विभाग का तर्क था कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति किसी वैध नीति या वैधानिक प्रक्रिया के तहत नहीं हुई। वर्ष 2008 के बाद नई नियुक्तियों के लिए पीटीए ग्रांट-इन-एड बंद कर दी गई थी। नियुक्ति के समय याचिकाकर्ता के पास निर्धारित योग्यताएं नहीं थीं।
विरोध प्रदर्शन में केवल उपस्थिति गैर-कानूनी जनसमूह की देयता के लिए पर्याप्त नहीं : हाईकोर्ट
प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी विरोध प्रदर्शन या मार्च में केवल शामिल होने मात्र से कोई व्यक्ति गैर-कानूनी जनसमूह का सदस्य नहीं बन जाता। अदालत ने टिप्पणी की कि भारतीय दंड संहिता की धारा 149 के तहत आपराधिक दायित्व केवल तभी तय किया जा सकता है, जब यह साबित हो कि आरोपी भी उस समूह के समान उद्देश्य में भागीदार था। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने यह फैसला सुनाते हुए तीन याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी और उससे संबंधित सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया। यह मामला 29 जुलाई 2017 का है। राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय (खुशीनगर) के एक शिक्षक पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगने के बाद स्थानीय निवासियों ने विरोध मार्च निकाला था। कार्यवाहक प्रधानाचार्य की शिकायत के अनुसार, प्रदर्शनकारी स्कूल परिसर में घुसे, नारेबाजी की, विद्यार्थियों को कक्षाओं से बाहर निकाला और दहशत का माहौल बनाया। इस दौरान भीड़ में शामिल कुछ लोगों ने शिक्षकों के साथ मारपीट भी की।
पुलिस ने आईपीसी की धारा 452, 353, 332, 143, 147, 149, 504 और 506 के तहत कई लोगों (जिनमें तीनों याचिकाकर्ता भी शामिल थे) के खिलाफ मामला दर्ज किया।याचिकाकर्ता (दिलदार अली बट्ट, परवेज अली बट्ट और हसन मोहम्मद उर्फ हारून) ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 (जो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के समकक्ष है) के तहत उच्च न्यायालय का रुख किया था।शिकायत में ही उल्लेख था कि हिंसा भड़कने पर याचिकाकर्ता उप मंडल मजिस्ट्रेट के पास खड़े थे और शिक्षकों को भीड़ के हमले से बचाने का प्रयास कर रहे थे। जांच में पाया गया कि घायलों और पीड़ित शिक्षकों ने वास्तविक हमलावरों की पहचान कर ली थी, जिनमें इन तीनों याचिकाकर्ताओं का नाम शामिल नहीं था।जांच में यह पाया गया कि घायलों और पीड़ित शिक्षकों ने वास्तविक हमलावरों की पहचान कर ली थी, जिनमें इन तीनों याचिकाकर्ताओं का नाम शामिल नहीं था। अदालत ने कहा कि हालांकि विरोध प्रदर्शन स्थानीय निवासियों की ओर से किया गया था, लेकिन हिंसा केवल भीड़ के कुछ असामाजिक तत्वों की ओर से की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने हिंसा शुरू होते ही खुद को जुलूस से अलग कर लिया था और शिक्षकों को बचाने की कोशिश की थी। इसलिए, वे उस गैर-कानूनी जनसमूह का हिस्सा नहीं माने जा सकते।