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Pratapgarh News: नहरें सूखीं... प्यासे खेत, पानी का इंतजार
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लालगंज क्षेत्र में सूखी पड़ी माइनर। संवाद
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धान की नर्सरी डालने का वक्त गुजरता जा रहा है। मानसून छोड़िए, जिले की नहरें भी किसानों का साथ नहीं दे रही हैं। गर्मी में नहरें सूखीं हैं। प्यासे खेतों को पानी का इंतजार है। नहरों में पानी नहीं छोड़े जाने से किसान नर्सरी पिछड़ने के साथ धान की रोपाई को लेकर भी चिंतित हैं।
जिले में इस बार 1.50 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में धान की खेती होनी है। सिंचाई खंड प्रतापगढ़ क्षेत्र में 257 नहरें हैं। इन नहरों की सीमा भुपियामऊ, विश्वनाथगंज, मानधाता, जेठवारा, लालगोपालगंज, कुंडा, मानिकपुर, संग्रामगढ़, कालाकांकर, लालगंज, सगरा सुंदरपुर, लीलापुर होते हुए मोहनगंज में खत्म होती है। नहरों से 1240 किमी परिधि में जलापूर्ति की जाती है। इसी से किसान सिंचाई कर फसलें उगाते हैं।
सिंचाई विभाग के अनुसार, क्षेत्र में सिंचाई के लिए करीब 1800 क्यूसेक पानी की जरूरत होती है। वहीं, 110 किमी परिधि में फैली शारदा सहायक खंड की 41 नहरों में 630 क्यूसेक पानी की मांग रहती है ताकि किसानों को दिक्कत न हो।
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वहीं नहरों में अभी तक पानी नहीं छोड़े जाने से किसानों मुश्किलें बढ़ गई हैं। वह निजी संसाधनों से नर्सरी डालने को मजबूर हैं। इससे उनपर आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है।
कृषि विज्ञान अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. एनके सिंह ने बताया कि जून धान की नर्सरी डालने के लिए सबसे अनुकूल माह है। गर्मी और नहरों में पानी न होने से नर्सरी डालने का वक्त गुजरता जा रहा है। नर्सरी डाला भी दी जाए तो सिंचाई न होने से मिट्टी में नमी खत्म होते ही पौधों की गुणवत्ता खराब होने लगेगी। इसलिए नर्सरी की नियमित अंतराल पर सिंचाई जरूरी है।
बोले किसान
0 निजी नलकूप से सिंचाई करनी पड़ रही है। डीजल के उपयोग से खेती का खर्च बढ़ गया है। जबकि धान में उतना लाभ भी नहीं मिलता है। खेती दिन-ब-दिन महंगी होती जा रही है।
अनादिकांत पांडेय, लीलापुर
0 बिजली से चलने वाले पंपिंग सेट से खेतों की सिंचाई के लिए 180 रुपये प्रति घंटे के हिसाब से देने पड़ते हैं। बिजली कटौती होने पर खेत में ही पानी सूख जाता है। इससे दिक्कत होती है।
शिवेशचंद्र मिश्रा, किशुनगंज
इनसेट-
वर्जन-
रोस्टर के अनुसार जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह के बीच नहरों में पानी छोड़ा जाता है। जल्द ही पानी की उपलब्धता कराई जाएगी। - अरविंद वर्मा, एक्सईएन, सिंचाई विभाग
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जिले में इस बार 1.50 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में धान की खेती होनी है। सिंचाई खंड प्रतापगढ़ क्षेत्र में 257 नहरें हैं। इन नहरों की सीमा भुपियामऊ, विश्वनाथगंज, मानधाता, जेठवारा, लालगोपालगंज, कुंडा, मानिकपुर, संग्रामगढ़, कालाकांकर, लालगंज, सगरा सुंदरपुर, लीलापुर होते हुए मोहनगंज में खत्म होती है। नहरों से 1240 किमी परिधि में जलापूर्ति की जाती है। इसी से किसान सिंचाई कर फसलें उगाते हैं।
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सिंचाई विभाग के अनुसार, क्षेत्र में सिंचाई के लिए करीब 1800 क्यूसेक पानी की जरूरत होती है। वहीं, 110 किमी परिधि में फैली शारदा सहायक खंड की 41 नहरों में 630 क्यूसेक पानी की मांग रहती है ताकि किसानों को दिक्कत न हो।
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वहीं नहरों में अभी तक पानी नहीं छोड़े जाने से किसानों मुश्किलें बढ़ गई हैं। वह निजी संसाधनों से नर्सरी डालने को मजबूर हैं। इससे उनपर आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है।
कृषि विज्ञान अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. एनके सिंह ने बताया कि जून धान की नर्सरी डालने के लिए सबसे अनुकूल माह है। गर्मी और नहरों में पानी न होने से नर्सरी डालने का वक्त गुजरता जा रहा है। नर्सरी डाला भी दी जाए तो सिंचाई न होने से मिट्टी में नमी खत्म होते ही पौधों की गुणवत्ता खराब होने लगेगी। इसलिए नर्सरी की नियमित अंतराल पर सिंचाई जरूरी है।
बोले किसान
0 निजी नलकूप से सिंचाई करनी पड़ रही है। डीजल के उपयोग से खेती का खर्च बढ़ गया है। जबकि धान में उतना लाभ भी नहीं मिलता है। खेती दिन-ब-दिन महंगी होती जा रही है।
अनादिकांत पांडेय, लीलापुर
0 बिजली से चलने वाले पंपिंग सेट से खेतों की सिंचाई के लिए 180 रुपये प्रति घंटे के हिसाब से देने पड़ते हैं। बिजली कटौती होने पर खेत में ही पानी सूख जाता है। इससे दिक्कत होती है।
शिवेशचंद्र मिश्रा, किशुनगंज
इनसेट-
वर्जन-
रोस्टर के अनुसार जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह के बीच नहरों में पानी छोड़ा जाता है। जल्द ही पानी की उपलब्धता कराई जाएगी। - अरविंद वर्मा, एक्सईएन, सिंचाई विभाग

लालगंज क्षेत्र में सूखी पड़ी माइनर। संवाद