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रंगों के साथ ही वस्त्र-आभूषणों का महत्व भी ब्रज की होली में

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 06 Mar 2022 11:16 PM IST
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Along with colors, the importance of clothes and ornaments is also in the Holi of Braj.
वृंदावन (मथुरा)। ब्रज और होली एक-दूसरे के पर्याय ऐसे ही नहीं हैं। ब्रजवासी साधकों ने इस उत्सव को इस तरह जिया कि होली का जिक्र होते ही ब्रज की चर्चा स्वयं सामने आ जाती है। वास्तव में ब्रज के लोगों का इस महोत्सव के प्रति उत्साह इसे विशेषता प्रदान करता है। यह विशेषता केवल मंदिरों में उड़ने वाले गुलाल, रंग और पिचकारी तक ही सीमित नहीं अपितु इसका विस्तार बहुत गहरा है। इस गहरेपन का एक वैशिष्टॺ यहां होली के दौरान ठाकुरजी को निवेदित किए जाने वाले आभूषण तथा वस्त्र अलंकरणों से भी जुड़ा है। कुछ इस तरह से गीत लिखे भी गए हैं कि शृंगारसमय वसंत उत्सव, कलस धरनौं, वसंती पोशाक होय।
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ब्रज में सवा महीने तक चलने वाली होली में ऐसी विविधताएं पग-पग पर देखी जा सकती हैं। उल्लेखनीय है कि पारंपरिक रूप से मंदिरों में श्रीविग्रहों को निवेदित किए जाने वाली यह सेवाएं प्रबुद्धजनों द्वारा इस भाव के साथ लिपिबद्ध भी की जाती रहीं हैं कि भविष्य में भी यह स्मृतियां बनी रहें। राधावल्लभ संप्रदाय के अंतर्गत हित सुधा सागर ग्रंथ में ऐसे उल्लेख देखे जा सकते हैं वहीं इन परंपराओं का निर्वहन भी।
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राधावल्लभ मंदिर के सेवायत श्रीहित सुकृतलाल गोस्वामी बताते हैं ब्रजभाषा में उल्लिखित यह विवरण हमारी मंदिर परंपरा में इस उत्सव का गौरव बोध कराते हैं। होली आरंभ का उल्लेख करते हुए ग्रंथ में लिखा है माघ शुक्ल 5 को शृंगारसमय वसंत उत्सव, कलस धरनौं, वसंती पोशाक होय। आज से मोजा, रजाई, अंगीठी नहीं धरीं जाय और गुलाल सब रंग के धरे जायं। शृंगार और संध्या आरती पै किंचित गुलाल उड़ायौ भी जाय...।
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इसी क्रम में फाल्गुन सुदी दो से मंदिर से होली खिलाने का विधान कुछ इस तरह अंकित है। फुलेरा दूज से रंगदार बेलबूटा, फूल आदि चित्रित चौडंडी में विराजैं, शृंगार समय आज फैंट गुलाल की धारण करैं। शृंगार अधिक होय, गुलाल अधिक उड़ै, थोड़ौ रंग भी धोल्यौ जाय। पोशाक रगमगी हलकी सफेद धारण होय...।

समाज गायन में गाए जाने वालीं पदावलियों में भी शृंगार के सुंदर उल्लेख देखे जा सकते हैं। आचार्य विभुकृष्ण भट्ट बताते हैं कि होली का उल्लेख दर्शाने वाले पारंपरिक पदों में प्रचुरता से वस्त्र तथा आभूषणों की जानकारी मिलती है। 18वीं सदी प्रेमदास जी द्वारा रचित इस पद में वस्त्र और आभूषणों प्रयोग प्रचुरता से दिखता है।
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