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पति-पत्नी का रिश्ता अंतिम सांस तक सहेजें : संघर्षी महाराज
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चांदपुर। श्री सदाशिव महापुराण कथा में कथा व्यास महंत ने माता सती के प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा पति-पत्नी के संबंध को अंतिम सांस तक सहेजकर रखने का हरसंभव प्रयास करना चाहिए।
मोहल्ला गोकुल नगर स्थित शिव-गौरी मंदिर में आयोजित श्री सदाशिव महापुराण कथा के तीसरे दिन कथा व्यास पंडित रवींद्र भारद्वाज संघर्षी महाराज ने कहा संसार में पति-पत्नी से बढ़कर एक-दूसरे का सच्चा मित्र और हितैषी कोई नहीं होता। यदि दोनों में से कोई एक साथ छोड़ देता है तो जीवन में सब कुछ होते हुए भी बहुत कुछ अधूरा रह जाता है।
कथा व्यास ने कहा कि भगवान सदाशिव और माता सती का विवाह संसार का पहला प्रेम विवाह माना जाता है। माता सती के प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि जहां पति का अपमान हो, वहां पत्नी को मौन दर्शक बनकर नहीं रहना चाहिए। उन्होंने बताया कि दक्ष प्रजापति के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान देखकर माता सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर का त्याग कर दिया। इसके बाद भगवान शिव के आदेश पर वीरभद्र ने दक्ष का सिर धड़ से अलग कर यज्ञ का विध्वंस कर दिया।
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उन्होंने बताया कि माता सती के वियोग में भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर विचरण करने लगे। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के खंड किए, जहां-जहां उनके अंग गिरे वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। अगले जन्म में माता सती ने हिमालयराज के यहां माता पार्वती के रूप में जन्म लेकर भगवान शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त किया। कथा में मंदिर समिति के अध्यक्ष सर्वेश कुमार अग्रवाल (गैस वाले), रामदीन अग्रवाल, शलभ कुमार अग्रवाल, नीरज सैनी, निर्देश सैनी, डॉ. सुरेश कुमार सैनी, मयंक सिंघल, हर्षित भारद्वाज आदि का सहयोग रहा।
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मोहल्ला गोकुल नगर स्थित शिव-गौरी मंदिर में आयोजित श्री सदाशिव महापुराण कथा के तीसरे दिन कथा व्यास पंडित रवींद्र भारद्वाज संघर्षी महाराज ने कहा संसार में पति-पत्नी से बढ़कर एक-दूसरे का सच्चा मित्र और हितैषी कोई नहीं होता। यदि दोनों में से कोई एक साथ छोड़ देता है तो जीवन में सब कुछ होते हुए भी बहुत कुछ अधूरा रह जाता है।
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कथा व्यास ने कहा कि भगवान सदाशिव और माता सती का विवाह संसार का पहला प्रेम विवाह माना जाता है। माता सती के प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि जहां पति का अपमान हो, वहां पत्नी को मौन दर्शक बनकर नहीं रहना चाहिए। उन्होंने बताया कि दक्ष प्रजापति के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान देखकर माता सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर का त्याग कर दिया। इसके बाद भगवान शिव के आदेश पर वीरभद्र ने दक्ष का सिर धड़ से अलग कर यज्ञ का विध्वंस कर दिया।
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उन्होंने बताया कि माता सती के वियोग में भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर विचरण करने लगे। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के खंड किए, जहां-जहां उनके अंग गिरे वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। अगले जन्म में माता सती ने हिमालयराज के यहां माता पार्वती के रूप में जन्म लेकर भगवान शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त किया। कथा में मंदिर समिति के अध्यक्ष सर्वेश कुमार अग्रवाल (गैस वाले), रामदीन अग्रवाल, शलभ कुमार अग्रवाल, नीरज सैनी, निर्देश सैनी, डॉ. सुरेश कुमार सैनी, मयंक सिंघल, हर्षित भारद्वाज आदि का सहयोग रहा।