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Himachal News: हिमाचल में आलू की फसल पर लेट ब्लाइट का खतरा, किसानों को तुरंत बचाव के उपाय अपनाने की सलाह

Mon, 13 Jul 2026 03:39 PM IST
Ankesh Dogra न्यूज डेस्क, अमर उजाला नेटवर्क, शिमला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला नेटवर्क, शिमला Published by: Ankesh Dogra Updated Mon, 13 Jul 2026 03:39 PM IST
सार

Himachal Potato Crop Alert: केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला ने हिमाचल प्रदेश में आलू की फसल पर लेट ब्लाइट (पिछेता झुलसा) रोग का खतरा बढ़ने की चेतावनी दी है। संस्थान के अनुसार मौजूदा मौसम बीमारी के फैलाव के लिए अनुकूल है। किसानों को समय रहते अनुशंसित फफूंदनाशकों का छिड़काव, जल निकासी की व्यवस्था और खेतों की नियमित निगरानी करने की सलाह दी गई है।

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किसानों के लिए अलर्ट - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश में आलू की खेती करने वाले किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी जारी की गई है। केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (सीपीआरआई), शिमला ने आगाह किया है कि वर्तमान मौसम की परिस्थितियां आलू की फसल में 'पिछेता झुलसा' (लेट ब्लाइट) रोग के तेजी से फैलने के लिए अत्यंत अनुकूल हैं। इस गंभीर बीमारी से फसल को भारी नुकसान हो सकता है, इसलिए किसानों को समय रहते बचाव के उपाय अपनाने की सलाह दी गई है।

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रोग का प्रकोप और पूर्वानुमान
सीपीआरआई द्वारा विकसित इंडो-ब्लाइटकास्ट (पैन इंडिया) पूर्वानुमान प्रणाली के अनुसार, आने वाले दिनों में इस बीमारी का प्रकोप बढ़ने की प्रबल संभावना है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस पर समय रहते प्रभावी नियंत्रण नहीं पाया गया, तो आलू की फसल को भारी क्षति पहुँच सकती है, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति पर गंभीर असर पड़ेगा।
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बचाव के उपाय और फफूंदनाशकों का प्रयोग
पौध संरक्षण संभागाध्यक्ष डॉ. संजीव शर्मा ने किसानों को संबोधित करते हुए बताया कि जिन खेतों में अभी तक बीमारी के लक्षण दिखाई नहीं दिए हैं और फफूंदनाशक का छिड़काव नहीं किया गया है, वहां रोग-संवेदनशील किस्मों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। ऐसे खेतों में मैन्कोजेब या क्लोरोथलोनील युक्त फफूंदनाशकों का 0.2 से 0.25 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है। इसके लिए प्रति हेक्टेयर लगभग 1000 लीटर पानी में 2 से 2.5 किलोग्राम दवा मिलाने की सिफारिश की गई है।
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डॉ. शर्मा ने आगे बताया कि यदि फसल में लेट ब्लाइट के शुरुआती लक्षण दिखाई देने लगें, तो किसान कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार डाइमेथोमोर्फ, अमेटोक्ट्रडीन, फ्लुपिकोलाइड, प्रोपामोकार्ब, अजोक्षिस्ट्रोबिन और टेबुकोनाजोल जैसे अनुशंसित फफूंदनाशकों का उपयोग कर सकते हैं।

छिड़काव की विधि और सावधानियां
विशेषज्ञों ने फफूंदनाशकों का छिड़काव सामान्य परिस्थितियों में 10 दिन के अंतराल पर दोहराने की सलाह दी है। हालांकि, रोग की तीव्रता के आधार पर यह अंतराल कम या अधिक किया जा सकता है। यह भी महत्वपूर्ण है कि एक ही दवा का लगातार उपयोग न किया जाए, ताकि रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित न हो। प्रत्येक छिड़काव के दौरान 0.1 प्रतिशत स्टिकर का प्रयोग करने की भी सलाह दी गई है, जिससे दवा फसल पर बेहतर ढंग से चिपक सके।

अन्य महत्वपूर्ण सुझाव
संस्थान ने किसानों से खेतों में जल निकासी की उचित व्यवस्था बनाए रखने पर जोर दिया है, क्योंकि अत्यधिक नमी रोग के प्रसार में सहायक होती है। इसके अतिरिक्त, खरपतवार नियंत्रण और फसल की नियमित निगरानी को भी महत्वपूर्ण बताया गया है, ताकि बीमारी के फैलाव को समय रहते पहचाना और रोका जा सके। किसानों को जागरूक रहने और किसी भी असामान्य लक्षण दिखने पर तत्काल कृषि विशेषज्ञों से संपर्क करने का आग्रह किया गया है।
 
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