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Pratapgarh News: बाबा रामचंद्र के लिए जुटे हजारों किसान तो झुक गई थी अंग्रेजी हुकूमत
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स्वतंत्रता के लिए संघर्ष के दौरान अवध किसान आंदोलन ने ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिला कर रख दी थीं। कारागार में बंद किसान नेता बाबा रामचंद्र के समर्थन में जब हजारों किसान जुटे तो हुकूमत को झुकना पड़ा था।
किसान नेता बाबा रामचंद्र का जन्म ग्वालियर रियासत के एक छोटे से गांव में हुआ था। उनका मूल नाम श्रीधर बलवंत था। बाबा रामचंद्र फिजी में करीब 12 साल तक रहे और मजदूर आंदोलन में काम किया। मई 1920 में लौटने के बाद उन्होंने अवध के किसानों को जमींदारों के अत्याचारों, अवैध कर और बेदखली के खिलाफ एकजुट करना शुरू किया। प्रतापगढ़ के पट्टी स्थित रूर गांव में जिंगुरी सिंह और माता बदल के साथ मिलकर किसान सभा की स्थापना की। वे रामचरितमानस की चौपाइयों के जरिये किसानों में राष्ट्रवाद और अधिकारों की अलख जगाते रहे।
अगस्त 1920 माह में किसानों के बढ़ते प्रभाव को देखकर ब्रिटिश सरकार और स्थानीय तालुकदार (जमींदार) बौखला गए। बाबा रामचंद्र और उनके कुछ सहयोगियों को चोरी और अशांति फैलाने के झूठे आरोपों में गिरफ्तार कर प्रतापगढ़ जेल में बंद कर दिया गया। एक सितंबर 1920 को बाबा की रिहाई की मांग को लेकर करीब 50 हजार किसानों ने जेल को चारों तरफ से घेर लिया। विद्रोह के डर से प्रशासन ने बाबा रामचंद्र की अदालती सुनवाई कोर्ट के बजाय जेल के अंदर ही करने का फैसला किया।
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बाबा रामचंद्र को पेड़ पर चढ़ाकर कराया था समर्थकों को दर्शन
पीबीपीजी कॉलेज के सेवानिवृत्त इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. बृजभान सिंह ने बताया कि किसानों का गुस्सा शांत करने और यह साबित करने के लिए कि बाबा रामचंद्र सुरक्षित हैं, पुलिस उन्हें गन्ने के खेतों के रास्ते से ले गई। एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ाया, ताकि दूर-दूर तक खड़े हजारों किसान उनके दर्शन कर सकें। इसके बाद ही किसान शांत हुए। बाद में सरकार को झुकना पड़ा और बाबा को रिहा कर दिया।
ब्रिटिश उपायुक्त ने गिरफ्तारी को बताया था गलत
एमडीपीजी कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. पीयूषकांत शर्मा ने बताया कि किसान आंदोलन के समय प्रतापगढ़ के तत्कालीन ब्रिटिश उपायुक्त वीएन मेहता ने बाबा रामचंद्र की सांगठनिक शक्ति को बहुत बारीकी से भांपा था। उन्होंने अपनी रिपोर्टों में बाबा रामचंद्र को फिजी का एक सफल आंदोलनकारी कहकर संबोधित किया है। बताया कि जब बाबा रामचंद्र को गिरफ्तार किया गया, उस समय उपायुक्त छुट्टी पर थे। मेहता का मानना था कि बाबा को गिरफ्तार कर जेल में डालना एक बहुत बड़ी प्रशासनिक भूल थी। इससे वह किसानों की नजरों में और भी बड़े नायक बन गए। उपायुक्त ने अवध के किसानों की बदहाली और जमींदारों के शोषण पर एक विस्तृत सरकारी रिपोर्ट भी तैयार की थी, जिसे मेहता रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है।
कारागार में तैयार होगा स्मारक स्थल
जेल अधीक्षक ऋषभ द्विवेदी ने बताया कि बाबा रामचंद्र का इतिहास प्रतापगढ़ कारागार से जुड़ा है। उनकी याद में कारागार परिसर में स्मारक स्थल तैयार किए जाने का निर्णय लिया गया है। कार्य योजना तैयार कर शासन को भेजा गया है।
नोट- प्रतापगढ़ जिला कारागार की स्थापना वर्ष- 1885
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किसान नेता बाबा रामचंद्र का जन्म ग्वालियर रियासत के एक छोटे से गांव में हुआ था। उनका मूल नाम श्रीधर बलवंत था। बाबा रामचंद्र फिजी में करीब 12 साल तक रहे और मजदूर आंदोलन में काम किया। मई 1920 में लौटने के बाद उन्होंने अवध के किसानों को जमींदारों के अत्याचारों, अवैध कर और बेदखली के खिलाफ एकजुट करना शुरू किया। प्रतापगढ़ के पट्टी स्थित रूर गांव में जिंगुरी सिंह और माता बदल के साथ मिलकर किसान सभा की स्थापना की। वे रामचरितमानस की चौपाइयों के जरिये किसानों में राष्ट्रवाद और अधिकारों की अलख जगाते रहे।
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अगस्त 1920 माह में किसानों के बढ़ते प्रभाव को देखकर ब्रिटिश सरकार और स्थानीय तालुकदार (जमींदार) बौखला गए। बाबा रामचंद्र और उनके कुछ सहयोगियों को चोरी और अशांति फैलाने के झूठे आरोपों में गिरफ्तार कर प्रतापगढ़ जेल में बंद कर दिया गया। एक सितंबर 1920 को बाबा की रिहाई की मांग को लेकर करीब 50 हजार किसानों ने जेल को चारों तरफ से घेर लिया। विद्रोह के डर से प्रशासन ने बाबा रामचंद्र की अदालती सुनवाई कोर्ट के बजाय जेल के अंदर ही करने का फैसला किया।
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बाबा रामचंद्र को पेड़ पर चढ़ाकर कराया था समर्थकों को दर्शन
पीबीपीजी कॉलेज के सेवानिवृत्त इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. बृजभान सिंह ने बताया कि किसानों का गुस्सा शांत करने और यह साबित करने के लिए कि बाबा रामचंद्र सुरक्षित हैं, पुलिस उन्हें गन्ने के खेतों के रास्ते से ले गई। एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ाया, ताकि दूर-दूर तक खड़े हजारों किसान उनके दर्शन कर सकें। इसके बाद ही किसान शांत हुए। बाद में सरकार को झुकना पड़ा और बाबा को रिहा कर दिया।
ब्रिटिश उपायुक्त ने गिरफ्तारी को बताया था गलत
एमडीपीजी कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. पीयूषकांत शर्मा ने बताया कि किसान आंदोलन के समय प्रतापगढ़ के तत्कालीन ब्रिटिश उपायुक्त वीएन मेहता ने बाबा रामचंद्र की सांगठनिक शक्ति को बहुत बारीकी से भांपा था। उन्होंने अपनी रिपोर्टों में बाबा रामचंद्र को फिजी का एक सफल आंदोलनकारी कहकर संबोधित किया है। बताया कि जब बाबा रामचंद्र को गिरफ्तार किया गया, उस समय उपायुक्त छुट्टी पर थे। मेहता का मानना था कि बाबा को गिरफ्तार कर जेल में डालना एक बहुत बड़ी प्रशासनिक भूल थी। इससे वह किसानों की नजरों में और भी बड़े नायक बन गए। उपायुक्त ने अवध के किसानों की बदहाली और जमींदारों के शोषण पर एक विस्तृत सरकारी रिपोर्ट भी तैयार की थी, जिसे मेहता रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है।
कारागार में तैयार होगा स्मारक स्थल
जेल अधीक्षक ऋषभ द्विवेदी ने बताया कि बाबा रामचंद्र का इतिहास प्रतापगढ़ कारागार से जुड़ा है। उनकी याद में कारागार परिसर में स्मारक स्थल तैयार किए जाने का निर्णय लिया गया है। कार्य योजना तैयार कर शासन को भेजा गया है।
नोट- प्रतापगढ़ जिला कारागार की स्थापना वर्ष- 1885