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मनुष्य की श्रेष्ठता जन्म से नहीं बल्कि कर्म और साधना से होती है : प्रो. अखिलेश
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एमडीपीजी कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम में कुलपति प्रो.अखिलेश सिंह को प्रतीक चिन्ह देते प्राचार्य
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मनुष्य की श्रेष्ठता उसके जन्म से नहीं बल्कि उसके कर्म व साधना से होती है। सामाजिक समरसता में नाथ साहित्य आज भी प्रासंगिक है। यह बातें शुक्रवार को एमडीपीजी कॉलेज में आयोजित संगोष्ठी का शुभारंभ करने के बाद प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भैय्या) राज्य विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अखिलेश सिंह ने कहीं।
सामाजिक समरसता में नाथ साहित्य का योगदान विषय पर कुलपति प्रो. अखिलेश कुमार सिंह ने कहा कि समरसता में चार तत्व समानता, सौहार्द्ध, सामंजस्य व सम्मान निहित है। इनमें से जब किसी भी तत्व में कोई विकार उत्पन्न होता है तो साहित्यकार अपने निर्भीक व कठोर शब्दों से उसे सही दिशा प्रदान करता है। नाथ संप्रदाय का उद्देश्य समाज में मानवता का संदेश देते हुए समरसता को बढ़ावा देना रहा है।
विशिष्ट अतिथि मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय बलरामपुर के कुलपति प्रो. रवि शंकर सिंह ने नाथ साहित्य पर विचार रखे। कहा कि दर्शन, कला, संगीत और साहित्य का अद्भुत समागम नाथ साहित्य में मिलता है लेकिन राजनीतिक संरक्षण के अभाव में नाथ साहित्य प्रचारित व प्रसारित नहीं हो सका।
भारतीय हिंदी परिषद प्रयागराज के प्रधान प्रमुख प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि जब भिन्न-भिन्न अस्मिताएं उभार लेती हैं तो समाज में विखंडन उत्पन्न होता है। भारतीय हिंदी परिषद प्रयागराज के सभापति प्रो. पवन अग्रवाल ने कहा की कुरीतियों को दूर करने और सांस्कृतिक एकीकरण में नाथ संप्रदाय का अप्रतिम योगदान है।
एमडीपीजी कॉलेज के प्राचार्य प्रो. शैलेंद्र कुमार मिश्र ने प्रतीक चिह्न और अंगवस्त्र प्रदान कर अतिथियों का स्वागत किया। इसके पूर्व संगोष्ठी के संयोजक डॉ. अरुण वर्मा की पुस्तक ‘नाथ संप्रदाय साधक और साहित्य’ का अतिथियों ने लोकार्पण किया। संचालन प्रो. संजय दुबे ने किया। इस मौके पर प्रो. अखिलेश पांडेय, प्रो. अमित श्रीवास्तव, प्रो. सुमन जैन, डॉ. सीएन पांडेय, डॉ. अल्का मिश्रा, प्रो. शिवम श्रीवास्तव, डॉ. उदय प्रताप सिंह, प्रो. आशुतोष सिंह मौजूद रहे।
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विशिष्ट अतिथि मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय बलरामपुर के कुलपति प्रो. रवि शंकर सिंह ने नाथ साहित्य पर विचार रखे। कहा कि दर्शन, कला, संगीत और साहित्य का अद्भुत समागम नाथ साहित्य में मिलता है लेकिन राजनीतिक संरक्षण के अभाव में नाथ साहित्य प्रचारित व प्रसारित नहीं हो सका।
भारतीय हिंदी परिषद प्रयागराज के प्रधान प्रमुख प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि जब भिन्न-भिन्न अस्मिताएं उभार लेती हैं तो समाज में विखंडन उत्पन्न होता है। भारतीय हिंदी परिषद प्रयागराज के सभापति प्रो. पवन अग्रवाल ने कहा की कुरीतियों को दूर करने और सांस्कृतिक एकीकरण में नाथ संप्रदाय का अप्रतिम योगदान है।
एमडीपीजी कॉलेज के प्राचार्य प्रो. शैलेंद्र कुमार मिश्र ने प्रतीक चिह्न और अंगवस्त्र प्रदान कर अतिथियों का स्वागत किया। इसके पूर्व संगोष्ठी के संयोजक डॉ. अरुण वर्मा की पुस्तक ‘नाथ संप्रदाय साधक और साहित्य’ का अतिथियों ने लोकार्पण किया। संचालन प्रो. संजय दुबे ने किया। इस मौके पर प्रो. अखिलेश पांडेय, प्रो. अमित श्रीवास्तव, प्रो. सुमन जैन, डॉ. सीएन पांडेय, डॉ. अल्का मिश्रा, प्रो. शिवम श्रीवास्तव, डॉ. उदय प्रताप सिंह, प्रो. आशुतोष सिंह मौजूद रहे।