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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Kushinagar News ›   Crisis over the development of new varieties at the Sevarahi Sugarcane Research Institute due to the absence of a plant breeder.

Kushinagar News: सेवरही गन्ना शोध संस्थान में प्लांट ब्रीडर नहीं, नई प्रजातियों के विकास पर संकट

Mon, 12 Oct 2026 01:41 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 12 Oct 2026 01:41 AM IST
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Crisis over the development of new varieties at the Sevarahi Sugarcane Research Institute due to the absence of a plant breeder.
पूर्वी यूपी और बिहार के गन्ना किसानों के लिए अहम है कुशीनगर के सेवरही का शोध संस्थान
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सेवरही संस्थान में 2025 में लगाए गए छह हजार पौधों से शुरू हुआ नई प्रजाति का सफर
2032-35 तक नतीजे आने की उम्मीद, आठ-दस साल की शोध प्रक्रिया की निगरानी की चिंता गन्ना शोध संस्थान में प्लांट ब्रीडर घटे, नई प्रजातियों पर संकट

गुरवलिया बाजार (कुशीनगर)। सेवरही के गेंदा सिंह गन्ना प्रजनन एवं अनुसंधान संस्थान में 2025 में छह हजार पौधे लगाए गए थे। 2032 से 2035 तक इन पौधों की निगरानी कर नई प्रजाति के पौधे विकसित करने की योजना है। लेकिन प्लांट ब्रीडर के अभाव में पौधों की निगरानी को लेकर संकट पैदा हो गया है। फिलहाल शाहजहांपुर से आई टीम पौधों की निगरानी कर रही है लेकिन यह टीम इसी माह लौट जाएगी। ऐसे में आशंका है कि पर्याप्त निगरानी के अभाव में इन पौधों से वांछित परिणाम नहीं मिल सकेंगे।
गन्ने की नई प्रजाति विकसित करना एक लंबी वैज्ञानिक प्रक्रिया है। इसमें आठ से दस साल तक का समय लगता है। इस अवधि में इन पौधों को 24 घंटे के निगरानी की आवश्यकता होती है। जब भी मौसम में बदलाव होता है यह आवश्यकता बढ़ जाती है। मौसम के बदलाव के अनुसार इसका ध्यान रखना पड़ता है नहीं तो वांछित परिणाम प्राप्त होने में समस्या हो सकती है। सेवरही के गेंदा सिंह गन्ना प्रजनन एवं अनुसंधान संस्थान में वर्ष 2025 में लगाए गए छह हजार पौधे लगाकर 2035 तक नई प्रजाति विकसित करने का लक्ष्य रखा गया गया था। लेकिन फिलहाल संस्थान में प्लांट ब्रीडर ही नहीं हैं। आवश्यकता के अनुसार शाहजहांपुर से टीम आकर पौधों की जरूरी देखभाल करती है। टीम के इसी माह लौटने के बाद पौधों की निगरानी को लेकर संकट की स्थिति बन जाएगी।
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सेवरही के गेंदा सिंह गन्ना प्रजनन एवं अनुसंधान संस्थान में पहले संस्थान में चार-पांच प्लांट ब्रीडरों की टीम काम करती थी लेकिन इस समय संस्थान में प्लांट ब्रीडर ही नहीं हैं। इन दिनों वैरायटी स्क्रीनिंग के लिए गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर से प्लांट ब्रीडर डॉ. अरविंद कुमार सेवरही पहुंचे हैं। इस नई व्यवस्था से शोध की निरंतरता और विशेषज्ञों की उपलब्धता पर चिंताएं बढ़ गई हैं। छह हजार जीरो-टाइप पौधों में से पहली छंटनी में करीब 400 से 500 पौधे चुने जाएंगे। इसके बाद भी चयन प्रक्रिया जारी रहेगी। पौधों की उपज, गुणवत्ता और रोग-कीट प्रतिरोधकता का आकलन किया जाएगा। बेहतर प्रदर्शन करने वाली लाइनों को विभिन्न स्थानों पर परीक्षण के लिए भेजा जाएगा। हर चरण का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना जरूरी है।
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शोध प्रक्रिया के चरण गन्ने की नई किस्म तैयार करने में कई चरण होते हैं। हजारों पौधों में से सबसे बेहतर पौधों का चुनाव किया जाता है। इसके बाद उनकी उपज और चीनी की मात्रा का आकलन होता है। रोग-कीट प्रतिरोधकता की भी गहन जांच की जाती है। अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों में इन पौधों का परीक्षण किया जाता है। इन सभी परीक्षणों के बाद ही कोई नई प्रजाति किसानों के खेतों तक पहुंच पाती है। संस्थान की बदलती व्यवस्था संस्थान में पहले चार-पांच प्लांट ब्रीडर मिलकर पौधों की स्क्रीनिंग करते थे। अब शाहजहांपुर से एक वैज्ञानिक के आने की व्यवस्था की गई है। इस बदलाव से भविष्य में शोध कार्यों की निरंतरता पर प्रश्नचिह्न लग गया है।



कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार विरासत और भविष्य की चुनौतियां सेवरही का संस्थान पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लिए 53 गन्ने की प्रजातियां विकसित कर चुका है। इसकी अहमियत केवल पुरानी उपलब्धियों तक सीमित नहीं है।

वर्जन

संस्थान की वास्तविक क्षमता अगली पीढ़ी की किस्में तैयार करने में है। आनुवंशिक सामग्री का संरक्षण और लगातार वैज्ञानिक परीक्षण भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिकाएं हैं। लगाए गए फ्लफ कई चरणों से गुजरेंगे। नई किस्म किसानों तक पहुंचने में करीब एक दशक लग सकता है। ऐसे समय में 24 घंटे के नियमित निगरानी की जरूरत होती है।
-डॉ. अरविंद कुमार प्लांट ब्रीडर, शाहजहांपुर
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