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Ayodhya News: यूजीसी के नए समानता नियमों से असहज हुए शिक्षक
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अयोध्या। यूजीसी समता विनियम-2026 के तहत समानता के नए नियमों से शिक्षक भी असहज हो गए हैं। डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय-महाविद्यालय शिक्षक संघ इसके विरोध में उतर गया है। शिक्षक संघ ने नए समानता नियमों पर आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे विभेदकारी और संविधान की मूल भावना के विपरीत बताया है।
शिक्षक संघ अध्यक्ष डॉ. जन्मेजय तिवारी की पहल पर पदाधिकारियों और सदस्यों की ओर से इसके खिलाफ सोशल मीडिया पर जागरूकता अभियान शुरू कर दिया गया है। अध्यक्ष डॉ. तिवारी ने कहा कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 समता के अधिकार का खुला उल्लंघन है। यह अवधारणा बिना किसी भेदभाव (जैसे जाति, धर्म, वर्ग) के सभी के लिए समान व्यवहार सुनिश्चित करती है। संविधान के अनुसार विधि के समक्ष सभी बराबर हैं ।
शिक्षक संघ के महामंत्री प्रो. अमूल्य कुमार सिंह ने कहा कि यूजीसी की ओर से बनाया गया यह नियम भारतीय समाज के ताने-बाने को न सिर्फ छिन्न भिन्न करता है बल्कि विश्वविद्यालय और महाविद्यालय परिसरों को राजनीतिक अखाड़े में तब्दील करने का प्रयास है। कोई भी कानून किसी व्यक्ति विशेष और वर्ग विशेष को ध्यान में रखकर नहीं बनाया जाता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को तत्काल इसे वापस लेना चाहिए।
विधि विशेषज्ञ का नजरिया, पुनर्विचार किया जाना अपरिहार्य
अवध विश्वविद्यालय के विधि संकायाध्यक्ष प्रो. अशोक कुमार राय के अनुसार यूजीसी समता विनियम-2026, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की भावना के अनुरूप समावेशन के दायरे को विस्तारित करते हुए छात्रों के साथ शिक्षकों व गैर-शिक्षण कर्मचारियों को भी संरक्षण के अंतर्गत लाते हैं। समान अवसर केंद्र, 24×7 समता हेल्पलाइन, समता समूह व समता दूत जैसे संस्थागत तंत्र उच्च शिक्षा परिसरों में निगरानी और उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करने का प्रयास हैं। इस दृष्टि से 2026 के विनियम प्रशासनिक संरचना, दायरे व प्रवर्तन शक्ति की दृष्टि से निस्संदेह यूजीसी के एंटी-डिस्क्रिमिनेशन विनियम, 2012 की तुलना में अधिक व्यापक व प्रभावशाली प्रतीत होते हैं। यहीं पर एक मौलिक वैचारिक विचलन भी परिलक्षित होता है। जहां 2012 के विनियम समता को समान मानवीय गरिमा के सिद्धांत पर आधारित रखते थे और भेदभाव को व्यक्ति के आचरण से जोड़कर देखते थे, वहीं 2026 के विनियमों की संरचना अप्रत्यक्ष रूप से यह धारणा निर्मित करती प्रतीत होती है कि जातिगत भेदभाव का स्रोत अनिवार्यतः किसी विशिष्ट सामाजिक वर्ग से ही उत्पन्न होता है। यह दृष्टिकोण समता की उस मूल अवधारणा से विचलित होता है, जिसके अनुसार भेदभाव किसी के साथ भी और किसी की ओर से भी किया जा सकता है। वर्तमान स्वरूप में यूजीसी समता विनियम-2026 न केवल न्यायपूर्ण समानता की अवधारणा के प्रतिकूल प्रतीत होता है, बल्कि संविधान की उद्देशिका में प्रतिष्ठित बंधुता के सिद्धांत पर भी आघात करता है।
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शिक्षक संघ के महामंत्री प्रो. अमूल्य कुमार सिंह ने कहा कि यूजीसी की ओर से बनाया गया यह नियम भारतीय समाज के ताने-बाने को न सिर्फ छिन्न भिन्न करता है बल्कि विश्वविद्यालय और महाविद्यालय परिसरों को राजनीतिक अखाड़े में तब्दील करने का प्रयास है। कोई भी कानून किसी व्यक्ति विशेष और वर्ग विशेष को ध्यान में रखकर नहीं बनाया जाता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को तत्काल इसे वापस लेना चाहिए।
विधि विशेषज्ञ का नजरिया, पुनर्विचार किया जाना अपरिहार्य
अवध विश्वविद्यालय के विधि संकायाध्यक्ष प्रो. अशोक कुमार राय के अनुसार यूजीसी समता विनियम-2026, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की भावना के अनुरूप समावेशन के दायरे को विस्तारित करते हुए छात्रों के साथ शिक्षकों व गैर-शिक्षण कर्मचारियों को भी संरक्षण के अंतर्गत लाते हैं। समान अवसर केंद्र, 24×7 समता हेल्पलाइन, समता समूह व समता दूत जैसे संस्थागत तंत्र उच्च शिक्षा परिसरों में निगरानी और उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करने का प्रयास हैं। इस दृष्टि से 2026 के विनियम प्रशासनिक संरचना, दायरे व प्रवर्तन शक्ति की दृष्टि से निस्संदेह यूजीसी के एंटी-डिस्क्रिमिनेशन विनियम, 2012 की तुलना में अधिक व्यापक व प्रभावशाली प्रतीत होते हैं। यहीं पर एक मौलिक वैचारिक विचलन भी परिलक्षित होता है। जहां 2012 के विनियम समता को समान मानवीय गरिमा के सिद्धांत पर आधारित रखते थे और भेदभाव को व्यक्ति के आचरण से जोड़कर देखते थे, वहीं 2026 के विनियमों की संरचना अप्रत्यक्ष रूप से यह धारणा निर्मित करती प्रतीत होती है कि जातिगत भेदभाव का स्रोत अनिवार्यतः किसी विशिष्ट सामाजिक वर्ग से ही उत्पन्न होता है। यह दृष्टिकोण समता की उस मूल अवधारणा से विचलित होता है, जिसके अनुसार भेदभाव किसी के साथ भी और किसी की ओर से भी किया जा सकता है। वर्तमान स्वरूप में यूजीसी समता विनियम-2026 न केवल न्यायपूर्ण समानता की अवधारणा के प्रतिकूल प्रतीत होता है, बल्कि संविधान की उद्देशिका में प्रतिष्ठित बंधुता के सिद्धांत पर भी आघात करता है।
