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Basti News: महुआ डाबर के क्रांतिकारियों की शहादत को किया नमन
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महुआडाबर महोत्सव का शुभारंभ करते अतिथिगण। संवाद
- फोटो : मनीष शर्मा
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बहादुरपुर। ब्लॉक क्षेत्र के महुआ डाबर में तीन दिवसीय महोत्सव का शुभारंभ सोमवार को हुआ। महुआ डाबर संग्रहालय की ओर से आयोजित इस महोत्सव का उद्घाटन मुख्य अतिथि लेखक प्रणव मुखर्जी ने किया। महोत्सव का विषय शौर्य, शहादत और विरासत रखा गया है। इस दौरान लोगों ने महुआडाबर गांव के क्रांतिकारियों की शहादत को नमन किया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि प्रणव ने कहा कि 10 जून 1857 को महुआ डाबर के क्रांतिवीरों ने छह ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों को मार गिराया था। यह वीरतापूर्ण प्रतिरोध अंग्रेजी हुकूमत के लिए सीधी चुनौती थी। प्रतिशोध में अंग्रेजों ने लगभग पांच हजार की आबादी वाले महुआ डाबर गांव को जला कर खत्म कर गैर-चिरागी घोषित कर दिया। अंतरराष्ट्रीय व्यापार के इस समृद्ध केंद्र को जलाकर राख कर दिया गया। नागरिकों की नृशंस हत्या कर महुआ डाबर का नामोनिशान मिटाने का प्रयास किया गया।
संग्रहालय के निदेशक एवं क्रांतिकारी के वंशज डॉ. शाह आलम राना ने कहा कि खेद का विषय है कि आजाद भारत की सरकारें भी महुआडाबर के इस नरसंहार पर लंबे समय से खामोश है। देश में एक ही स्थान पर सर्वाधिक नागरिकों का नरसंहार महुआ डाबर में हुआ, लेकिन इतिहास की पुस्तकों में इसे उचित स्थान नहीं मिल सका। इस दौरान प्रस्ताव पारित हुआ कि ब्रिटिश सरकार 3 जुलाई 1857 के महुआ डाबर वीभत्स नरसंहार के लिए औपचारिक रूप से माफी मांगें।
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आयोजन समिति की ओर से जानकारी दी गई कि 9 जून को शाम 5 बजे मनोरमा नदी के पावन तट पर पूर्ण स्वतंत्रता का उद्घोष करने वाले क्रांतिवीरों को मशाल सलामी दी जाएगी।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि प्रणव ने कहा कि 10 जून 1857 को महुआ डाबर के क्रांतिवीरों ने छह ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों को मार गिराया था। यह वीरतापूर्ण प्रतिरोध अंग्रेजी हुकूमत के लिए सीधी चुनौती थी। प्रतिशोध में अंग्रेजों ने लगभग पांच हजार की आबादी वाले महुआ डाबर गांव को जला कर खत्म कर गैर-चिरागी घोषित कर दिया। अंतरराष्ट्रीय व्यापार के इस समृद्ध केंद्र को जलाकर राख कर दिया गया। नागरिकों की नृशंस हत्या कर महुआ डाबर का नामोनिशान मिटाने का प्रयास किया गया।
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संग्रहालय के निदेशक एवं क्रांतिकारी के वंशज डॉ. शाह आलम राना ने कहा कि खेद का विषय है कि आजाद भारत की सरकारें भी महुआडाबर के इस नरसंहार पर लंबे समय से खामोश है। देश में एक ही स्थान पर सर्वाधिक नागरिकों का नरसंहार महुआ डाबर में हुआ, लेकिन इतिहास की पुस्तकों में इसे उचित स्थान नहीं मिल सका। इस दौरान प्रस्ताव पारित हुआ कि ब्रिटिश सरकार 3 जुलाई 1857 के महुआ डाबर वीभत्स नरसंहार के लिए औपचारिक रूप से माफी मांगें।
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