टेक कंपनियों पर दबाव: यूजर्स को फ्रॉड से बचाने में फेल हुए Google, Facebook और TikTok!, चुकाना होगा जुर्माना
Google EU Complaint: यूरोपियन यूनियन के कंज्यूमर ग्रुप्स ने गूगल, मेटा और टिकटॉक के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। आरोप है कि ये प्लेटफॉर्म्स अपने यूजर्स को फाइनेंशियल स्कैम्स और फर्जी विज्ञापनों से बचाने में नाकाम रहे हैं। शिकायत डिजिटल सर्विसेज एक्ट (DSA) के तहत की गई है, जिसके तहत बड़ी टेक कंपनियों को हानिकारक और अवैध कंटेंट पर सख्त कार्रवाई करनी होती है। अगर नियमों का उल्लंघन साबित होता है तो इन कंपनियों पर उनकी वैश्विक सालाना कमाई का 6% तक जुर्माना लगाया जा सकता है।
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विस्तार
दिग्गज टेक कंपनियों गूगल, मेटा और टिकटॉक की राह अब मुश्किल होती दिख रही है। यूरोपीय संघ (ईयू) के उपभोक्ता समूहों ने इन कंपनियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं कि वे अपने प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने वाले यूजर्स को वित्तीय धोखाधड़ी से बचाने में पूरी तरह विफल साबित हुई हैं। अगर इन कंपनियों पर लगे ये आरोप कानूनी जांच में सही पाए जाते हैं तो इन्हें भारी-भरकम जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है। इस पूरे मामले को विस्तार से समझने के लिए आइए जानते हैं कि आखिर विवाद की जड़ क्या है।
क्या है पूरा मामला?
इस पूरे मामले की मुख्य कड़ी डिजिटल सर्विसेज एक्ट (डीएसए) है। यूरोपीय उपभोक्ता समूहों (BeuC) ने यूरोपीय आयोग के पास औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। इसमें आरोप लगाया गया है कि गूगल, मेटा और टिकटॉक जैसे दिग्गज प्लेटफॉर्म अपने यूजर्स को आर्थिक नुकसान पहुंचाने वाले फर्जी विज्ञापनों से सुरक्षित रखने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं।
यह शिकायत विशेष रूप से डिजिटल सर्विसेज एक्ट के नियमों के उल्लंघन पर आधारित है। ये बड़ी टेक कंपनियों को यह कानूनी जिम्मेदारी सौंपता है कि वे अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद किसी भी गैर-कानूनी या हानिकारक सामग्री को सक्रिय रूप से पहचानें और उसे तुरंत हटाएं।
BeuC के महानिदेशक अगस्टिन रेयना के अनुसार, यह समस्या सिर्फ विज्ञापनों तक सीमित नहीं है, बल्कि कंपनियों की सुस्ती से भी जुड़ी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये कंपनियां न केवल फर्जी विज्ञापनों को रोकने में विफल रही हैं। बल्कि शिकायतों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं करती हैं।
उनकी चेतावनी साफ है- अगर इन प्लेटफॉर्म्स ने इस गंभीर मुद्दे पर तुरंत ध्यान नहीं दिया तो स्कैमर्स का नेटवर्क हर दिन लाखों यूरोपीय उपभोक्ताओं तक पहुंचता रहेगा। इससे आम लोगों को अपनी मेहनत की कमाई गंवाने का जोखिम उठाना पड़ेगा।
उपभोक्ता समूहों के चौंकाने वाले आंकड़े
इन उपभोक्ता समूहों के दावों ने टेक कंपनियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कंज्यूमर ग्रुप्स के आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल दिसंबर से लेकर इस साल मार्च के बीच उन्होंने लगभग 900 ऐसे विज्ञापनों की पहचान की थी जो संदिग्ध थे और कानून का उल्लंघन कर रहे थे। हालांकि, इन प्लेटफॉर्म्स का रिस्पॉन्स बेहद निराशाजनक रहा।
आंकड़ों की मानें तो रिपोर्ट किए गए विज्ञापनों में से ये कंपनियां केवल 27% को ही अपने प्लेटफॉर्म से हटाने में कामयाब रहीं। जबकि चौंकाने वाली बात यह है कि कुल शिकायतों में से 52% को या तो सीधे तौर पर खारिज कर दिया गया या फिर पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया। यह डेटा स्पष्ट रूप से दिखाता है कि इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के मौजूदा सुरक्षा तंत्र और शिकायत निवारण प्रणाली में कितनी बड़ी खामियां हैं।
टेक कंपनियों ने क्या दी सफाई?
इन गंभीर आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए गूगल, मेटा और टिकटॉक तीनों ने अपनी सुरक्षा प्रणालियों का बचाव किया है और दावों को खारिज किया है। इन कंपनियों का कहना है कि वे अपने यूजर्स को सुरक्षित रखने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं।
गूगल के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि कंपनी अपनी विज्ञापन नीतियों को लेकर बेहद सख्त है और 99% से ज्यादा फर्जी विज्ञापनों को यूजर्स तक पहुंचने से पहले ही ब्लॉक कर दिया जाता है। साथ ही उनकी टीम स्कैमर्स से एक कदम आगे रहने के लिए अपनी सुरक्षा प्रणालियों को निरंतर अपडेट करती रहती है।
दूसरी ओर, मेटा ने अपने बचाव में आंकड़ों का सहारा लेते हुए बताया कि पिछले साल उसने 15.9 करोड़ से ज्यादा स्कैम विज्ञापनों को अपने प्लेटफॉर्म से हटाया है। इनमें से 92% को किसी के रिपोर्ट करने से पहले ही कंपनी की एडवांस एआई और अन्य टूल्स के जरिए पकड़ लिया गया था।
वहीं, टिकटॉक ने भी यही रुख अपनाते हुए कहा कि वे नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हैं। हालांकि, टिकटॉक ने इस बात को स्वीकार किया कि स्कैम की समस्या पूरी टेक इंडस्ट्री के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि धोखेबाज हर दिन अपने जाल बिछाने के लिए नए-नए तरीके अपना रहे हैं।
अब आगे क्या होगा?
अब इस पूरे मामले में सबकी नजरें नियामक संस्थाओं पर टिकी हैं। उपभोक्ता समूहों ने ज्यादाारियों से इस मामले की विस्तृत जांच की पुरजोर मांग की है। अगर जांच के दौरान यह साबित हो जाता है कि इन कंपनियों ने डिजिटल सर्विसेज एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन किया है तो ये कंपनियां भारी कानूनी और वित्तीय कार्रवाई के दायरे में आ सकती हैं। विशेष रूप से, डीएसए नियमों के तहत दोषी पाए जाने पर इन प्लेटफॉर्म्स को अपनी कुल सालाना ग्लोबल कमाई का 6% तक का भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है, जो इन बड़ी टेक कंपनियों के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका होगा।
यह घटनाक्रम स्पष्ट रूप से इस ओर इशारा करता है कि दुनिया भर में सोशल मीडिया के बढ़ते नकारात्मक प्रभावों को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। आज के समय में, विशेषकर बच्चों और अन्य संवेदनशील यूजर्स को ऑनलाइन धोखाधड़ी और वित्तीय घोटालों से बचाने के लिए बड़ी टेक कंपनियों पर नैतिक और कानूनी दबाव पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है।
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