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Bhadohi News: एक एंबुलेंस पर सात अस्पतालों की जिम्मेदारी फोन करने के बाद पहुंचने में लगते हैं 40 मिनट
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गोपीगंज नगर में खड़ी एंबुलेंस। संवाद
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ज्ञानपुर। जनपद में 138 निजी अस्पताल पंजीकृत हैं। इसमें सिर्फ 20 अस्पतालों के पास ही खुद की एंबुलेंस है। 118 अस्पताल उधार की एबुलेंस के सहारे संचालित हो रहे हैं। यानि एक एबुलेंस पर छह से सात अस्पतालों का भार है। इमरजेंसी में अस्पताल के रिसेप्शन से एंबुलेंस के ड्राइवरों को फोन किया जाता है।
जो एंबुलेंस खाली रहती है उसे बुला लिया जाता है। एंबुलेंस को सूचना देकर बुलाने में लगभग आधे घंटे से ज्यादा समय बीत जाता है। तब तक मरीज की हालत और गंभीर हो जाती है। कई बार देरी से एंबुलेंस आने के कारण मरीज की मौत रास्ते में या बड़े अस्पताल तक पहुंचते-पहुंचते हो जाती है। इधर, मरीज के परिजन बार-बार पूछते हैं कि कब तक एंबुलेंस आएगी तो रिसेप्शन पर तैनात कर्मचारी झूठ बोल देते हैं कि एंबुलेंस दूसरे मरीज की सेवा में लगी है।
22 बिंदुओं के आधार पर होता है अस्पतालों का पंजीकरण
अस्पतालों का पंजीकरण 22 बिंदुओं के आधार पर होता है। फायर सेफ्टी, चिकित्सक की डिग्री, इमरजेंसी वार्ड, ओपीडी हाल, पार्किंग, एंबुलेंस की सुविधा सहित 22 बिंदुओं के आधार पर अस्पतालों को लाइसेंस मिलता है। शपथ पत्र देना होता है कि इमरजेंसी में मरीजों को एंबुलेंस की सुविधा मुहैया कराई जाएगी। गंभीर मरीज के निजी अस्पताल में पहुंचते ही अस्पतालों में बिल बनाने के चक्कर में जुट जाते हैं। हालत बिगड़ते ही मरीज को वाराणसी या प्रयागराज के लिए रेफर कर दिया जाता है।
आठ एंबुलेंस सर्विस प्रदाता हैं जिले में
जिले में निजी अस्पतालों के पास एबुलेंस भले ही न हो, लेकिन जनपद में आठ एंबुलेंस सर्विस प्रदाता हैं। इनमें किसी के पास एक तो किसी के पास दो एबुलेंस हैं। एंबुलेंस संचालकों को एआरटीओ से परमिट लेने के बाद स्वास्थ्य विभाग से एनओसी लेनी पड़ती है। अधिकारी एंबुलेंस में व्यवस्थाओं की जांच करने के बाद ही इन्हें एबुलेंस संचालित करने की अनुमति देते हैं।
आखिर कैसे जारी हो गया 118 अस्पतालों को लाइसेंस
बिना एंबुलेंस की सुविधा के संचालित इन 118 निजी अस्पतालों को स्वास्थ्य विभाग कैसे पंजीकरण करके प्रमाण पत्र जारी कर दिया।
10 से 50 बेड़ से अधिक वाले अस्पताल नर्सिंग होम की श्रेणी में आते हैं। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार पंजीकरण से पहले 22 बिंदुओं की जांच की जाती है। इससे साफ है कि मानक की अनदेखी की गई है।
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जो एंबुलेंस खाली रहती है उसे बुला लिया जाता है। एंबुलेंस को सूचना देकर बुलाने में लगभग आधे घंटे से ज्यादा समय बीत जाता है। तब तक मरीज की हालत और गंभीर हो जाती है। कई बार देरी से एंबुलेंस आने के कारण मरीज की मौत रास्ते में या बड़े अस्पताल तक पहुंचते-पहुंचते हो जाती है। इधर, मरीज के परिजन बार-बार पूछते हैं कि कब तक एंबुलेंस आएगी तो रिसेप्शन पर तैनात कर्मचारी झूठ बोल देते हैं कि एंबुलेंस दूसरे मरीज की सेवा में लगी है।
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22 बिंदुओं के आधार पर होता है अस्पतालों का पंजीकरण
अस्पतालों का पंजीकरण 22 बिंदुओं के आधार पर होता है। फायर सेफ्टी, चिकित्सक की डिग्री, इमरजेंसी वार्ड, ओपीडी हाल, पार्किंग, एंबुलेंस की सुविधा सहित 22 बिंदुओं के आधार पर अस्पतालों को लाइसेंस मिलता है। शपथ पत्र देना होता है कि इमरजेंसी में मरीजों को एंबुलेंस की सुविधा मुहैया कराई जाएगी। गंभीर मरीज के निजी अस्पताल में पहुंचते ही अस्पतालों में बिल बनाने के चक्कर में जुट जाते हैं। हालत बिगड़ते ही मरीज को वाराणसी या प्रयागराज के लिए रेफर कर दिया जाता है।
आठ एंबुलेंस सर्विस प्रदाता हैं जिले में
जिले में निजी अस्पतालों के पास एबुलेंस भले ही न हो, लेकिन जनपद में आठ एंबुलेंस सर्विस प्रदाता हैं। इनमें किसी के पास एक तो किसी के पास दो एबुलेंस हैं। एंबुलेंस संचालकों को एआरटीओ से परमिट लेने के बाद स्वास्थ्य विभाग से एनओसी लेनी पड़ती है। अधिकारी एंबुलेंस में व्यवस्थाओं की जांच करने के बाद ही इन्हें एबुलेंस संचालित करने की अनुमति देते हैं।
आखिर कैसे जारी हो गया 118 अस्पतालों को लाइसेंस
बिना एंबुलेंस की सुविधा के संचालित इन 118 निजी अस्पतालों को स्वास्थ्य विभाग कैसे पंजीकरण करके प्रमाण पत्र जारी कर दिया।
10 से 50 बेड़ से अधिक वाले अस्पताल नर्सिंग होम की श्रेणी में आते हैं। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार पंजीकरण से पहले 22 बिंदुओं की जांच की जाती है। इससे साफ है कि मानक की अनदेखी की गई है।
