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Shimla News: डेढ़ सौ साल बाद भी शुद्ध है सियोग पेयजल योजना का पानी
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पहले वॉयसराय लॉज और राष्ट्रपति भवन को होती थी योजना से आपूर्ति, आज तक कभी फेल नहीं हुए पानी के सैंपल
हसन वैली में 19 प्राकृतिक चश्मों से 1875 में बनी पेयजल योजना।
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान राजधानी शिमला में अंग्रेजों द्वारा तैयार की गई सियोग पेयजल योजना का पानी आज भी सबसे शुद्ध माना जाता है। करीब 150 साल पुरानी इस योजना के पानी के सैंपल आज तक कभी फेल नहीं हुए हैं।
सियोग का पानी न केवल सबसे शुद्ध है, बल्कि सबसे अधिक खनिजयुक्त भी है। पेयजल कंपनी की ओर से करवाई गई जांच में सियोग का पानी हर कसौटी पर खरा उतरा है। शिमला की छह पेयजल योजनाओं में सियोग ही ऐसी योजना है, जिसके पानी को किसी भी मौसम में अधिक ट्रीटमेंट की आवश्यकता नहीं पड़ती। वर्ष 1875 में तैयार की गई यह योजना राजधानी में अंग्रेजों की अनूठी इंजीनियरिंग का भी प्रमाण है।
हसन वैली की हरी-भरी वादियों के बीच स्थित 19 प्राकृतिक चश्मों का पानी एकत्र कर उसे ग्रेविटी सिस्टम के माध्यम से शिमला तक पहुंचाया गया था। इस योजना में किसी प्रकार के पंपिंग स्टेशन का उपयोग नहीं किया जाता था। अंग्रेजों ने अपने अधिकारियों के लिए इस योजना का पानी शिमला तक पहुंचाया था। यह पानी पेयजल लाइन के माध्यम से ढली और रिज होते हुए वॉयसराय लॉज (वर्तमान भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान) तक पहुंचता था। बाद में सियोग का पानी राष्ट्रपति निवास, छराबड़ा तक भी लिफ्ट किया जाने लगा। हालांकि, इंडो-तिब्बत सड़क मार्ग के निर्माण के दौरान सियोग के कई प्राकृतिक चश्मों को नुकसान पहुंचा और उनका पानी भूमिगत चला गया। बाद में यह पानी जगरोटी नामक स्थान पर दोबारा सतह पर निकला। वर्ष 1914 में जगरोटी में भी पंपिंग हाउस स्थापित किया गया। वर्तमान में सियोग और जगरोटी, दोनों स्थानों का पानी शिमला पहुंचाया जा रहा है।
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सियोग में बना है 150 साल पुराना टैंक
प्राकृतिक चश्मों का पानी एकत्र करने के लिए अंग्रेजों ने करीब 150 वर्ष पहले ही नौ एमएलडी (90 लाख लीटर) क्षमता का टैंक बनाया था। समय के साथ इस टैंक में दरारें आ गईं। इसके अलावा कई पेयजल स्रोत भी सूख गए और ढली तक बिछाई गई पेयजल पाइपलाइन भी जर्जर हो गई। महापौर सुरेंद्र चौहान की पहल पर टैंक की मरम्मत कराई गई। अब यह टैंक पूरी तरह पानी से भरा हुआ है। पेयजल पाइपलाइन बदलने के लिए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी मांगी गई है।
बरसात में मिल सकता है पांच एमएलडी पानी
सियोग में बरसात के दौरान सभी 19 प्राकृतिक चश्मों से फिर पानी निकलने लगा है। कंपनी के अनुसार वर्षा ऋतु में करीब चार महीने तक इस योजना से प्रतिदिन पांच एमएलडी पानी शहर को उपलब्ध कराया जा सकता है। इससे 35 हजार से अधिक लोगों को नियमित पेयजल आपूर्ति संभव होगी। हालांकि इसके लिए पहले पाइपलाइन बदली जानी आवश्यक है। वर्तमान में इस योजना से प्रतिदिन करीब डेढ़ एमएलडी पानी मिल रहा है, जिसकी आपूर्ति ढली और भट्ठाकुफर क्षेत्र में की जा रही है।
सबसे पुरानी योजना है सियोग
सियोग शिमला की सबसे पुरानी पेयजल योजना है। यहां प्राकृतिक चश्मों का पानी मिलता है, जो सबसे स्वच्छ और खनिजयुक्त है। मंजूरी मिलते ही इस योजना की पेयजल पाइपलाइन बदलने का कार्य शुरू कर दिया जाएगा।
-राजेश कश्यप, महाप्रबंधक, पेयजल कंपनी
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पहले वॉयसराय लॉज और राष्ट्रपति भवन को होती थी योजना से आपूर्ति, आज तक कभी फेल नहीं हुए पानी के सैंपल
हसन वैली में 19 प्राकृतिक चश्मों से 1875 में बनी पेयजल योजना।
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान राजधानी शिमला में अंग्रेजों द्वारा तैयार की गई सियोग पेयजल योजना का पानी आज भी सबसे शुद्ध माना जाता है। करीब 150 साल पुरानी इस योजना के पानी के सैंपल आज तक कभी फेल नहीं हुए हैं।
सियोग का पानी न केवल सबसे शुद्ध है, बल्कि सबसे अधिक खनिजयुक्त भी है। पेयजल कंपनी की ओर से करवाई गई जांच में सियोग का पानी हर कसौटी पर खरा उतरा है। शिमला की छह पेयजल योजनाओं में सियोग ही ऐसी योजना है, जिसके पानी को किसी भी मौसम में अधिक ट्रीटमेंट की आवश्यकता नहीं पड़ती। वर्ष 1875 में तैयार की गई यह योजना राजधानी में अंग्रेजों की अनूठी इंजीनियरिंग का भी प्रमाण है।
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हसन वैली की हरी-भरी वादियों के बीच स्थित 19 प्राकृतिक चश्मों का पानी एकत्र कर उसे ग्रेविटी सिस्टम के माध्यम से शिमला तक पहुंचाया गया था। इस योजना में किसी प्रकार के पंपिंग स्टेशन का उपयोग नहीं किया जाता था। अंग्रेजों ने अपने अधिकारियों के लिए इस योजना का पानी शिमला तक पहुंचाया था। यह पानी पेयजल लाइन के माध्यम से ढली और रिज होते हुए वॉयसराय लॉज (वर्तमान भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान) तक पहुंचता था। बाद में सियोग का पानी राष्ट्रपति निवास, छराबड़ा तक भी लिफ्ट किया जाने लगा। हालांकि, इंडो-तिब्बत सड़क मार्ग के निर्माण के दौरान सियोग के कई प्राकृतिक चश्मों को नुकसान पहुंचा और उनका पानी भूमिगत चला गया। बाद में यह पानी जगरोटी नामक स्थान पर दोबारा सतह पर निकला। वर्ष 1914 में जगरोटी में भी पंपिंग हाउस स्थापित किया गया। वर्तमान में सियोग और जगरोटी, दोनों स्थानों का पानी शिमला पहुंचाया जा रहा है।
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सियोग में बना है 150 साल पुराना टैंक
प्राकृतिक चश्मों का पानी एकत्र करने के लिए अंग्रेजों ने करीब 150 वर्ष पहले ही नौ एमएलडी (90 लाख लीटर) क्षमता का टैंक बनाया था। समय के साथ इस टैंक में दरारें आ गईं। इसके अलावा कई पेयजल स्रोत भी सूख गए और ढली तक बिछाई गई पेयजल पाइपलाइन भी जर्जर हो गई। महापौर सुरेंद्र चौहान की पहल पर टैंक की मरम्मत कराई गई। अब यह टैंक पूरी तरह पानी से भरा हुआ है। पेयजल पाइपलाइन बदलने के लिए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी मांगी गई है।
बरसात में मिल सकता है पांच एमएलडी पानी
सियोग में बरसात के दौरान सभी 19 प्राकृतिक चश्मों से फिर पानी निकलने लगा है। कंपनी के अनुसार वर्षा ऋतु में करीब चार महीने तक इस योजना से प्रतिदिन पांच एमएलडी पानी शहर को उपलब्ध कराया जा सकता है। इससे 35 हजार से अधिक लोगों को नियमित पेयजल आपूर्ति संभव होगी। हालांकि इसके लिए पहले पाइपलाइन बदली जानी आवश्यक है। वर्तमान में इस योजना से प्रतिदिन करीब डेढ़ एमएलडी पानी मिल रहा है, जिसकी आपूर्ति ढली और भट्ठाकुफर क्षेत्र में की जा रही है।
सबसे पुरानी योजना है सियोग
सियोग शिमला की सबसे पुरानी पेयजल योजना है। यहां प्राकृतिक चश्मों का पानी मिलता है, जो सबसे स्वच्छ और खनिजयुक्त है। मंजूरी मिलते ही इस योजना की पेयजल पाइपलाइन बदलने का कार्य शुरू कर दिया जाएगा।
-राजेश कश्यप, महाप्रबंधक, पेयजल कंपनी