अध्ययन: हिमाचल में ग्लेशियर झील टूटने के साथ बारिश ने तबाही मचाई तो ध्वस्त होंगे 680 से अधिक ढांचे
कोई ग्लेशियर झील टूटे और उसी दौरान आसमान से अत्यधिक बारिश हो जाए तो ब्यास व सतलुज जैसी नदियां बहुत खतरनाक रूप ले सकती हैं। अध्ययन में यह नया अनुमान सामने आया है।
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हिमालय में कोई ग्लेशियर झील टूटे और उसी दौरान आसमान से अत्यधिक बारिश हो जाए तो ब्यास व सतलुज जैसी नदियां बहुत खतरनाक रूप ले सकती हैं। दोनों नदी घाटियों में 680 से अधिक ढांचे ध्वस्त हो सकते हैं। इनमें जलविद्युत परियोजनाओं, धार्मिक स्थलों और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के साथ नदी के आसपास मौजूद संरचनाएं शामिल हैं। ब्यास और सतलुज हिमाचल की जलविद्युत व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। दोनों नदी बेसिन में बड़ी संख्या में बिजली परियोजनाएं और उनसे जुड़ा बुनियादी ढांचा मौजूद है। अध्ययन में यह नया अनुमान सामने आया है। वैज्ञानिकों ने ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) और अत्यधिक बारिश से आने वाली बाढ़ को एक साथ जोड़कर मॉडल तैयार किया है।
सतलुज में बाढ़ का चरम प्रवाह 24,723 घन मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच सकता
इसके मुताबिक ऐसी चरम स्थिति में ब्यास नदी में बाढ़ का चरम प्रवाह 17,356 घन मीटर प्रति सेकंड और सतलुज में 24,723 घन मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच सकता है। इससे दोनों नदी घाटियों में बाढ़ का खतरा कई गुना बढ़ सकता है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय जर्नल ऑफ हाइड्रोलॉजी : रीजनल स्टडीज में प्रकाशित इस रिपोर्ट में हिमाचल प्रदेश की ब्यास और सतलुज नदी घाटियों को अध्ययन क्षेत्र बनाया गया है। अध्ययन दीपाली गायकवाड़, दाइशिशा इयावफनियाव, विकास सिंह जादौन, रीत कमल तिवारी और बिस्वजीत प्रधान ने किया है। अध्ययनकर्ताओं में दीपाली गायकवाड़ और दाइशिशा इयावफनियाव आईआईटी रोपड़ से जुड़े हैं, जबकि विकास सिंह जादौन आईआईटी रुड़की से संबद्ध हैं। अध्ययनकर्ताओं ने 2 वर्ष से लेकर 100 वर्ष की बाढ़ की घटनाओं का अध्ययन किया।
ब्यास में पंडोह और सतलुज में भाखड़ा के पास सबसे बड़ा दबाव
अध्ययन के मुताबिक ब्यास नदी पर पंडोह बांध के पास केवल प्रोबेबल मैक्सिमम फ्लड (पीएमएफ) की स्थिति में ही अधिकतम प्रवाह 17,086 घन मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच सकता है। जब इसमें ग्लेशियल झील टूटने से आने वाले पानी और अत्यधिक बारिश को भी जोड़कर देखा गया तो संयुक्त जीएलओएफ-पीएमएफ प्रवाह 17,356 घन मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच गया। सतलुज घाटी में संभावित स्थिति और गंभीर बताई गई है। भाखड़ा बांध के पास पीएमएफ का अधिकतम प्रवाह 23,478 घन मीटर प्रति सेकंड आंका गया। वहीं जीएलओएफ और अत्यधिक वर्षा को एक साथ मॉडल मेें लेने पर यह बढ़कर 24,723 घन मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच गया। शोधकर्ताओं के मुताबिक अभी तक जीएलओएफ और बारिश से आने वाली बाढ़ का आकलन अक्सर अलग-अलग किया जाता रहा है, जबकि वास्तविक परिस्थितियों में दोनों घटनाएं एक साथ हो सकती हैं। ग्लेशियल झील टूटने के साथ अत्यधिक बारिश होने पर नदी में पहुंचने वाला पानी सामान्य जीएलओएफ की तुलना में कहीं अधिक हो सकता है।
केवल ग्लेशियल झील की निगरानी से नहीं चलेगा काम
अध्ययन के अनुसार हिमाचल में केवल ग्लेशियल झीलों की निगरानी से काम नहीं चलेगा। भविष्य की अर्ली वार्निंग व्यवस्था में झीलों की स्थिति के साथ ऊपरी क्षेत्रों में हो रही बारिश, नदी के तत्काल प्रवाह और नीचे बाढ़ के संभावित फैलाव को भी एक साथ मॉनिटर करना होगा। अध्ययनकर्ताओं के मुताबिक अत्यधिक बारिश की घटनाओं में भविष्य में संभावित बदलाव को देखते हुए इस तरह की एकीकृत मॉडलिंग व्यवस्था पश्चिमी हिमालय की अन्य ग्लेशियरयुक्त नदी घाटियों में भी उपयोगी हो सकती है।
यह स्टडी जीएलओएफ और बहुत ज्यादा बारिश को एक मिली-जुली जोखिम के तौर पर देखने की जरूरत पर जोर देती है। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एसडीएमए) अलग-अलग प्रोजेक्ट्स एचपी रेडी और एएफडी के जरिये ग्लेशियल झीलों, बारिश, नदी के बहाव और निचले इलाकों में बाढ़ के जोखिमों को जोड़ने वाली अर्ली वार्निंग सिस्टम को एकीकृत करने पर काम कर रहा है, जिससे आपदा से जुड़े जोखिमों को कम किया जा सके, खासकर हाइड्रोपाॅवर और जरूरी आधारभूत ढांचा के लिए। - डॉ. पुष्पेंद्र राणा, निदेशक एवं विशेष सचिव आपदा प्रबंधन