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AI से बने विज्ञापनों पर सख्ती की तैयारी: ASCI ने पेश किए नए गाइडलाइंस, डीपफेक और फर्जी दावों पर होगी नजर
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Nitish Kumar
Updated Tue, 12 May 2026 09:38 PM IST
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सार
ASCI AI Advertising Guidelines: विज्ञापन की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का दखल लगातार बढ़ रहा है, लेकिन अब ग्राहकों को भ्रमित करना आसान नहीं होगा। एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया (ASCI) ने विज्ञापनों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल को लेकर नए दिशा-निर्देशों का एक मसौदा पेश किया है। इन नियमों का मुख्य उद्देश्य पारदर्शिता लाना और ग्राहकों को धोखे से बचाना है।
एआई जनित विज्ञापनों पर सख्ती की तैयारी
- फोटो : Freepik
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विस्तार
मंगलवार को एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया (ASCI) ने विज्ञापनों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) द्वारा तैयार की गई सामग्री के लिए नए ड्राफ्ट गाइडलाइंस जारी किए हैं। ये नियम विशेष रूप से 'सिंथेटिक' या कृत्रिम रूप से तैयार की गई जानकारी को लेकर हैं। इन दिशा-निर्देशों को सूचना प्रौद्योगिकी (IT) के संशोधित नियमों (2026) के साथ तालमेल बिठाकर तैयार किया गया है।
इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि विज्ञापन पारदर्शी हों, लेकिन साथ ही ग्राहकों पर बहुत ज्यादा 'लेबल' या चेतावनियों का बोझ भी न पड़े। फिलहाल ये नियम सुझावों के लिए खुले हैं और लोग 13 जून तक अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
खतरे के आधार पर बांटे जाने का प्रस्ताव
एएससीआई ने विज्ञापनों को उनके जोखिम या खतरे के आधार पर तीन अलग-अलग श्रेणियों में बांटने का प्रस्ताव दिया है। पहली श्रेणी 'हाई रिस्क' यानी उच्च जोखिम वाले विज्ञापनों की है, जिन्हें पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है। दूसरी श्रेणी 'मीडियम रिस्क' यानी मध्यम जोखिम वाली है, जिनके लिए विज्ञापनों पर यह लिखना अनिवार्य होगा कि इसमें AI का इस्तेमाल हुआ है। तीसरी श्रेणी 'लो रिस्क' यानी कम जोखिम वाली है, जिनमें किसी लेबल की जरूरत नहीं होगी।
एएससीआई का मानना है कि एआई का उपयोग तब भ्रामक माना जाएगा जब वह ऐसी उम्मीदें जगाए जो पूरी न हो सकें, कमजोर वर्ग का शोषण करे या बिना अनुमति किसी व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल करे।
उच्च जोखिम वाले विज्ञापनों पर पूरी तरह रोक
उच्च जोखिम वाली श्रेणी में उन विज्ञापनों को रखा गया है जो गैर-कानूनी हैं या किसी के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। इसमें झूठे दावे करने वाले या एएससीआई की आचार संहिता तोड़ने वाले विज्ञापनों को शामिल किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि अगर कोई कंपनी इन विज्ञापनों पर एआई का लेबल लगा भी देती है, तब भी उन्हें नियमों का उल्लंघन ही माना जाएगा। उदाहरण के तौर पर, अगर कोई कंपनी किसी मशहूर व्यक्ति की झूठी गवाही दिखाती है, उत्पादों की विशेषताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है या डीप-फेक का सहारा लेती है, तो उस पर सख्त कार्रवाई होगी।
लेबल लगाना कब होगा जरूरी?
मध्यम जोखिम वाले विज्ञापनों में लेबल लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। ये वे विज्ञापन हैं जहां एआई का उपयोग सीधे तौर पर ग्राहक के फैसले को प्रभावित कर सकता है। अगर इन विज्ञापनों में यह खुलासा नहीं किया गया कि सामग्री एआई द्वारा तैयार है, तो इसे धोखा माना जाएगा।
यह भी पढ़ें: नेटफ्लिक्स से बच्चे हो रहे ‘स्क्रीन एडिक्ट’: यूजर्स की कर रहा जासूसी, गंभीर आरोपों से घिरा OTT प्लेटफॉर्म
उदाहरण के तौर पर, अगर कोई कंपनी वर्चुअल इन्फ्लुएंसर का इस्तेमाल करती है या किसी असली व्यक्ति की आवाज और चेहरे को उसकी सहमति के बाद भी निजी संदेशों के लिए बदलती है, तो उसे विज्ञापन में यह साफ-साफ बताना होगा। इससे ग्राहक समझ पाएंगे कि वे जो देख रहे हैं वह वास्तविक है या डिजिटल रूप से निर्मित।
हल्के बदलावों के लिए मिली छूट
कम जोखिम वाली श्रेणी में उन बदलावों को रखा गया है जिनका ग्राहक के फैसले पर कोई खास असर नहीं पड़ता। ऐसे विज्ञापनों के लिए किसी भी तरह के खुलासे या लेबल की आवश्यकता नहीं होगी। इसमें सामान्य एडिटिंग, जैसे कि रंगों को ठीक करना, फोटो से अनचाहा शोर कम करना, चेहरे के दाग-धब्बे हटाना या लाइटिंग में हल्का बदलाव करना शामिल है।
इसके अलावा, अगर विज्ञापन के बैकग्राउंड में एआई द्वारा बनाई गई सजावटी चीजें, संगीत या धुन का इस्तेमाल किया गया है, तो उनके लिए भी लेबल लगाने की जरूरत नहीं होगी। ये नियम सुनिश्चित करते हैं कि विज्ञापन की रचनात्मकता पर असर न पड़े और ग्राहकों का भरोसा भी बना रहे।
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इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि विज्ञापन पारदर्शी हों, लेकिन साथ ही ग्राहकों पर बहुत ज्यादा 'लेबल' या चेतावनियों का बोझ भी न पड़े। फिलहाल ये नियम सुझावों के लिए खुले हैं और लोग 13 जून तक अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
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खतरे के आधार पर बांटे जाने का प्रस्ताव
एएससीआई ने विज्ञापनों को उनके जोखिम या खतरे के आधार पर तीन अलग-अलग श्रेणियों में बांटने का प्रस्ताव दिया है। पहली श्रेणी 'हाई रिस्क' यानी उच्च जोखिम वाले विज्ञापनों की है, जिन्हें पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है। दूसरी श्रेणी 'मीडियम रिस्क' यानी मध्यम जोखिम वाली है, जिनके लिए विज्ञापनों पर यह लिखना अनिवार्य होगा कि इसमें AI का इस्तेमाल हुआ है। तीसरी श्रेणी 'लो रिस्क' यानी कम जोखिम वाली है, जिनमें किसी लेबल की जरूरत नहीं होगी।
एएससीआई का मानना है कि एआई का उपयोग तब भ्रामक माना जाएगा जब वह ऐसी उम्मीदें जगाए जो पूरी न हो सकें, कमजोर वर्ग का शोषण करे या बिना अनुमति किसी व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल करे।
उच्च जोखिम वाले विज्ञापनों पर पूरी तरह रोक
उच्च जोखिम वाली श्रेणी में उन विज्ञापनों को रखा गया है जो गैर-कानूनी हैं या किसी के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। इसमें झूठे दावे करने वाले या एएससीआई की आचार संहिता तोड़ने वाले विज्ञापनों को शामिल किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि अगर कोई कंपनी इन विज्ञापनों पर एआई का लेबल लगा भी देती है, तब भी उन्हें नियमों का उल्लंघन ही माना जाएगा। उदाहरण के तौर पर, अगर कोई कंपनी किसी मशहूर व्यक्ति की झूठी गवाही दिखाती है, उत्पादों की विशेषताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है या डीप-फेक का सहारा लेती है, तो उस पर सख्त कार्रवाई होगी।
लेबल लगाना कब होगा जरूरी?
मध्यम जोखिम वाले विज्ञापनों में लेबल लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। ये वे विज्ञापन हैं जहां एआई का उपयोग सीधे तौर पर ग्राहक के फैसले को प्रभावित कर सकता है। अगर इन विज्ञापनों में यह खुलासा नहीं किया गया कि सामग्री एआई द्वारा तैयार है, तो इसे धोखा माना जाएगा।
यह भी पढ़ें: नेटफ्लिक्स से बच्चे हो रहे ‘स्क्रीन एडिक्ट’: यूजर्स की कर रहा जासूसी, गंभीर आरोपों से घिरा OTT प्लेटफॉर्म
उदाहरण के तौर पर, अगर कोई कंपनी वर्चुअल इन्फ्लुएंसर का इस्तेमाल करती है या किसी असली व्यक्ति की आवाज और चेहरे को उसकी सहमति के बाद भी निजी संदेशों के लिए बदलती है, तो उसे विज्ञापन में यह साफ-साफ बताना होगा। इससे ग्राहक समझ पाएंगे कि वे जो देख रहे हैं वह वास्तविक है या डिजिटल रूप से निर्मित।
हल्के बदलावों के लिए मिली छूट
कम जोखिम वाली श्रेणी में उन बदलावों को रखा गया है जिनका ग्राहक के फैसले पर कोई खास असर नहीं पड़ता। ऐसे विज्ञापनों के लिए किसी भी तरह के खुलासे या लेबल की आवश्यकता नहीं होगी। इसमें सामान्य एडिटिंग, जैसे कि रंगों को ठीक करना, फोटो से अनचाहा शोर कम करना, चेहरे के दाग-धब्बे हटाना या लाइटिंग में हल्का बदलाव करना शामिल है।
इसके अलावा, अगर विज्ञापन के बैकग्राउंड में एआई द्वारा बनाई गई सजावटी चीजें, संगीत या धुन का इस्तेमाल किया गया है, तो उनके लिए भी लेबल लगाने की जरूरत नहीं होगी। ये नियम सुनिश्चित करते हैं कि विज्ञापन की रचनात्मकता पर असर न पड़े और ग्राहकों का भरोसा भी बना रहे।
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