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Hamirpur News: 154 साल पुराने मंदिर में गुप्त रास्ता... ताले में कैद क्रांतिकारियों के राज

Fri, 14 Aug 2026 11:52 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Fri, 14 Aug 2026 11:52 PM IST
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A secret passage in a 154-year-old temple... secrets of revolutionaries locked away
फोटो 14 एचएएमपी 01- गहरौली गांव स्थिति 154 साल पुराना बांके बिहारी मंदिर। संवाद
आजादी के मतवाले---- यहीं से निकलता था बुंदेलखंड केसरी अखबार
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फोटो 14 एचएएमपी 01- गहरौली गांव स्थिति 154 साल पुराना बांके बिहारी मंदिर। संवाद

फोटो 14 एचएएमपी 02- कमरे के अंदर सुरंग का रास्ता।


संवाद न्यूज एजेंसी


गहरौली (हमीरपुर)। जिले के आखिरी छोर में बसे विकासखंड मुस्करा के गहरौली गांव का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से भरा पड़ा है। 154 साल पुराने बांके बिहारी मंदिर में एक गुप्त रास्ता भी है। अंग्रेजी शासनकाल में क्रांतिकारियों ने इसी मंदिर के तहखाने में बैठकें व अन्य कार्य करते थे। यहीं से बुंदेलखंड केसरी नामक अखबार भी निकलता था।
यहां लगभग 60 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हुआ करते थे। गांव के बांके बिहारी मंदिर आज भी अपने सीने में आजादी की कई अनसुनी दास्तानें छिपाए हुए है।
खरेला-मुस्करा मार्ग पर स्थित बांके बिहारी मंदिर का निर्माण सन् 1872 में किया गया था। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसमें एक गुप्त कमरा और उससे जुड़ा गोपनीय रास्ता भी है। मंदिर ईंट और चूने के विशेष मिश्रण से बना है, क्योंकि154 साल पुराना होने के बावजूद भी मंदिर मजबूती से आज भी खड़ा है। ईंट और चूने से बने इस मंदिर की दीवारों पर आज भी हस्तलिपि रामायण के चित्र और चौपाइयां अंकित हैं। मन्नीलाल गुरुदेव, नवल किशोर गुरुदेव, लालचंद राजपूत उर्फ नन्नाजी समेत करीब 50 से अधिक स्वतंत्रता सेनानी यहां गोपनीय बैठकें करते थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह मंदिर राष्ट्रवादियों की बैठकों और छिपने का एक मुख्य केंद्र था।
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मंदिर के पुजारी राजा भैया दीक्षित के अनुसार, मंदिर के अंदर एक कमरा है। इसमें आज भी पुराना ताला लगा हुआ है। कहा जाता है कि ब्रिटिश हुकूमत के समय क्रांतिकारी इसी कमरे में बैठक करते थे। इसी कमरे में प्रिंट मशीन लगाकर बुंदेलखंड केसरी अखबार छापा जाता था। इस अखबार को निकालने और पूरे जिले में फैलाने की जिम्मेदारी रामानुज सिंह चंदेल, शोभाराम अग्रवाल और बद्री प्रसाद बजाज जैसे सेनानियों के पास थी।
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फोटो 14 एचएएमपी 03- गहरौली निवासी चंद्रशेखर शुक्ला व शिवकुमार द्विवेदी। संवाद

ताला अंग्रेजों के जमाने का, गुप्त सुरंग में भी रहस्य
100 वर्ष पूरे कर चुके गांव निवासी चंद्रशेखर शुक्ला व शिवकुमार द्विवेदी बताते हैं कि यह ताला अंग्रेजों के जमाने का है। इस कमरे से एक गुप्त सुरंग जैसी राह निकलती है, जिसे गांव के लोग गुप्त रास्ता कहते हैं। बुंदेलखंड केसरी अखबार छापने और सूखने के बाद भोर होने से पहले क्रांतिकारी इसी रास्ते से अखबार लेकर निकल जाते थे और अंग्रेजों को भनक तक नहीं लगती थी। कई बार अंग्रेजों ने इस तहखाना में छापा डाला, लेकिन न तो क्रांतिकारी मिले और न इससे संबंधित कोई सामग्री ही उनको मिल सकी। इस गुप्त कमरे में आम आदमी के लिए प्रवेश बंद है। साल 1947 में आजादी मिलने के बाद इन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने तहखाना व मंदिर प्रांगण में घी के दीए जलाकर जश्न मनाया था और तिरंगा फहराते हुए गांव में फेरी भी निकली थी।

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फोटो 14 एचएएमपी 04- विमल चंद्र गुरुदेव।
नेहरू ने किया था आजादी की लड़ाई के समय दौरा

विमल चंद्र गुरुदेव ने बताया कि साल 1936 में पं. जवाहरलाल नेहरू उनके बाबा स्व. मन्नीलाल गुरुदेव के बुलावे पर गांव आए थे। उन्होंने यहां कांग्रेस का अधिवेशन कर झंडा फहराया था। सभा में इमलिया, खड़ेही लोधन, अलरा गौरा गांव के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ बैजनाथ पांडे, बाबूराम चौरसिया, रघुनंदन शर्मा सहित करीब 110 लोग शामिल हुए थे। बाद में सेनानियों की याद में उस स्थान को जवाहर नगर मोहल्ला के नाम से जाना जाता है।

फोटो 14 एचएएमपी 01- गहरौली गांव स्थिति 154 साल पुराना बांके बिहारी मंदिर। संवाद

फोटो 14 एचएएमपी 01- गहरौली गांव स्थिति 154 साल पुराना बांके बिहारी मंदिर। संवाद

फोटो 14 एचएएमपी 01- गहरौली गांव स्थिति 154 साल पुराना बांके बिहारी मंदिर। संवाद

फोटो 14 एचएएमपी 01- गहरौली गांव स्थिति 154 साल पुराना बांके बिहारी मंदिर। संवाद

फोटो 14 एचएएमपी 01- गहरौली गांव स्थिति 154 साल पुराना बांके बिहारी मंदिर। संवाद

फोटो 14 एचएएमपी 01- गहरौली गांव स्थिति 154 साल पुराना बांके बिहारी मंदिर। संवाद

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