Himachal: आरक्षण रोस्टर में पांच फीसदी सीटों में बदलाव करने का अधिकार उपायुक्तों को देने पर हाईकोर्ट की रोक
प्रदेश हाईकोर्ट ने पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव के आरक्षण रोस्टर में उपायुक्तों को पांच फीसदी सीटों में बदलाव करने के अधिकार देने संबंधी 30 मार्च को जारी अधिसूचना पर अंतरिम रोक लगा दी है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव के आरक्षण रोस्टर में उपायुक्तों को पांच फीसदी सीटों में बदलाव करने के अधिकार देने संबंधी 30 मार्च को जारी अधिसूचना पर अंतरिम रोक लगा दी है। अधिसूचना को असांविधानिक करार देते हुए न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि जहां पर उपायुक्तों ने अधिसूचना के तहत शक्तियों का उपयोग करते हुए आरक्षण रोस्टर जारी किया है, वहां पर मंगलवार शाम 5:00 बजे तक रिवाइज रोस्टर जारी किया जाए। इसके अलावा जो आरक्षण रोस्टर जारी किया है, उस पर अदालत के इस आदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
आठ सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा
खंडपीठ ने इस मामले में प्रदेश सरकार को आठ सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। उसके बाद ही इस मामले में अगली सुनवाई होगी। सरकार ने 30 मार्च को आरक्षण रोस्टर को लेकर एक अधिसूचना जारी की थी, जिसके तहत उपायुक्तों को पंचायत चुनाव के आरक्षण रोस्टर में पांच फीसदी सीटें आरक्षित व अनारक्षित करने का अधिकार दिया था। इन नए नियमों के तहत 95 प्रतिशत पंचायतों का आरक्षण नियमों के तहत ही होगा। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई है।
क्या है पूरा मामला
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से 30 मार्च को जारी अधिसूचना को रद्द करने की मांग की। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि यह संशोधन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243 डी की भावना के विरुद्ध है, जो जनसंख्या और रोटेशन के आधार पर आरक्षण का प्रावधान करता है। याचिका में हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम 1994 की धारा 124, 125, 183 और 186 का हवाला देते हुए कहा गया है कि आरक्षण का आधार मुख्य रूप से जनसंख्या और रोटेशन पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने भौगोलिक आधार पर 5 फीसदी आरक्षण देने के प्रावधान को मनमाना, असांविधानिक और रोटेशन पद्धति के सिद्धांतों के विपरीत बताया।
आयोग ने कहा- नियमों को बदलाव की नहीं ली थी अनुमति
राज्य चुनाव आयोग की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि प्रदेश सरकार ने नियमों में बदलाव करने से पहले आयोग के साथ न ही आवश्यक परामर्श किया है और न ही अनुमति ली है, जो अनिवार्य प्रक्रिया है। वहीं महाधिवक्ता ने अदालत में सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि पंचायत चुनाव में पांच फीसदी आरक्षण के अधिकार की शक्तियां डीसी को देने के पीछे सरकार की मंशा साफ है। उन्होंने कहा कि जो पंचायतें दो बार आरक्षित हुई हैं, उन पर ही नए नियम लागू होने थे।
दरंग और चीरू गांव ज्वालामुखी नगर परिषद में शामिल करने के फैसले पर हाईकोर्ट की मुहर
प्रदेश हाईकोर्ट ने नगर परिषद ज्वालामुखी में दरंग और चीरू गांवों को शामिल करने के सरकार के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है। अदालत ने इस फैसले के खिलाफ दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि नगर निकायों का विस्तार प्रशासनिक सुगमता, एकीकृत शहरी नियोजन और विकास की जरूरतों के आधार पर होता है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि विकास और प्रशासनिक जरूरतों के आगे व्यक्तिगत आपत्तियां और आशंकाएं आधारहीन है। दरअसल, प्रदेश सरकार ने 23 नवंबर 2024 को एक अधिसूचना जारी कर नगर पंचायत ज्वालामुखी को नगर परिषद में बदलने और इसमें दरंग पंचायत के दो गांवों (दरंग और चीरू) को शामिल करने का प्रस्ताव रखा था। याचिकाकर्ता रवि चंद ने इसका विरोध करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। दिसंबर 2025 में हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश दिया था कि वह याचिकाकर्ता की आपत्तियों को व्यक्तिगत सुनवाई देकर निपटाए। इसके बाद 9 फरवरी 2026 को प्रधान सचिव (शहरी विकास) ने आपत्तियों को खारिज कर दिया और 25 फरवरी 2026 को अंतिम अधिसूचना जारी कर दी गई। याचिकाकर्ता ने इसी आदेश और अधिसूचना को दोबारा हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता ने तर्क दिया कि इन दोनों गांवों के 95 फीसदी लोग गरीब किसान हैं, जो सरकारी सब्सिडी पर निर्भर हैं। नगर परिषद में शामिल होने से ग्रामीणों को मनरेगा, कृषि सहायता और अन्य ग्रामीण योजनाओं के लाभ से हाथ धोना पड़ेगा। ज्वालामुखी नगर पंचायत पहले से ही बुनियादी सुविधाएं (जैसे शौचालय, कचरा प्रबंधन) देने में नाकाम रही है, ऐसे में नए गांवों को जोड़ने से समस्याएं और बढ़ेंगी। सरकार की ओर से महाधिवक्ता अनूप रतन ने दलील दी कि याचिकाकर्ता की आपत्तियां सिर्फ भविष्य के अनुमानों और डर पर आधारित हैं। सरकार ने स्पष्ट किया कि नगर निकाय में शामिल होने के बाद ग्रामीणों को केंद्र और राज्य सरकार की शहरी योजनाओं जैसे प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) और राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन का लाभ मिलेगा।नए शामिल क्षेत्रों में बोझ कम करने के लिए शुरुआती 3 वर्षों तक संपत्ति कर में छूट दी गई है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने प्रधान सचिव (शहरी विकास) के आदेश को सही ठहराते हुए माना कि सरकार ने सभी कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखकर ही यह फैसला लिया है।
स्वारघाट नपं के गठन को हाईकोर्ट की हरी झंडी, ग्रामीणों की याचिका खारिज
प्रदेश हाईकोर्ट ने बिलासपुर जिले की नगर पंचायत स्वारघाट के गठन के सरकार के फैसले को बरकरार रखा है। न्यायालय ने पंचायत कुटैहला और मंझेड के कुछ हिस्सों को नगर पंचायत में शामिल करने को लेकर 25 फरवरी की अंतिम अधिसूचना के खिलाफ दायर याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया में किसी भी सांविधानिक नियम का उल्लंघन, मनमानी और अवैधता नहीं पाई गई है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने फैसले में कहा है कि स्वारघाट नगर पंचायत के गठन के लिए निर्धारित सभी कानूनी शर्तें जैसे 2000 से अधिक जनसंख्या और 5 लाख रुपये से अधिक का राजस्व पूरी होती हैं। रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि जनसंख्या का घनत्व, गैर-कृषि गतिविधियों में रोजगार और क्षेत्र के आर्थिक महत्व को देखते हुए नगर पंचायत का गठन सही है। कोर्ट ने कहा कि किसी क्षेत्र को ट्रांजिशनल एरिया(परिवर्तनशील क्षेत्र) मानकर उसे नगर निकाय में शामिल करना वहां के सुनियोजित विकास के लिए आवश्यक है। गौरतलब है कि यह विवाद पिछले दो वर्षों से चल रहा था। याचिकाकर्ता बाल कृष्ण और अन्य ने तीसरी बार अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उनकी मुख्य आपत्ति यह थी कि कुटैहला और मंझेड पंचायतों के ग्रामीण क्षेत्रों को जबरन नगर पंचायत में शामिल किया जा रहा है। ग्रामीणों का तर्क था कि नगर पंचायत बनने से वे ग्रामीण योजनाओं (जैसे मनरेगा के कुछ लाभ) से वंचित हो जाएंगे। निवासियों ने आशंका जताई कि नगर पंचायत बनने के बाद उन पर भारी टैक्स लगाया जाएगा। मकान बनाने के लिए नक्शे पास करवाने और नगर निकाय के जटिल नियमों का पालन करने में गरीब ग्रामीण असमर्थ होंगे। याचिका में आरोप लगाया गया था कि यह निर्णय केवल राजनीतिक लाभ के लिए लिया गया है। वहीं सरकार का तर्क है कि विकास के लिए शहरीकरण जरूरी है। प्रदेश सरकार ने दलील दी कि स्वारघाट तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है। यहां पहले से ही एसडीएम कार्यालय, तहसील, पुलिस कार्यालय, बैंक, अस्पताल और कई होटल मौजूद हैं। नगर पंचायत बनने से क्षेत्र में बेहतर सड़कों, स्ट्रीट लाइट, कूड़ा प्रबंधन और व्यवस्थित जल आपूर्ति जैसी शहरी सुविधाएं मिलेंगी।निवासियों को प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी), अमृत मिशन और स्वनिधि योजना जैसी बड़ी योजनाओं का लाभ मिलेगा। ग्रामीणों के पारंपरिक अधिकारों को सुरक्षित रखा गया है।