उजड़ता भयेड़ी... जिला मुख्यालय से महज 12 किमी की दूर पलायन की मार, 52 परिवारों तक सिमटा 110 घरों का गांव
जिला मुख्यालय से भयेड़ी गांव महज 12 किमी की दूरी पर है। करीब पांच किमी से अधिक क्षेत्रफल में फैले गांव में चार दशक पहले तक 110 परिवार रहते थे। समय के साथ बेहतर सुविधाओं की तलाश में लोग शहरों की ओर पलायन करते गए।
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बागेश्वर के भयेड़ी गांव में प्रवेश करते ही कई घरों के बंद दरवाजे और उन पर चुपचाप लटके ताले पलायन की खामोश कहानी को बयां कर देते हैं। कभी चहल-पहल भरा रहा यह गांव अब धीरे-धीरे सन्नाटे की चादर ओढ़ रहा है।
जिला मुख्यालय से भयेड़ी गांव महज 12 किमी की दूरी पर है। इसके बावजूद शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी ने लोगों को गांव छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया है। करीब पांच किमी से अधिक क्षेत्रफल में फैले इस गांव में चार दशक पहले तक 110 परिवार रहते थे। समय के साथ बेहतर सुविधाओं की तलाश में लोग शहरों की ओर पलायन करते गए।
अब यहां केवल 52 परिवार ही बचे हैं। इनमें भी अधिकांश घरों में बुजुर्ग ही रह गए हैं जबकि नई पीढ़ी पढ़ाई और रोजगार के लिए शहरों में बस चुकी है। गांव में एक प्राथमिक विद्यालय तो है लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को करीब चार किमी दूर क्वैराली के इंटर कॉलेज में जाना पड़ता है। स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में बीमार पड़ने पर ग्रामीणों को जिला अस्पताल की शरण लेनी पड़ती है।
ग्रामीण बताते हैं कि तीन-चार दशक पहले तक गांव के लोग बाजार से अनाज नहीं खरीदते थे। खेतों में धान, गेहूं, मडुवा, झंगोरा, मसूर, भट्ट, गहत और मौसमी सब्जियों की भरपूर पैदावार होती थी। अब बंदर और जंगली सुअरों के बढ़ते प्रकोप तथा पलायन के कारण अधिकांश खेत बंजर हो गए हैं। परिणामस्वरूप ग्रामीणों को साल भर सस्ते गल्ले की दुकान या बाजार से ही राशन लेना पड़ रहा है।
रिवर्स पलायन की चाह पर सुविधाओं का अभाव
करीब 40-50 वर्ष पहले गांव छोड़कर शहरों में बस चुके कई लोग अब सेवानिवृत्ति के बाद गांव लौटकर शांत जीवन बिताने की इच्छा रखते हैं। गांव में बुनियादी सुविधाओं की कमी उनकी राह में सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। बेहतर स्वास्थ्य सुविधा न होने के कारण लोग बुढ़ापे में शहर छोड़कर गांव आने से हिचकते हैं।
80 के दशक की शुरुआत में गांव में बिजली, पानी की सुविधा मिल गई थी लेकिन उसके बाद विकास की रफ्तार थम सी गई। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और संचार जैसी उन्नत सुविधाएं न होने के कारण गांव छोड़ चुके लोग वापस लौटना नहीं चाहते। जंगली जानवरों के कारण खेती भी चौपट हो चुकी है।-नवीन जोशी, ग्रामीण
युवा पीढ़ी को पढ़ाई से लेकर कमाई तक गांव छोड़कर बाहर जाना पड़ता है। सरकार पहाड़ में खेती के विकास पर ध्यान दे और पहाड़ों में फैक्टरी लगेगी तो गांव से युवा क्यों गांव से बाहर जाएगा। पलायन रोकने के लिए बन रही योजनाओं को भी धरातल पर उतारना होगा।-दीपक जोशी, स्थानीय युवा
पुराने समय के लोगों ने खेतीबाड़ी से किसी तरह अपना जीवन बिता लिया, नई पीढ़ी सुविधाओं के अभाव में नहीं रह सकती है। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा लोगों की पहली जरूरत है। गांव में किसी तरह के रोजगारपरक प्रशिक्षण भी नहीं दिए जाते हैं। लोग शहरों की तरफ जा रहे हैं और जंगली जानवर गांवों में डेरा डाल रहे हैं।-प्रेमा जोशी, ग्रामीण
गांव से पलायन केवल सुविधाओं की कमी से नहीं, बल्कि देखा-देखी भी हुआ है। उनका मानना है कि यदि गांव में आबादी बनी रहती तो यहां स्वास्थ्य केंद्र भी खुल सकता था। लॉकडाउन के दौरान लोगों ने गांव की अहमियत महसूस की थी और उम्मीद है कि एक दिन गांव फिर से खुशहाल होगा।-लीला जोशी, ग्रामीण
गांव की शुद्ध हवा, साफ पानी और शांति शहरों में नहीं मिलती। फिर भी पलायन की होड़ लगी है। पहले गांव में खूब चहल-पहल रहती थी। लोग मिलकर खेती और पशुपालन करते थे लेकिन अब बंद पड़े घरों को देखकर मन दुखी हो जाता है। नई पीढ़ी की अपनी जरुरतें, अपने सपने हैं, ऐसे में किसी को दोष देना भी सही नहीं है।कलावती देवी, ग्रामीण
पलायन के कारण गांव में युवा महिलाएं बहुत कम बची हैं। पलायन रोकने के लिए गांव की महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़कर उद्यम के लिए प्रेरित किया जा रहा है। यदि गांव की महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत होंगी तो संभव है कि शहरों में रह रहे लोग भी गांव लौटने का विचार करें।-भगवती जोशी, ग्राम प्रधान, भयेड़ी