Moradabad: शिल्प गुरु चिरंजीलाल व किसान रघुपत सिंह अब पद्मश्री, प्रेमवती ने लिया पति का अवार्ड तो छलके आंसू
मुरादाबाद के पीतल शिल्पकार चिरंजीलाल को दिल्ली में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति ने पद्मश्री से सम्मानित किया। 55 वर्षों से पीतल पर मरोड़ी और कलम की बारीक नक्काशी करने वाले चिरंजीलाल ने आर्थिक तंगी के बावजूद अपनी पुश्तैनी कला नहीं छोड़ी और नई पीढ़ी को भी इसे सिखाया। वहीं, दुर्लभ सब्जियों के बीजों के संरक्षण के लिए दिवंगत किसान रघुपति सिंह को मरणोपरांत पद्मश्री दिया गया, जिसे उनकी पत्नी प्रेमवती ने ग्रहण किया।
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मुरादाबाद के एक और शिल्प गुरु पद्मश्री बन गए। दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में शिल्प गुरु चिरंजीलाल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पद्मश्री से सम्मानित किया। वहीं 55 से ज्यादा दुर्लभ सब्जियों के बीज सुरक्षित करने वाले किसान रघुपति सिंह के मणोपरांत मिले पद्मश्री को उनकी पत्नी प्रेमवती ने लिया। अब जिले में पद्मश्री पाने वालाें की संख्या दो से बढ़कर चार हो गई है।
हस्तशिल्प से जुड़े शहर के दस्तकार दिलशाद हुसैन और बाबूराम यादव को पहले ही पद्मश्री मिल चुका है। मंगलवार को शिल्पकार चिरंजीलाल को पद्मश्री के खिताब से नवाजा गया। वह सोमवार को ही बेटे खुश सिंह और अन्य परिजनों के साथ दिल्ली पहुंच गए थे। चिरंजीलाल ने 21 साल की उम्र से पीतल पर मरोड़ी और कलम का बारीक काम शुरू किया था।
उन्हें यह काम करते हुए करीब 55 साल हो गए। मंगलवार को उनके घर बधाई देने वालों का तांता लगा रहा। 1980 का दशक चिरंजीलाल क जीवन का संघर्षपूर्ण दौर था। उस समय कला की कद्र कम थी और इस बारीक काम की मजदूरी नाम मात्र की मिलती थी। हालात इतने बदतर हो गए थे कि परिवार का पेट पालने के लिए उन्हें अपने ही हाथों से बनाए गए बेशकीमती और बारीक नक्काशी वाले आइटम औने-पौने दामों पर बेचने पड़े थे।
कई बार ऐसा लगा कि इस पुश्तैनी काम को छोड़ दें, लेकिन कला के प्रति उनके जुनून ने उन्हें रुकने नहीं दिया। उन्होंने उस मुफलिसी में भी अपनी छेनी-हथौड़ी का साथ नहीं छोड़ा। चिरंजीलाल की इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे उनके गुरु अमर सिंह जी का बहुत बड़ा हाथ है। अमर सिंह को भी पूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन के हाथों राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका था।
अपने गुरु से मिली पीतल पर मरोड़ी और कलम के बारीक काम की इस नायाब कला को चिरंजीलाल ने सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाया। उनके बेटे खुश सिंह राज्य और राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। जबकि उनके शिष्य जितेंद्र कुमार को भी स्टेट अवार्ड मिल चुका है।
मशीनें शिल्पकार के अहसास को नहीं उकेर सकतीं
मुरादाबाद। आज के दौर में जहां युवा कंप्यूटर और 3 -डी डिजाइनिंग की ओर भाग रहे हैं, वहीं 76 वर्षीय चिरंजीलाल का मानना है कि उच्च कोटि की कला सिर्फ हाथों की मेहनत से ही जन्म लेती है। उनका कहना है कि आज की पीढ़ी शॉर्टकट ढूंढती है, लेकिन पद्मश्री जैसे सर्वोच्च मुकाम तक पहुंचने के लिए तपना पड़ता है। मशीनें कभी उस अहसास को नहीं उकेर सकतीं जो एक शिल्पकार की उंगलियां पीतल पर उकेरती हैं।
सब्जी के नए बीज तैयार करने, बीजों का संरक्षण और उन्नत खेती के नए प्रयोग करने के लिए वर्ष 1994 में उत्तर प्रदेश सरकार ने बिलारी ब्लॉक के समाथल गांव निवासी किसान रघुपत सिंह को कृषि पंडित का खिताब दिया था। इसके बाद में विशेष प्रजाति की लौकी, लोबिया, अरबी, मिर्च समेत विभिन्न सब्जियां उगाने वाले रघुपत सिंह को वर्ष 2016 में वाराणसी सब्जी अनुसंधान केंद्र से गोल्ड मेडल मिलने समेत राष्ट्रीय स्तर के अनेक पुरस्कार मिले।
मरणोपरांत पद्मश्री से सम्मानित होने वाले समाथल के किसान रघुपत सिंह की पत्नी प्रेमवती को मंगलवार शाम दिल्ली में राष्ट्रपति ने पद्मश्री अवाॅर्ड साैंपा गया। इसकी जानकारी मिलने पर क्षेत्र में खुशी की लहर दाैड़ गई। किसान रघुपत सिंह के बेटे सुरेंद्रपाल सिंह ने बताया कि उनके दिवंगत पिता रघुपत सिंह को सरकार की ओर से दिया गया पद्मश्री सम्मान शाम को उनकी माता प्रेमवती को साैंपा गया है।
इस दौरान वह भी अपनी माता के साथ रहे। एक जुलाई 2025 को रघुपत सिंह अपने गांव समाथल में बीमारी के चलते मृत्यु हो गई। बीती 25 जनवरी को केंद्र सरकार की ओर से पद्मश्री के लिए मरणोपरांत रघुपत सिंह को भी चुना गया। केंद्र सरकार के बुलावे पर मंगलवार को रघुपत सिंह की पत्नी प्रेमवती और उनका बड़ा बेटा सुरेंद्रपाल दिल्ली पहुंचे। इस संबंध में आयोजित समारोह में अपने पति को मिलने वाला पद्मश्री का सम्मान प्रेमवती को साैंपा गया। प्रेमवती को पदमश्री से सम्मानित किए जाने की खबर मिलने पर समाथल के ग्रामीणों ने खुशी जताई।