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Ayodhya News: 50 करोड़ खर्च, फिर भी घट रहे बच्चे
Fri, 10 Jul 2026 11:34 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
Updated Fri, 10 Jul 2026 11:34 PM IST
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15 -सरकारी स्कूल में पढ़ती छत्राएं -संवाद
- फोटो : सांकेतिक
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अयोध्या। परिषदीय विद्यालयों में आधुनिक भवन, स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षण सामग्री, मिड-डे मील, प्रति छात्र 1200 रुपये की डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) समेत तमाम सुविधाओं पर सरकार लगातार खर्च कर रही है। अकेले शिक्षकों के वेतन पर ही हर महीने 50 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि खर्च हो रही है।
इसके बावजूद जिले के सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या लगातार घट रही है। स्थिति यह है कि कई विद्यालयों में नामांकन 50 से भी कम रह गया है।
जिले में कुल 1,791 परिषदीय विद्यालय संचालित हैं, जिनमें प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और कंपोजिट विद्यालय शामिल हैं। विभाग के लेखाधिकारी अनूप ने बताया कि शिक्षकों के वेतन पर हर महीने करीब 50 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा रहे हैं।
इसके अलावा 344 अनुदेशकों और 1,714 शिक्षामित्रों को 18-18 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जाता है। विद्यालय भवनों के रखरखाव, स्मार्ट क्लास, बिजली व्यवस्था, शिक्षण सामग्री और अन्य योजनाओं पर भी सालाना 10 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो रहा है।
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इसके बावजूद सरकारी विद्यालयों में नामांकन का ग्राफ लगातार गिर रहा है। शिक्षकों का मानना है कि अब अभिभावक केवल भवन और सरकारी सुविधाओं के आधार पर विद्यालयों का चयन नहीं कर रहे हैं। पढ़ाई की गुणवत्ता, अंग्रेजी माध्यम, अनुशासन और नियमित शैक्षणिक माहौल जैसे पहलू उनके लिए अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। यही कारण है कि निजी विद्यालयों की ओर अभिभावकों का रुझान बढ़ रहा है।
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इसके बावजूद जिले के सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या लगातार घट रही है। स्थिति यह है कि कई विद्यालयों में नामांकन 50 से भी कम रह गया है।
जिले में कुल 1,791 परिषदीय विद्यालय संचालित हैं, जिनमें प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और कंपोजिट विद्यालय शामिल हैं। विभाग के लेखाधिकारी अनूप ने बताया कि शिक्षकों के वेतन पर हर महीने करीब 50 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा रहे हैं।
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इसके अलावा 344 अनुदेशकों और 1,714 शिक्षामित्रों को 18-18 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जाता है। विद्यालय भवनों के रखरखाव, स्मार्ट क्लास, बिजली व्यवस्था, शिक्षण सामग्री और अन्य योजनाओं पर भी सालाना 10 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो रहा है।
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इसके बावजूद सरकारी विद्यालयों में नामांकन का ग्राफ लगातार गिर रहा है। शिक्षकों का मानना है कि अब अभिभावक केवल भवन और सरकारी सुविधाओं के आधार पर विद्यालयों का चयन नहीं कर रहे हैं। पढ़ाई की गुणवत्ता, अंग्रेजी माध्यम, अनुशासन और नियमित शैक्षणिक माहौल जैसे पहलू उनके लिए अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। यही कारण है कि निजी विद्यालयों की ओर अभिभावकों का रुझान बढ़ रहा है।