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Muzaffarnagar News: विरासत भुला रहे वारिस...याद दिला रही बंदूक
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मुजफ्फरनगर। कभी सुरक्षा तो कभी शान के लिए खरीदी गई बंदूकें अब मुसीबत की वजह बन गई है। लाइसेंसधारक के निधन के बाद विरासत में नाम दर्ज नहीं हुए। परिवारों ने बंदूकों को गन हाउस में रखवा दिया। दशकों बीत जाने के बावजूद मालिक लौटकर नहीं आए। एक या दो नहीं, बल्कि ऐसे सैकड़ों मामले हैं।
रुड़की रोड स्थित जनता आर्म्स स्टोर पर हरिद्वार के ज्वालापुर निवासी चौहल सिंह की बंदूक 1999 में रखवाई गई। पिछले 27 साल में कोई वारिस नहीं पहुंचा। गन हाउस के मालिक दिलशाद अहमद बताते हैं कि यह कोई अकेला मामला नहीं है, दुकान में कुल 143 पुराने शस्त्र रखे हुए हैं। शस्त्रों की साफ-सफाई करवाते हैं लेकिन इनके वारिस जानकारी लेने भी नहीं पहुंचते। अधिकतर ने किराया भी जमा नहीं किया।
भौराकलां के सचिन कुमार ने 10 साल पहले पिता की बंदूक को गन हाउस में रखवाया था लेकिन इसके बाद वापस नहीं ली है। विरासत में लाइसेंस दर्ज नहीं हुआ और बंदूक गनहाउस में ही रखी है।
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अगर पूरे जिले की बात करें तो करीब एक हजार शस्त्र ऐसे हैं, जिनके वारिसों के लौटकर आने का इंतजार है। दुकानदारों का कहना है कि उनकी दुकानों में पुराने शस्त्र रखे हुए है। उन्हें कोई लेने नहीं आ रहा है। इसके लिए एक नियम बनाया जाए, जो शस्त्र पांच साल के अंदर नहीं ले जाया जाता तो उसे कलेक्ट्रेट परिसर में सरकारी नजारत मालखाने में जमा कराया जाना चाहिए।
पिछले 27 साल में लगभग एक हजार पुराने लाइसेंस धारकोंं की मौत हो चुकी है। यह शस्त्र उनके परिजन अपने घर में नहीं रख सकते । विरासत में शस्त्र को अपने नाम कराना पड़ता है। इसी के चलते इन शस्त्रों को गन हाउस में जमा करा दिया गया। अपने नाम कराने के लिए प्रक्रिया शुरू की लेकिन सफलता नहीं मिली। इस वजह से यह शस्त्र, शस्त्र विक्रेताओं के गोदामों में बंद हैं।
रुड़की रोड स्थित जनता आर्म्स स्टोर पर हरिद्वार के ज्वालापुर निवासी चौहल सिंह की बंदूक 1999 में रखवाई गई। पिछले 27 साल में कोई वारिस नहीं पहुंचा। गन हाउस के मालिक दिलशाद अहमद बताते हैं कि यह कोई अकेला मामला नहीं है, दुकान में कुल 143 पुराने शस्त्र रखे हुए हैं। शस्त्रों की साफ-सफाई करवाते हैं लेकिन इनके वारिस जानकारी लेने भी नहीं पहुंचते। अधिकतर ने किराया भी जमा नहीं किया।
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भौराकलां के सचिन कुमार ने 10 साल पहले पिता की बंदूक को गन हाउस में रखवाया था लेकिन इसके बाद वापस नहीं ली है। विरासत में लाइसेंस दर्ज नहीं हुआ और बंदूक गनहाउस में ही रखी है।
अगर पूरे जिले की बात करें तो करीब एक हजार शस्त्र ऐसे हैं, जिनके वारिसों के लौटकर आने का इंतजार है। दुकानदारों का कहना है कि उनकी दुकानों में पुराने शस्त्र रखे हुए है। उन्हें कोई लेने नहीं आ रहा है। इसके लिए एक नियम बनाया जाए, जो शस्त्र पांच साल के अंदर नहीं ले जाया जाता तो उसे कलेक्ट्रेट परिसर में सरकारी नजारत मालखाने में जमा कराया जाना चाहिए।
पिछले 27 साल में लगभग एक हजार पुराने लाइसेंस धारकोंं की मौत हो चुकी है। यह शस्त्र उनके परिजन अपने घर में नहीं रख सकते । विरासत में शस्त्र को अपने नाम कराना पड़ता है। इसी के चलते इन शस्त्रों को गन हाउस में जमा करा दिया गया। अपने नाम कराने के लिए प्रक्रिया शुरू की लेकिन सफलता नहीं मिली। इस वजह से यह शस्त्र, शस्त्र विक्रेताओं के गोदामों में बंद हैं।