Meerut: 1942 का जख्म फिर हुआ याद, भांभौरी के मिनी जलियांवाला गोलीकांड के पांच शहीदों के वंशज सम्मानित
मेरठ के सरधना स्थित शहीद ग्राम भांभौरी में 1942 के मिनी जलियांवाला गोलीकांड की 84वीं बरसी पर पांच शहीद स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में स्थानीय इतिहास सहेजने का आह्वान हुआ।
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मेरठ के सरधना स्थित शहीद ग्राम भांभौरी में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान हुए मिनी जलियांवाला गोलीकांड की 84वीं बरसी पर मंगलवार को सम्मान समारोह आयोजित किया गया। अंतर्राष्ट्रीय सनातन ट्रस्ट की ओर से हुए कार्यक्रम में गोलीकांड में शहीद हुए पांच स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों को सम्मानित किया गया। वक्ताओं ने शहीदों के बलिदान को याद करते हुए स्थानीय इतिहास को सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत पर जोर दिया।
पांच स्वतंत्रता सेनानियों ने दिया था बलिदान
18 अगस्त 1942 को हुए गोलीकांड में रामस्वरूप शर्मा, ठाकुर प्रह्लाद सिंह, लट्टूर सिंह, फतेह सिंह और बोबल सिंह कश्यप शहीद हुए थे। इन पांचों बलिदानियों की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में उनके वंशज शिव ओम शर्मा, निशांत कुमार, विशाल, मांगे राम और राज सिंह को सम्मानित किया गया। मुख्य अतिथि राष्ट्रपति पदक से सम्मानित और भारतीय रेड क्रॉस सोसाइटी के उप संरक्षक सरबजीत सिंह कपूर ने सभी को शॉल ओढ़ाकर सम्मान प्रदान किया।
गांव-परिवारों के बलिदान को भी इतिहास में मिले जगह
मुख्य अतिथि सरबजीत सिंह कपूर ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल राष्ट्रीय स्तर की चर्चित घटनाओं तक सीमित नहीं है। गांवों, परिवारों और आम नागरिकों के बलिदान ने भी देश की आजादी की लड़ाई को मजबूत आधार दिया। उन्होंने युवाओं से स्थानीय इतिहास और स्वतंत्रता सेनानियों से जुड़ी स्मृतियों को संकलित करने का आह्वान किया, ताकि आने वाली पीढ़ियां इन घटनाओं से परिचित हो सकें।
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नई पीढ़ी को शहीदों से जोड़ने पर जोर
ग्राम प्रधान दिनेश सोम ने कहा कि 1942 का गोलीकांड भांभौरी की सामूहिक स्मृति और गौरव का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को शहीदों के बलिदान से परिचित कराने के साथ उनसे जुड़े स्थलों और मौखिक इतिहास को भी संरक्षित किया जाना चाहिए।
स्थानीय इतिहास राष्ट्रीय इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा
इतिहासकार एवं अंतर्राष्ट्रीय सनातन ट्रस्ट की अध्यक्ष डॉ. शुचि गुप्ता ने कहा कि स्थानीय इतिहास को राष्ट्रीय इतिहास की मुख्यधारा से जोड़ना जरूरी है। गांवों में हुए प्रतिरोध, दमन और बलिदान की घटनाएं देश के इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। उन्होंने शहीदों की स्मृतियों को दस्तावेज के रूप में सुरक्षित कर भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने की आवश्यकता बताई।