Himachal: पत्नी की हत्या के दोष में जेल काट रहा पति बरी, कैंसर मरीजों की याचिका पर नोटिस, जानें कोर्ट के फैसले
प्रदेश हाईकोर्ट ने पत्नी की जलाकर हत्या करने के दोष में अशोक कुमार को सभी आरोपों से बरी करते हुए तुरंत जेल से रिहा करने का आदेश दिया। वहीं कैंसर रोगियों के इलाज और मेडिकल सुविधाओं को बेहतर बनाने से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया है। जानिए हाईकोर्ट के बड़े फैसले...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पत्नी की जलाकर हत्या करने के दोष में अशोक कुमार को सभी आरोपों से बरी करते हुए तुरंत जेल से रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने सरकाघाट की निचली अदालत की ओर से 12 जुलाई 2024 को सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा और दोष सिद्धि के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ मामला संदेह से परे साबित नहीं कर पाया है। मामला 12 नवंबर 2018 का है। सरकाघाट के चंदेश गांव में ज्योति देवी नामक महिला की जलने से मृत्यु हो गई थी। घटना के तुरंत बाद पीड़िता ने डॉक्टर की मौजूदगी में पुलिस को दिए बयान में कहा था कि दूध गर्म करते समय अचानक गैस रिसाव से आग का गोला बन गया, जिससे वह झुलस गई और उसके पति ने उसे बचाने की कोशिश की थी।
पीड़िता के पिता ने धारा 154 सीआरपीसी के तहत दर्ज करवाया था केस
बाद में पीड़िता के पिता ने धारा 154 सीआरपीसी के तहत मामला दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि उनकी बेटी ने अस्पताल ले जाते समय रास्ते में अपनी मां को बताया था कि उसके पति ने उस पर पेट्रोल, मिट्टी का तेल डालकर आग लगाई थी। इसी आधार पर पुलिस ने पति अशोक कुमार के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 (हत्या) के तहत मामला दर्ज किया और निचली अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई, जिसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने पाया कि घटना के समय मौके पर चार वर्षीय बेटा एक सक्षम गवाह था। उसने अदालत में स्पष्ट रूप से बयान दिया कि उसके पिता ने कुछ नहीं किया, वह उसकी मां को नहीं मारते थे और उसकी मां दूध उबालते समय आग की चपेट में आई थी। अभियोजन पक्ष ने इस गवाह को न तो पक्षघाती घोषित किया और न ही उससे कोई क्रोस एग्जामिनेशन किया, जिससे उसकी गवाही साबित हुई। अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड से साबित हुआ कि आरोपी पति स्वयं अपनी पत्नी को अस्पताल ले गया था और आग बुझाने के प्रयास में उसके अपने हाथ व शरीर भी झुलसे थे।
कैंसर मरीजों से जुड़ी याचिका में सरकार को नोटिस
वहीं हिमाचल प्रदेश में कैंसर रोगियों के इलाज और मेडिकल सुविधाओं को बेहतर बनाने से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया है। मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को सूचित किया गया कि कैंसर के इलाज विशेष रूप से स्टेम सेल ट्रांसप्लांट में इस्तेमाल होने वाली एफेरेसिस मशीन की खरीद के लिए आठ करोड़ की राशि जारी कर दी गई है। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने तेजेंद्र सिंह की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को अवगत कराया कि याचिका की प्रार्थना के संबंध में, जो कैंसर रोगियों के स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के लिए आवश्यक एफेरेसिस मशीन यानी ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर उपलब्ध कराने से जुड़ी है, हिमाचल प्रदेश सरकार की ओर से 8 करोड़ रुपये की राशि जारी की जा चुकी है। अदालत ने माना कि याचिका में उठाई गई मांग सीधे तौर पर प्रदेश के नागरिकों की चिकित्सा देखभाल और जनस्वास्थ्य से जुड़ी है। इसे ध्यान में रखते हुए खंडपीठ ने केंद्र सरकार समेत राज्य सरकार को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। हाईकोर्ट ने राज्य में कैंसर इलाज की सुविधाओं के विस्तार और इस मशीन की स्थापना या खरीद से जुड़ी प्रगति का जायजा लेने के लिए मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर तय की है।
पीडब्ल्यूडी की लापरवाही पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से स्टेटस रिपोर्ट तलब
उधर, प्रदेश हाईकोर्ट ने लोक निर्माण विभाग की ओर से सड़क निर्माण के दौरान मलबे के डंपिंग और उससे पर्यावरण, जन-सुविधाओं को पहुंचे नुकसान पर कड़ा संज्ञान लिया है। बीथल-ओडी सड़क के चौड़ीकरण के कारण नौला गांव के प्राकृतिक जल स्रोतों के पूरी तरह नष्ट होने और श्मशान घाट को जाने वाले रास्ते के क्षतिग्रस्त होने के मामले पर हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दर्ज की है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने इस मामले में राज्य सरकार को नोटिस जारी कर स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी। हाईकोर्ट ने यह जनहित याचिका भडासा-कोफर धार (नौला) के ग्रामीणों से प्राप्त एक शिकायत पत्र के आधार पर दर्ज की है। ग्रामीणों का आरोप है कि पीडब्ल्यूडी की ओर से बीथल- ओडी सड़क का चौड़ीकरण का कार्य किया जा रहा है।निर्माण कार्य के दौरान खुदाई से निकलने वाले मलबे को फेंकने,डंप करने की कोई उचित व्यवस्था नहीं की गई, जिसके कारण नौला गांव के प्राकृतिक जल स्रोत पूरी तरह से नष्ट हो गए हैं। विभाग की इस लापरवाही के कारण भडासा-कोफर धार के संयुक्त श्मशान घाट को जोड़ने वाली सड़क बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई है। ग्रामीणों ने बागवानी सड़क से श्मशान घाट तक जाने वाले इस रास्ते की तत्काल मरम्मत और बहाली की मांग की है।
दवा कंपनी के खिलाफ शिकायतों पर हाईकोर्ट ने दिए निरीक्षण के आदेश
सोलन जिले के नालगढ़ में प्लासरा क्षेत्र में स्थित दवा निर्माण इकाई किनवन प्राइवेट लिमिटेड को लेकर उठे पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के सवाल अब हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की निगरानी में जांच के दायरे में आ गए हैं, लेकिन इस मामले की शुरुआत किसी तकनीकी रिपोर्ट या सरकारी फाइल से नहीं हुई। इसकी शुरुआत उन ग्रामीणों की शिकायतों से हुई, जो लंबे समय से यह कहते आ रहे हैं कि रात के समय उनके घरों में ऐसी तीखी और दुर्गंधयुक्त हवा भर जाती है कि खिड़कियां बंद करनी पड़ती हैं और कई बार सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने मामले में संज्ञान लेते हुए जिला कानूनी सेवाएं प्राधिकरण (डीएलएसए) सोलन के सचिव को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, भू-जल प्राधिकरण और जल शक्ति विभाग के अधिकारियों के साथ मिलकर उद्योग का मौके पर निरीक्षण करने और विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। खंडपीठ ने टीम को अनुमति के विपरीत अतिरिक्त बोरवेल, भू-जल और आसपास के जल स्रोतों के पानी की जांच, चिकनी खड्ड और आसपास की जल निकायों में जहरीला रसायन, कचरा बहाने का सच और प्लांट से निकलने वाली दुर्गंध और वायु प्रदूषण के पैमाने का निरीक्षण कर अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार, आरोपी कंपनी और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर तय की है। खंडपीठ ने यह संज्ञान हिमपरिवेश पर्यावरण संरक्षण संस्था की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किए। अदालत को अवगत कराया गया कि कंपनी की ओर से चिकनी खड्ड में जहरीला औद्योगिक अपशिष्ट,कचरा बहाया जा रहा है। इसके साथ ही प्लांट से भारी दुर्गंध निकल रही है, जिससे स्थानीय निवासियों का जीना दूभर हो गया है। इस संबंध में उच्च अधिकारियों को बार-बार शिकायतें और ईमेल भेजे गए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
डॉक्टर की नियमितीकरण याचिका पर सरकार की अपील खारिज
प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति राज्य सरकार की ओर से राज्यपाल के नाम पर की गई है तो केवल इस आधार पर नियमितीकरण से इन्कार नहीं किया जा सकता कि उसका वेतन राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम, एनएचएम) के फंड से दिया जा रहा था। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने हाईकोर्ट ने एकल पीठ के उस आदेश को पूरी तरह सही ठहराया, जिसमें विशेष सचिव स्वास्थ्य के 19 दिसंबर 2017 के खारिज करने वाले आदेश को रद्द कर दिया गया था और डॉक्टर को 4 मई 2017 की नीति के तहत नियमित करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही राज्य सरकार की ओर से दायर अपील को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि डॉ. अनुराधा की नियुक्ति 14 सितंबर 2012 को हिमाचल प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य सचिव की ओर से राज्यपाल के नाम पर जारी की गई थी। अदालत ने टिप्पणी की कि जब नियुक्ति राज्य सरकार की ओर से की गई थी तो अब सरकार अपनी ही नियुक्ति से पीछे नहीं हट सकती। राज्य सरकार का तर्क था कि डॉक्टर को एनआरएचएम फंड से 26,250 प्रति माह (बाद में 40,000 कंसल्टेंट के रूप में) मानदेय दिया गया था और राज्य के खजाने से भुगतान नहीं हुआ था। खंडपीठ ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि एनआरएचएम फंड का उपयोग करना केवल राज्य सरकार की आंतरिक वित्तीय व्यवस्था थी। यह तथ्य कि पैसा केंद्रीय फंड से आ रहा था, इस बात को नहीं बदलता कि नियोक्ता स्वयं हिमाचल प्रदेश राज्य सरकार थी। राज्य सरकार ने डॉक्टर का नियमितीकरण यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि उनकी नियुक्ति एनआरएचएम के तहत हुई थी और वेतन राज्य के खजाने से नहीं बल्कि एनआरएचएम फंड से दिया जा रहा था।