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बजट ने किसान-मजदूर और ग्रामीण भारत की उम्मीदों को तोड़ा : टिकैत
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फोटो
अमर उजाला ब्यूरो
मुजफ्फरनगर। भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत ने केंद्रीय बजट पर कहा कि कागजों में सजा बजट, भाषणों में विकास रहा...खेत का किसान, हाथ का मजदूर फिर उदास रहा। उन्होंने बजट को अन्नदाता, मेहनतकश वर्ग और ग्रामीण भारत की मूल समस्याओं का समाधान करने में पूरी तरह असफल करार दिया है। जमीनी सच्चाइयों से कोसों दूर, केवल आंकड़ों और घोषणाओं का एक संग्रह है।
रविवार को प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए टिकैत ने कहा कि बढ़ती महंगाई, खेती की लागत में लगातार इजाफा और गिरती आय से जूझ रहे किसानों के लिए बजट में न तो कर्ज माफी की कोई ठोस पहल की गई और न ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी गारंटी देने का कोई प्रावधान किया गया। यह किसानों की सबसे बड़ी मांग है, जिस पर सरकार ने पूरी तरह से चुप्पी साध ली है।
टिकैत के अनुसार, रोजगार योजनाओं को मजबूत करने, न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने और मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बजट में कोई स्पष्ट दिशा नहीं दिखाई देती। इससे ग्रामीण युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी की समस्या और गंभीर होने की आशंका है।
आदिवासी समाज के जल, जंगल, जमीन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका जैसे बुनियादी मुद्दों को भी बजट में अपेक्षित प्राथमिकता नहीं दी गई है। कुल मिलाकर, यह बजट ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के बजाय एक बार फिर शहरी और कॉरपोरेट हितों की ओर झुका हुआ प्रतीत होता है।
सरकार को चाहिए कि वह किसान, मजदूर, आदिवासी और ग्रामीण भारत को केंद्र में रखकर अपनी नीतियों और बजटीय प्रावधानों पर पुनर्विचार करे।
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अमर उजाला ब्यूरो
मुजफ्फरनगर। भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत ने केंद्रीय बजट पर कहा कि कागजों में सजा बजट, भाषणों में विकास रहा...खेत का किसान, हाथ का मजदूर फिर उदास रहा। उन्होंने बजट को अन्नदाता, मेहनतकश वर्ग और ग्रामीण भारत की मूल समस्याओं का समाधान करने में पूरी तरह असफल करार दिया है। जमीनी सच्चाइयों से कोसों दूर, केवल आंकड़ों और घोषणाओं का एक संग्रह है।
रविवार को प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए टिकैत ने कहा कि बढ़ती महंगाई, खेती की लागत में लगातार इजाफा और गिरती आय से जूझ रहे किसानों के लिए बजट में न तो कर्ज माफी की कोई ठोस पहल की गई और न ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी गारंटी देने का कोई प्रावधान किया गया। यह किसानों की सबसे बड़ी मांग है, जिस पर सरकार ने पूरी तरह से चुप्पी साध ली है।
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टिकैत के अनुसार, रोजगार योजनाओं को मजबूत करने, न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने और मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बजट में कोई स्पष्ट दिशा नहीं दिखाई देती। इससे ग्रामीण युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी की समस्या और गंभीर होने की आशंका है।
आदिवासी समाज के जल, जंगल, जमीन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका जैसे बुनियादी मुद्दों को भी बजट में अपेक्षित प्राथमिकता नहीं दी गई है। कुल मिलाकर, यह बजट ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के बजाय एक बार फिर शहरी और कॉरपोरेट हितों की ओर झुका हुआ प्रतीत होता है।
सरकार को चाहिए कि वह किसान, मजदूर, आदिवासी और ग्रामीण भारत को केंद्र में रखकर अपनी नीतियों और बजटीय प्रावधानों पर पुनर्विचार करे।
